Saturday, July 24, 2021

राहुल जी पीएम बनेंगे!

ट्वीटर पर ट्रेंड कर रहे दो मुद्दों पर एक नज़र..



भारत में राजनीति से जुड़े मुद्दों पर चर्चा चलती ही रहती है। हालाँकि बहुत से लोग इससे बचते भी हैं। भारत में जीवंत लोकतंत्र है इसलिए विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के लोग अपनी समझ और पसंद के हिसाब से  अपनी बात रखने से हिचकते नहीं है। वैसे तो हमारे चारो तरफ कहीं न कहीं राजनीति और नेताओं पर गरमा-गरम  बहस चलती रहती है। लेकिन उसका पता सबको नहीं चल पाता। जहाँ तक सोशल-मीडिया पर होने वाली  बहस का सवाल है तो उसकी पहुँच बड़े वर्ग तक होती है। और अगर बहस दिलचस्प हो तो उसकी चर्चा मुख्यधारा की मीडिया से लेकर ऑनलाइन न्यूज पोर्टलों तक पहुँच जाती है।  ट्वीटर से हम सभी परिचित हैं। इस पर रोज कई छोटे-बड़े मुद्दे ट्रेंड करते हैं। ट्रेंड से मतलब  हैशटैग के साथ किसी विचार( जैसे-   #राहुल-जी-पीएम-बनेंगे) के पक्ष या विपक्ष में  हज़ारों-लाखों  लोग ट्वीट करते हैं जिसे उस  विषय का ट्रेंड करना कहा जाता है। लोग अपनी राय रखते हैं कभी-कभी गंदी-गंदी गालियों का प्रयोग होता है। लेकिन  एक बात तो है कि जो विषय भी ट्रेंड करता या कराया जाता है उस पर आए ट्वीट पढ़कर काफी कुछ नया जानने को भी मिलता है। मुद्दे विशेष पर तमाम देशवासियों की राय जानने को मिलती है। मैं भी आज आपको आज ट्रेंड हुए दो मुद्दों पर लोगों की राय से अवगत कराना चाहता हूंँ।

24 जुलाई 2021 के दो ट्रेंड

24 जुलाई 2021 पर ट्रेंड कराया गया राहुल जी पीएम बनेंगे!


24 जुलाई 2021 को ट्वीटर पर जो मुद्दें ट्रेंड कर रहे थे उनमें से दो मुझे काफी दिलचस्प लगे। दरअसल इन पर आए ट्वीट काफ़ी दिलचस्प लगे। आप भी पढ़ें। सबसे पहले देखते हैं कि राहुल गांधी के समर्थकों और उनके विरोधियों की राहुल गांधी के पीएम बनने या न बनने को लेकर क्या राय है।  दरअसल  #राहुल-जी-पीएम-बनेंगे  ट्रेंड कराया जा रहा था(जी हाँ सियासी पार्टियाँ और उनके समर्थक इस तरह के कारनामे करते रहते हैं)। राहुल गांधी के समर्थक उनके पक्ष और विरोधी उनके विपक्ष में दिलचस्प दलील रख रहे थे। 

राहुल गांधी के समर्थकों की दलील   


कांग्रेस समर्थकों  का मानना है कि चूँकि राहुल ने किसानों और गरीबों की की आवाज उठाई है, महिलाओं की सुरक्षा और युवाओं को रोजगार की बात की है। उन्होंने देश में आर्थिक सुधारों की भी बात की है इसलिए राहुल गांधी देश के लिए महत्वपूर्ण हैं। एक अन्य यूजर को लगता है कि राहुल गांधी देश की वास्तविक आवाज है। राहुल समर्थकों ने मोदी समर्थकों  पर मीम शेयर किया।


राहुल के समर्थन में ट्वीट
                                                     


राहुल समर्थक
                                                         
      'भक्त' का होगा ऐसा हाल!
                                

कांग्रेस विरोधी भी कहाँ पीछे रहने वाले थे। उनके विचारों को भी जान लीजिए।

अच्छा जी!


ऐसा क्या?


वहीं कुछ भाई लोग ममता बनर्जी और तारक मेहता के उल्टा चश्मा वाले को पीएम पद का बेहतर दावेदार बता रहे  थे।


जोश आ गया सच्ची में!

ये मुझे मरवाएगा!


ये तो हुई एक राहुल गांधी को पीएम बनाने वाले ट्रेंड की बात। अब एक और ट्रेंड की बात करते हैं। हाल ही  में  बीएसपी प्रमुख सुश्री मायावती ने ऐलान किया था कि वो ब्राह्मणों समाज को साधने के लिए ब्राह्मण सम्मेलन का आयोजन करेंगी। बस फिर क्या था..कुछ लोगों को शायद यह अच्छा नहीं लगा या फिर उनके राजनीतिक विरोधियों ने कोई चाल चली कि ट्वीटर पर  #BSP_मिशन_भूल_ गई ट्रेंड करा दिया। इस ट्रेंड के पक्ष में ट्वीट पढ़कर लगता है कि वो बीएसपी   बहुजन समाज के हितों से समझौता कर  अपने मिशन से दूर हट गई है। हालाँकि कुछ लोगों ने बीएसपी का समर्थन भी किया।


जे बात है!



अपना-अपना राग


बड़ा ग़ुस्सा है भाई!

आँखे खोलो!

जनता समझ गई?





तो यह थी ट्वीटर पर ट्र्रेंड कर रहे दो मुद्दों पर लोगों  मिली-जुली राय। आपको यह प्रस्तुति कैसी लगी इसका पता तो 
आपकी प्रतिक्रियाओं के बाद ही लगेगा। लेकिन उम्मीद यही है कि आपको भी लोगों के रचनात्मक ट्वीट पसंद आएँगे। एक बात  गौर करने वाली है कि लोग अपनी राय  बेखौफ सामने रखते हैं जो कि एक अच्छी बात है। बहस,  वाद-विवाद के बगैर तो लोकतंत्र की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इसलिए मुझे  ऐसी बहस (भले ही प्रोयजित है) और तर्कबाजी बुरी नहीं लगती। बस थोड़ा सा इतना ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए कि शब्दों की मर्यादा न टूटे(जो कि अक्सर टूट जाती है)। फेक़ न्यूज जितना हो सके बचे। झूठे तर्क कतई न रखें, विरोध जमकर किया जाए लेकिन नफ़रत न की  जाए जैसा कि आजकल देखने में आता है। बाकी तो जो है सो है। धन्यवाद।


   -वीरेंद्र सिंह

Friday, July 16, 2021

व्यक्तित्व में निखार लाने वाली टिप्स

सोशल मीडिया पर बह रही ज्ञान- गंगा की कुछ बूँदे आपके लिए! सेवन अवश्य करिएगा!


सोशल मीडिया पर ज्ञान की गंगा बह रही है। साथ ही नफ़रत और फ़ेक न्यूज़ का गंदा नाला भी। मैं ज्ञान की गंगा में से कुछ बूंदे आपके लिए लाया हूँ जिनमें कुछ बूँदे अपने अनुभव की मिलाकर अपने तरीके से आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि इन बूंदों के सेवन से आपके व्यक्तित्व में अवश्य निखार आएगा! आपको जीवन में मनवांछित सफ़लता  हासिल करने में मदद मिलेगी! आपकी सोच-समझ में चार-चाँद लगेंगे! तो चलिए देर किस बात की! ज्ञान-गंगा की बूँदें प्रस्तुत हैं आपके लिए:-


vocalbaba.in
ऐसा सुंदर जीवन हो!

1- संसार के सबसे बड़े आश्चर्यों में से एक यह भी है कि हर  इंसान को लगता है कि वही सबसे सही बात करता है। भले ही वो पूरी तरह ग़लत हो। (अनुभव के बोल)!

2- प्रत्येक सुबह इस विश्वास के साथ अपना दिन शुरु करो कि आज का दिन बीते दिन की अपेक्षा अवश्य ही बेहतर होगा!                         

3- लंबे समय तक रहने वाली सफ़लता का एक ही रहस्य है कि रोज लगातार प्रयास करते रहिए!

4- मैं दूसरों को जज कैसे कर सकता हूँ जबकि मैं खुद ही सही नहीं हूँ!

5- हमारा हृदय उस सत्य को स्वीकार करने में अधिक वक्त लेता है जिसे हमारा मष्तिष्क पहले ही जानता है!
  

6- अपनी ख़ुशियों की चाबी दूसरों की जेब में मत रखिए!

7- हर दु:ख से हमें एक सीख मिलती है और उस सीख से हमारा जीवन बेहतर होता है!

8- जीवन की  खूबसूरत बात  यह भी है कि हम हमेशा बदलते हैं और आगे बढ़ते हैं। हमारे अतीत और गलतियों से हमें परिभाषित नहीं किया जाता!

9- क्रोध से किसी समस्या का समाधान नहीं होता! न किसी वस्तु का निर्माण होता है! उल्टे क्रोध सब बर्बाद कर देता है!

10-  ख़ामोशी का मतलब लिहाज भी होता है। लोग अक्सर इसे कमज़ोरी समझ लेते हैं!

11- जब वक्त अच्छा होता है तब दुश्मन भी आपको चाहने लगते हैं लेकिन जब वक्त बुरा होता है अपने भी पराए बन जाते हैं!

12-  दूसरों सच्चाई का दर्पण दिखाना सबको पसंद है लेकिन स्वयं कोई नहीं देखना चाहता!

13-  लोगों को अपना प्लान मत बताएँ उन्हें अपना रिजल्ट दिखाएँ!

14- जीवन एक बार ही मिला है। इसलिए उस काम को करिए जिससे आप को ख़ुशी तो मिले लेकिन दूसरों को परेशानी न हो।  ऐसे लोगों के साथ रहिए जिन्हें आपका ख्याल है!

15-  जब आप रोज़ कोशिश करते हैं तो एक दिन वो दिन बन जाएगा जिसकी कल्पना भर से आप रोमांचित हो जाते थे।

16- एक सीख यह भी है कि उन लोगों के लिए अपने आप को आवश्यकता से अधिक न झोंके जो आपके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार नहीं!

17- कभी-कभी कुछ चीजों को जितना हम नियंत्रित करना चाहते हैं उतना ही वो हमें नियंत्रित करने लगती हैं। ऐसी स्थिति में चीजों क उनके हाल पर छोड़ देना ही बेहतर होता है!

18- जब लोग आपकी योग्यता पर प्रश्नचिह्न लगाने लगे तो याद रखें कि लोगों की राय तब तक कोई मायने नहीं रखती जबतक कि आपको अपने आप पर भरोसा है। कुछ भी हो सकता है!

19- क्रोध, वह दंड है जो किसी और की ग़लती के लिए हम अपने आप को देते हैं!

20-   उस व्यक्ति की कोई मदद नहीं कर सकता जिसे स्वयं की ग़लती कभी दिखाई नहीं देती!

21- लोगों की मदद करिए। उस व्यक्ति को मुस्कराने की वजह दीजिए जिसे इसकी आवश्यकता हो!

22- असली सौंदर्य व्यक्ति की आत्मा, उसके दिमाग़ और उसके हृदय से है! किसी के चेहरे से नहीं!

23- सबसे बड़ा रोग  कि मेरे बारे में क्या कहेंगे लोग! इस रोग का इलाज आप ही के पास है! मान कर चलिए कि दूसरों के पास इतना वक़्त नहीं है कि वो आपके बारे में सोचें!

24- याद रखिए कि आज वही दिन है जिसके लिए आप कल तक चिंतित थे! 

 और इस पोस्ट के आख़िर में..


25- कभी-कभी हमें शब्द वापस लेने पड़ते हैं, अपने अहम् को एक तरफ रखना पड़ता है, और अपने गर्व से ऊँचे उठे सिर को नीचा करते हुए  मानना पड़ता है कि हम ग़लत हैं। इसे हारना नहीं कहते! इसे जीवन में आगे बढ़ना कहते हैं! समझदार होना कहते हैं!  धन्यवाद!





प्रस्तुति:  वीरेंद्र सिंह

Thursday, April 8, 2021

कोरोना: लापरवाही ने बिगाड़ा खेल

 टूट रहा है कोरोना का कहर लेकिन लापरवाही अभी भी चरम पर


7 अप्रैल 2021 को कोरोना के मामलों ने एक नया रिकॉर्ड स्थापित किया है। एक दिन में सवा लाख से ज्यादा ( पिछले 24 घंटों में एक लाख 26 हजार 789 नये केस) नये कोरोना मामले दर्ज किए गए हैं। इस दौरान कोरोना से मरने वालों की संख्या 685 रही। अपने देश में  अब तक कोरोना से 1 लाख 66 हजार से ज्यादा लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं। कोरोना के चलते देशभर में लगे लॉकडाउन की यादें आज भी ताजा हैं। अंदेशा यह है कि अगर यही सिलसिला चलता रहा तो एक बार फिर से घरों में कैद होना पड़ सकता है। देश के कई राज्यों में आंशिक या रात्रिकालीन लॉकडाउन पहले ही लग चुका है। मध्य प्रदेश में शनिवार और रविवार के कर्फ्यू की घोषणा हो चुकी है। यूपी के कुछ शहरों में नाइट कर्फ्यू की घोषणा हो चुकी है। जल्दी ही बाकी शहरों में भी लग जाएगा। वहीं कोरोना पर चर्चा के लिए 8 अप्रैल को पीएम मोदी ने मुख्यमंत्रियों की बैठक भी बुलाई है।

वास्तविक आँकड़े ज्यादा हो सकते हैं!


 टीवी  समाचारों से लेकर अन्य समाचार माध्यमों में कोरोना पर सरकारी आँकड़ों के आधार पर डिबेट होती है। लेकिन बहुत से लोगों का मानना है कि वास्तविक आँकड़े ज्यादा  भी हो सकते हैं। आए दिन फेसबुक और व्हाट्सअप जैसे सोशिल मीडिया प्लेटफॉर्म पर डॉक्टरों की आपसी बातचीत के ऑडियो वायरल होते हैं। ऐसा ही एक वायरल ऑडियो मैंने भी सुना है जिसमें एक डॉक्टप यह कहते सुना जा सकता है कि हालात बहुत खराब हैं। मरने वालों के परिजनों का विलाप सुनकर डॉक्टर डिप्रेसन में जाने की  बात कहते सुनाई पड़ते हैं। डॉक्टर यह भी कहता है कि 45 साल से ज्यादा आपकी उम्र है तो टीका जरूर लगवाएँ। बकौल डॉक्टर ..टीका लगवाने वालों की कोरोना से मौत नहीं हो रही है। डॉक्टर और भी बहुत सी बातें कहते हैं। 


 कोरोना पीड़ितो का हाल होता है बुरा!


भगवान करे कि किसी को भी कोरोना न हो क्योंकि कोरोना के इलाज के लिए तमाम तरह की मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं। खबरों से पता चलता है कि कईं जगहों पर मरीजों की संख्या के पास ऑक्सीजन नहीं है तो कईं जगह बेड कम पड़ जा रह हैं। मरीजों की संख्या के हिसाब से वेंटीलेटरों की कमी है। कोरोना का इलाज अगर सरकारी अस्पताल में हो जाए तो राहत की बात है। लेकिन प्राइवेट हस्पतालों में कोरोना के इलाज में लाखों रुपयों  तक का खर्च आ रहा है। कई ऐसे मामले सामने आए हैं जब तमाम प्रयासों के बाद भी कोरोना पीड़ितों को बचाया नहीं जा सका है। उनके परिजनों का हाल समझा जा सकता है। जो मरीज बच जाते हैं उनको लंबे समय तक कोरोना के साइड इफैक्ट के साथ जीना पड़ता है।  कम सुनाई देना, बार-बार अस्पताल जाने की आवश्कता पड़ना जैसे साइड इफैक्ट देखने को मिलते हैं। मरीज के डिप्रेशन में जाने का खतरा भी होता है! घर की आर्थिक हालत खराब हो जाती है। पीड़ित की वजह से बाकी परिजनों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।


 महानगरों को छोड़ने लगे हैं दूसरे राज्यों से आए लोग!


महामारी का सबसे ज्यादा असर समाज के निचले  तबके पर ही पड़ता है। जीविका की तलाश में  दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों का रुख करने वाले लोगों के पलायन की खबरें एक बार फिर से सुर्खियाँ बटोर रही हैं। नौकरियाँ जाने या काम-धंधा बंद होने की वजह से लोग एक बार फिर से अपने घरों की ओर रुख कर रहे हैं। पलायन करने वाले लोग नहीं चाहते कि वे फिर से उन मुश्किल हालातों का सामना करें जिनका सामना उन्होंने पिछले लॉकडाउन में किया था।

क्यो हुए ऐसे हालात?


कोरोना की पहली लहर के दौरान सबको बताया गया था और सब जान भी गए थे कि कोरोना से  बचने का एकमात्र उपाय है  दो गज की दूरी, फेसमास्क का उपयोग और समय -समय पर अपने हाथों को साबुन से धोना या सैनेटाइज करना।  बहुत से लोगों ने इन बातों पर अमल किया । लेकिन ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं  है जिन्होंने इन बातों पर अमल नहीं किया। कोरोना प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने वाले आपको हर जगह मिल जाएँगे। इस लापरवाही का नतीजा यह हुआ है कि कोरोना के मामले भी अब हर जगह सामने आ रहे हैं।  इस पोस्ट में एकदम  7 अप्रैल 2021 को दिल्ली के कनॉट प्लेस और नोएडा से ली गई तस्वीरें यह बताने के लिए काफी है कि कोरोना लोगों को गले लगाने पर क्यों ऊतारू है! नेता भी पीछे नहीं हैं। कई राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान भारी भीड़ जुट रही है।  जाहिर है कि ये लापरवाही कोरोना के प्रसार के लिए पर्याप्त है।

नेहरू प्लेस में मास्क नीचे कर सामान बेचते हुए

  नोएडा में समोसे के ठेले पर
 बिना मास्क लगाए लोग



30-35 साल से ऊपर के सभी लोगों को कोरोना का टीका लगे!


देश में अभी तक 45 साल या उससे ज्यादा उम्र वाले व्यक्तियों का कोरोना वैक्सीन दी जा रही है। हालाँकि अब यह माँग ज़ोर पकड़ रही है कि कोरोना का टीका सभी को लगाया जाना चाहिए। महाराष्ट्र ने माँग की है कि कोरोना टीकाकरण में 25 साल तक के लोगों को भी शामिल किया जाए। काँग्रेस और आम आदमी पार्टी  कोरोना वैक्सीन के मुद्दे पर  लगातार  सरकार पर हमलावर हैं। सरकार भी जवाब दे रही है। सरकार पर सवाल उठाया जा रहा है कि दूसरे देशों को वैक्सीन देने से पहले अपने देश के लोगों को कोरोना वैक्सीन क्यों नहीं दी जा रही है। हालाँकि केंद्रीय स्वास्थय मंत्री  हर्षवर्धन ने कहा कि वैक्सीन की कमी नहीं है। उन्होंने इस मुद्दे पर राजनीति न करने की सलाह दी है।  कोरोना पर नियंत्रण के लिए जरूरी है कि सरकार वैक्सीनेशन कार्यक्रम में 30-35 साल की आयु वर्ग वाले लोगों को भी शामिल करे। बता दूँ कि अब तक देशभर में 9 करोड़ से ज्यादा लोगों को कोरोना की वैक्सीन की  डोज दी जा चुकी है। काँग्रेस, आम आदमी पार्टी और महाराष्ट्र सरकार के ट्वीट के साथ-साथ डॉ. हर्षवर्धन का ट्वीट आप यहाँ देख सकते हैं।

 







अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती आम जनता!


नेहरू प्लेस में बिना मास्क लगाए दुकनदार!


बहुत से लोग कोरोना के  ऐसे हालात के लिए सरकार को ही ज़िम्मेदार मान रहे हैं। अगर हालात और बिगड़ते हैं तो शायद सरकार की और ज्यादा आलोचना  हो। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि फेसमास्क का इस्तेमाल  करने की जिम्मेदारी, दो गज की दूरी और हाथ धोते रहने की जिम्मेदारी तो हम पर ही है।  तो क्यों न वैक्सीन मिलने तक फेसमास्क का इस्तेमाल करें। दो गज की दूरी का पालन करे। और अपने हाथों को सैनेटाइज करते रहें।  हमें स्वीकारना होगा कि कोरोना की दूसरी लहर केवल और केवल हमारी लापरवाही की वजह से इतना कहर ढा रही है! पहली लहर जब दम तोड़ने ही वाली थी तो लोग इतने लापरवाह हो गए कि उन्होंने कोरोना प्रोटोकॉल की हर तरह से धज्जियाँ उड़ाई। परिणाम सबके सामने है। दु:ख की बात यह है कि इतने पर भी लोग मानने को तैयार नहीं है। अगर कोरोना के शिकंजे में आए तो सरकार का कुछ बिगड़े या न बिगड़े लेकिन कोरोना के शिकंजे में फंसे व्यक्ति का हाल बिगड़ना तय है। इसलिए बेहतर हो कि लोग अपनी जिम्मेदारी समझे और कोरोना की चपेट में आने से बचने के लिए ऐहतियात बरतते रहें। याद रखिए कोरोना पर लापरवाही आत्मघाती साबित हो सकती है!


विशेष:  किसी भी तरह की  अफवाह को जन्म देना इस आलेख का मकसद नहीं है। पाठकों से अनुरोध है कि कोरना पर ज्यादा, बेहतर और विश्वसनीय जानकारी के लिए अपने विवेक से अन्य माध्यमों का भी सहारा लें।
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ये हास्य कविता आपको पसंद आएगी...पत्नी नहीं प्रधानमंत्री हूँ!

एक अनुरोध
  ब्लॉग पर और भी रचनाएँ हैं। आप अपनी रुचि के अनुसार पढ़ सकते हैं! टिप्पणी कर सकते हैं। सुझाव दे सकते हैं! आलोचना भी कर सकते हैं! सभी पाठकों को अग्रिम शुभकामनाएँ!

Tuesday, March 23, 2021

यूपी में योगी सरकार के सामने है एक बड़ी चनौती!

  यूपी में बेसहारा पशुओं की समस्या जस की तस बनी हुई है!


हाल ही में उ0प्र0 की योगी सरकार ने चार साल पूरे किए हैं। इस मौक़े पर स्वयं सीएम योगी ने एक "विकास पुस्तिका" भी जारी की थी। इसमें कोई शक़ नहीं है कि यूपी में पिछले चार सालों में कई उल्लेखनीय काम हुए हैं। जाहिर है प्रदेश सरकार अपनी उन उपलब्धियों को लोगों को बताएगी। वहीं विपक्षी पार्टियाँ सरकार की उपलब्धियों को लेकर उस पर हमला करेंगी। सोशल मीडिया पर भी योगी सरकार की प्रमुख उपलब्धियों की चर्चा हो रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बहुत से लोगों की बातें मैंने सुनी। उनका मानना है कि योगी सरकार के चार साल के कार्यकाल की तुलना अगर पूर्ववर्ती सपा और बसपा सरकारों के कार्यकाल से की जाए तो योगी सरकार में क़ानून व्यवस्था बहुत सही रही है। वहीं  नौकरी देने के मामले में भी योगी सरकार ने बाजी मारी है।  योगी सरकार के चार साल पूरे होने  पर एक सर्वे भी आया था। सर्वे में लोगों की राय थी कि क़ानून व्यवस्था के मामले में सीएम योगी नंबर वन हैं। वहीं नौकरी देने के मामले में भी राज्य सरकार ने  बेहतर प्रदर्शन किया है। सर्वे के मुताबिक अगर यूपी में आज चुनाव हो तो सूबे में बीजेपी की सरकार की वापसी होगी। स्पष्ट है सर्वे के निष्कर्षों से बीजेपी गदगद होगी। यहाँ सर्वे की विश्वसनीयता पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। 



यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ


स्मार्टफोन और लैपटॉप के दुष्प्रभावों से अपनी आँखों की रक्षा कैसे करें?


योगी सरकार के चार साल के कार्यकाल पर आख़िरी फ़ैसला जनता को करना है।  लेकिन लगता जरूर है कि इस सर्वे में यूपी के ग्रामीणों और विशेषकर किसानों की राय शायद शामिल नहीं हो! ऐसा इसलिए क्योंकि सूबे के किसान बेसहारा जानवरों विशेषकर गो-वंश से परेशान हैं। राज्य सरकार भी इस तथ्य से भली भाँति परिचित है कि तमान पशुपालकों ने अनुपयोगी गो-वंश को बड़े पैमाने पर बेसहारा छोड़ दिया है। यह बेसहारा छोड़ गए जानवर किसानों को चैन की नींद नहीं लेने दे रहे हैं। हालाँकि राज्य सरकार ने इस समस्या से निजात पाने के लिए प्रयास  किए लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है।


गो-वध करने वालों के लिए सख्त सज़ा का प्रावधान

आपको याद होगा कि 2017 में योगी सरकार ने गो-वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। वर्तमान में उ0प्र0 में गो-वध करने वालों पर कड़ी  सजा और आर्थिक जुर्माने का भी प्रावधान है। गो-वध में लिप्त लोगों को 10 साल की सजा और 5 लाख तक का जुर्माना हो सकता है। अंग-भंग करने पर 7 साल की सज़ा और 3 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। गो-वध के मामलों में संलिप्त व्यक्ति अगर दूसरी बार भी गो-वध करते पकड़ा जाता है तो उस पर गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई हो सकती है।

  पढ़े मजेदार व्यंग्य इस लिंक पर... वो दिन अब न रहे

रात में चारा तलाश करती गाय


गाय को मिला है गोमाता का दर्जा

हम जानते हैं कि गाय के साथ हिंदुओं  की गहरी आस्था जुड़ी है। गाय को गोमाता का दर्जा दिया गया है। प्राचीन काल से ही गाय हमारे लिए पूज्य है। गाँवों में आज भी पहली रोटी गाय को खिलाई जाती है। पूजा इत्यादि में पूजे हुए भोज्य पदार्थ या खाद्य वस्तुएँ गाय को ही खिलाई जाती है। नवजात शिशुओं के लिए उनकी माँ के बाद गाय के दूध को ही सर्वोत्तम आहार माना गया है। यह भी माना जाता है कि गाय के दूध से बने घी के सेवन से इंसान की आँखों की रोशनी बढ़ती है। और यह भी माना जाता है कि  गाय के दूध में हल्दी मिलाकर पीने से कैंसर जैसी भयानक बीमारी पास नहीं फटकती है। उप्र की  आबादी हिंदू बहुल है। सूबे में गो-वध पर प्रतिबंध लगते ही ज्यादातर लोगों विशेषकर  हिंदुओँ ने योगी सरकार के इस फैसले का स्वागत किया था। देखा जाए तो इस फैसले में कुछ गलत भी नहीं था। उप्र के राजनीतिक और सामाजिक हालातों को देखते हुए गो-वध पर प्रतिबंध का फैसला एक सही कदम माना गया था। 

खेतों में बेसहारा गायें

उम्र बढ़ाओ भगवान वरना नहीं करेंगे काम

गायों की दुर्दशा और किसानों को हो रही समस्या

 दरअसल  जब गो-वध पर प्रतिबंध लगा है तब से सीधे तौर पर मांस  के लिए गायों की खरीदारी करने वालों लोगों ने गाय खरीदना बंद कर दिया है। ऐसे में जिन पशु-पालकों के पास दूध  न देने वाली या बूढ़ी गायें हैं, वे इऩ गायों को उनकी देखभाल से बचने के लिए उन्हें खेतों में बेसहारा छोड़ देते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि ये गायें किसानों की  फसल और  खा जाती हैं और जहाँ से गुजरती हैं उस जगह की फसल ख़राब हो जाती है। हालात यहाँ तक पहुंच चुके हैं कि किसानों को अपनी फसलों के चारों तरफ रस्सी बाँधनी पड़ रही है। लेकिन यह काम चलाऊ तरीका काम नहीं कर रहा है।  दिन-रात कभी भी यह खबर आ जाती  है कि भैया तुम्हारे खेतों में गाय घुस आयी हैं। जाकर उऩ्हें बाहर निकाल दो। किसान को उसी वक्त  अपने खेत की तरफ दौड़ लगानी पड़ती है।रात के वक्त गली-मुहल्लों में चारे में तलाश में इधर-उधर मारी फिरती हैं। गायों की वजह से होने वाली इस परेशानी से बहुत से किसान  बहुत नाराज हैं। ये किसान  अगले साल होने वाले यूपी विधानसभी चुनाव में योगी सरकार विरोधी रवैया अपना सकते हैं। 

खेत के चारों और बंधी रस्सियाँ



समस्या के समाधान के प्रयास नाकाफी सिद्ध हुए !

यहाँ यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि 2019 में योगी सरकार ने  स्वीकार किया था कि प्रदेश में 10-12 लाख आवारा पशु हैं और बेसहारा गायों की देखभाल एक बड़ी समस्या है जिसके समाधान के लिए  "मुख्यमंत्री  बेसहारा  गौवंश सहभागिता योजना" को  मंजूरी दी गई थी। योजना के तहत बेरोजगार लोग बेसहारा गायों की देखभाल का जिम्मा उठा सकते हैं। इसके बदले में उन्हें एक गाय के लिए रोजाना 30 रुपये के हिसाब से महीने में 900 रुपये यूपी सरकार देगी। इसका मतलब यह हुआ कि अगर कोई व्यक्ति 5 बेसहारा गायों की देखभाल करता है तो उसे महीने में 4500 रुपये सरकार से मिलेंगे।  यूपी सरकार को लगा था कि इस योजना से आवारा पशुओं की समस्या का समाधान भी होगा और रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। लेकिन इस योजना का असर जमीन पर अभी तक तो दिखाई नहीं दिया है। 

क्यों कारगर नहीं रहा यह उपाय?

मैंने जब किसानों से बेसहारा गौ-वंश के  लिए किए जा रहे योगी सरकार के उपायों के बारे में पूछा तो एक भी किसान ऐसा नहीं था जिसे इस योजना के बारे में जानकारी हो। इसका मतलब यह है कि योजना के क्रियान्वयन का जिम्मा जिन लोगों पर है उन्होंने इस योजना का व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं किया। जब लोगों को पता ही नहीं तो कोई इस योजना का लाभ उठाए भी तो कैसे?

उपर्युक्त योजना के अतिरिक्त बेसहारा गौवंशों की देखभाल और उनके संरक्षण के लिए और भी बहुत से "कान्हा उपवन" जैसी योजनाएँ लाई गई हैं लेकिन  कोई भी उपाय इस समस्या का समाधान नहीं कर सका है।


क्या वाकई योगी सरकार ग़लत है?

इस लेख का इरादा योगी सरकार पर निशाना साधना नहीं है।  दरअसल योगी सरकार ने तो लोगों की भावनाओं का ख्याल रखते हुए गो-वध पर प्रतिबंध लगाया था। समस्या की जड़ वे लोग हैं जिन्होंने गायों का दूध पीकर उन्हें बेसहारा छोड़ दिया। जब  गायों की देखभाल का समय आया तो इऩ लोगों ने उन्हें जंगलों में छोड़ दिया। अच्छी बात यह है कि सभी लोग अपनी गायों को लावारिस नहीं छोड़ते लेकिन ऐसे लोगों की संखया भी कम नहीं है जो बूढ़ी और दूध न देने वाली गायों को जंगलों में छोड़ रहे हैं।  ऐसे लोगों की करतूतों का खामियाजा सूबे की वर्तमान योगी सरकार को भुगतना पड़ सकता है।  मुझे पूरा विश्वास है कि गो-वध पर प्रतिबंध लगाते वक्त यूपी सरकार को ऐसे हालात उत्पन्न होने का अंदाज़ा नहीं होगा। उल्टे सरकार को विश्वास रहा होगा कि लोग इस फैसले का स्वागत करेंगे। लोगों ने स्वागत किया भी लेकिन सभी लोगों ने पूरा सहयोग नहीं किया। 


फसल का हो जाता है यह हाल

रावण के पूर्वजन्म की दिलचस्प कथा

क्या कहते हैं किसान?

मैंने स्वयं ऐसे किसानों से  बात की है। लगभग सभी किसानों का एक स्वर में यह मानना था कि लावारिस गायों की वजह से वे वाकई बहुत परेशान हैं। कुछ किसानों ने इसके लिए योगी सरकार को जिम्मेदार ठहराया।  योगी सरकार से नाराज़ किसानों का मानना है कि गो-वध पर रोक से गायों की हत्या पर तो रोक नहीं लगी है उल्टे गाय पालने वालों का भी नुकसान हुआ है क्योंकि वे अब दूध नहीं देने वाली बूढ़ी. कमज़ोर और बीमार गायों को बेच नहीं सकते जिसके चलते ये किसान गायों को जंगलों में छोड़ने के लिए विवश हैं। वहीं जो लोग पहले बेरोक-टोक गो-हत्या करते थे आजकल वे चोरी -छिपे गो-वध करते हैं। अब उन्हें मुफ्त में गाय का मांस उपलब्ध हो रहा है। इसकी वजह यह है कि जंगल में घूम रही गायें आसानी से गो-हत्या करने वालों के हाथ लग जाती हैं। जो नहीं लगती वे किसानों की मार खाती हैं। ज्यादातर गायों की हालत "न घर की न घाट की" वाली हो चुकी हैं।  हालाँकि सभी किसान ऐसा नहीं सोचते।  बहुत से किसानों ने इसके लिए उन लोगों को दोषी ठहराया जो अपनी गायों की देखभाल से बचने के लिए उऩ्हें जंगलों में छोड़ आते हैं। अब संपूर्ण यूपी के किसान इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं यह जानना भी काफी महत्वपूर्ण है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि गोवध पर रोक लगाने  के बाद अपनी गायों को बेसहारा जंगल में छोड़ने वालों लोगों को ऐसा करने से रोकने के लिए पर्याप्त सरकारी प्रयास नहीं हुए हैं। इसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है।


क्या किया जा सकता है?

सबसे पहले तो राज्य सरकार को यह देखना चाहिए कि उसके प्रयासों से पर्याप्त सफलता क्यों नहीं मिल रही है। उनकी कमियों को खोजकर उन कमियों को दूर करे। दूसरी बात यह है कि जो भी प्रयास हों वो व्यावहारिक होने चाहिए। मसलन सरकार आर्थिक सहायता देकर पशुपालकों को प्रेरित कर सकती है कि वो अपने गौवंश को बेसहारा न छोड़े। मैंने जितने किसानों से बात की लगभग सभी ने यह स्वीकार किया कि सरकार सीधे पशुपालकों को प्रोत्साहित करे और जरूरत पड़े तो दंडित भी करे। यह समस्या ऐसी नहीं है जिसका कोई समाधान हो ही न सके। बाकायदा बेसहारा गौवंशों की संख्या का पता लगाया जाए। समस्या से जुड़े सभी पहलुओं पर व्यापक चर्चा और विचार-विमर्श किया जाए और इसके बाद व्यवहारिक रणनीति बनाकर उसका व्यापक प्रचार प्रसार कर उस पर अमल किया जाए। रणनीति में पशुपालकों को जोड़ने की संभावना पर भी विचार किया  जाए। 
                                                  


2022 के विधानसभा चुनावों पर पड़ सकता है असर!

यह तो स्पष्ट है कि बेसहारा गायों की दुर्दशा योगी सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। वहीं किसानों को हो रही  परेशानियों का समाधान भी जरूरी है। इस समस्या के प्रभावी समाधान न होने का थोड़ा-बहुत असर यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों पर भी हो सकता है। सरकार के कामकाज को लेकर सर्वे करने वालों को किसानों को भी अपने सर्वे में शामिल करना चाहिए। फिलहाल तो यही उम्मीद की जा सकती है  कि योगी सरकार बेसहारा गायों की दुर्दशा को रोकने के लिए और भी ज्यादा प्रभावकारी उपाय अपनाएंगी जिससे किसान भी राहत की साँस ले सकें। 

    विशेष:  आलेख के सभी चित्रों का संकलने मैंने स्वयं ग्रामीण इलाकों से किया है। सभी चित्र पिछले 15 दिनों के दौरान लिये गए हैं। योगी जी का चित्र एक सरकारी विज्ञापन से स्क्रीनशॉट के माध्यम से लिया गया है।
                 

  -वीरेंद्र सिंह                                   

Monday, March 22, 2021

स्मार्टफोन और कंप्यूटर के दुष्प्रभावों से आँखों के बचाव के टिप्स

आँखे हमारे शरीर का सबसे अनमोल अंग है। इसलिए इनकी सेहत का ख्याल रखना हमारी प्राथमिकता  में होना चाहिए!  स्मार्टफोन, लैपटॉप और कंप्यूटर के अत्यधिक इस्तेमाल से हमारी आँखों  पर बहुत बुरा असर पड़ता है। अगर हम कुछ बातों का ध्यान रखें तो स्मार्टफोन, लैपटॉप और कंप्यूटर के दुष्प्रभावों से हम अपनी आँखों को आसानी से बचा सकते हैं।  सबसे पहले स्मार्टफोन इत्यादि के इस्तेमाल से हमारी आँखों पर पड़ने वाले असर की बात करते हैं।  एक अनोखी प्रेम कहानी प्रेमबाण

save your precious eyes from laptops, smartphones and computers
सांकेतिक चित्र



 स्मार्टफोन से होने वाले दुष्प्रभाव के कारण:

स्मार्टफोन की स्क्रीन से नीली रोशनी (Blue Light) निकलती है। यह रोशनी अत्यधिक उर्जा वाली होती है और आँखों के रेटिना पर असर डालती है। इतना ही नहीं नीली रोशनी हमारे सोने-जगने के चक्र को भी प्रभावित करती है। सोने-जगने की प्रक्रिया  हमारे मस्तिष्क द्वारा नियंत्रित होती है। इससे स्पष्ट है कि यह हमारे मस्तिष्क को भी प्रभावित करती है। पढ़े मजेदार व्यंग्य अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे


save your eyes from computer, laptops and smartphones.
सांकेतिक चित्र



क्या-क्या दुष्प्रभाव होते हैं?


1-आँखों में जलन, चुभन और और सूखापन (जिसे अंग्रेज़ी में ऑक्युलर ड्राइनैस भी कहते हैं) होना
2-आँखों में पानी आना, खुजली होना और सिर में दर्द होना
3- देखने में धुंधला दिखाई देना
4- आँखों में तनाव और थकान होना
5- धीरे-धीरे नज़र कम होते जाना

दुष्प्रभावों से बचने के उपाय या टिप्स


स्मार्टफोन, लैपटॉप और कम्यूटर के चलते आँखों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों से बचने के लिए हमें निम्न बातों पर ध्यान रखना होगा:


1-  सबसे पहले तो अपने स्मार्टफोन की स्क्रीन पर ब्लू लाइट फिल्टर को ऑन करें। स्क्रीन की चमक यानी ब्राइटनैस को कम रखें। 

2- स्मार्टफोन पर काम करते वक्त निरंतर पलक झपकाते रहें। थोड़ी--थोड़ी देर  बाद स्मार्टफोन से नज़र हटाकर  कुछ दूरी पर देखा करें। पढ़े मजेदार व्यंग्य

3- फोन को इस्तेमाल करने का सही तरीका अपनाएँ।

4- सीधे बैठकर फोन को अपनी आँखों से थोड़ी दूर रखकर प्रयोग करें।

5-  फोन की स्क्रीन पर फॉन्ट साइज  बड़ा रखें। इससे आँखों पर कम ज़ोर पड़ता है।

6- हो सके तो स्मार्टफोन की लत से बचे। एक दिन में 2-3 घटें से ज्यादा इसका प्रयोग न करें तो बेहतर हो।
7- सप्ताह में 1 या 2 दिन डिजिटल उपवास करें।  डिजिटल उपवास से मतलब होता है कि आप किसी निश्चित दिन या समय पर स्मार्टफोन या लैपटॉप का बिल्कुल इस्तेमाल न करें।

8- सोने से कम से कम 2 घंटे पहले स्मार्टफोन का प्रयोग बंद कर दें। इससे आपको नींद आने में  भी आसानी होगी और आँखों को भी आराम मिलेगा।पढ़े एक प्रेरणास्पद कविता

9-  नियमित तौर पर अपनी आँखों  का चैकअप नेत्र रोग विशेषज्ञ से कराएँ उसकी सलाह माने।


      कंप्यूटर और लैपटॉप प्रयोग करते हुए भी कुछ सावधानियाँ अवश्य बरतनी चाहिए:

1-  स्क्रीन की चमक यानी उसकी ब्राइटनैस को कम रखें।
2- अपने स्क्रीन पर एंटी ग्लेयर स्क्रीन का प्रयोग करें।
3- चश्में पर एंटी रिफ्लेक्टिंग कोटिंग कराएँ।
4- हर 15-20 मिनट  बाद स्क्रीन से आँख हटाकर 15 से 20 बार अपनी पुतिलयों को झपकाएँ।
5- लैपटॉप या कंप्यूटर पर काम करते वक्त आँखों में किसी भी प्रकार की परेशानी या अनइजीनैस फील करते हैं तो तुरंत  अपने नेत्र चिकित्सक से मिलें।
6- सलाह यह भी है कि अगर आप रोजाना इन लैपटॉप या कंप्यूटर का इस्तेमाल 6 से 8 घंटे या उससे ज्यादा करते हैं तो आप को अपनी आँखों का चैकअप अवश्य कराना चाहिए। भले ही आप अभी किसी भी प्रकार की दिक्कत का अनुभव नहीं कर रहे हों। 

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उपरोक्त बातों के अलावा अपने खान-पान पर नज़र रखें। स्वस्थ खान-पान की सलाह सभी डॉक्टर देते हैं। आँखो के लिए विटामिन ए युक्त आहार को अपने भोजन में शामिल करें।  रोजाना व्यायाम यानी एक्सरसाइज  जरूर करें। पढ़े दो पत्नियों की कथाएँ

अधिक और बेहतर जानकारी के लिए आँखों के डॉक्टर से अवश्य सलाह लें।

                                           


Sunday, March 21, 2021

100 करोड़ रुपये वाले मंत्री जी को बनाए प्रेरणास्रोत!


100 करोड़ रुपये महीने की अतिरिक्त आय वाले मंत्री जी की आलोचना न करें बल्कि उनकी मज़बरी समझें! उनसे प्रेरणा लें!



एक मंत्री जी ख़बरों में हैं! कहा जा रहा कि मंत्री जी ने आदेश दिया था कि अतिरिक्त कमाई का टार्गेट ऊँचा करो! 21वीं सदी के हिसाब से मंत्री जी ने अतिरिक्त कमाई के टार्गेट को 100 करोड़ रुपये प्रति माह  रखने पर जोर दिया था! उन्होंने  वाकायदा सिद्ध करके बताया था कि  ये ऊँचा टार्गेट कैसे हासिल कर सकते हैं! अब उनकी आलोचना शुरु हो गई है।  मेरा मानना है कि उनकी अलोचना से कुछ हासिल न होगा! उन्हें अपना प्रेरणास्रोत बनाने से बहुत कुछ हासिल हो सकता है! वैसे आम जनता को भी यह सीखना चाहिए कि अतिरिक्त कमाई का ऊँचा टार्गेट कैसे सेट किया जाए और उसे कैसे हासिल किया जाए?  मंत्री जी से तरक्की की  टिप्स तो ले ही सकते हैं!  मंत्री जी अनुभवी हैं। वो भविष्यदर्शी भी हैं। उन्हें पता है कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं। बड़े-बड़े बंगले और और चमचमाती गाड़ियाँ  केवल लाखों के वेतनमान से नहीं मिल जाते! अतिरिक्त कमाई करनी पड़ती है! उस कमाई का टार्गेट ऊंचा रखना पड़ता है! मंत्री जी जानते हैं कि आजकल 40-50 करोड़ में कुछ न होता! सबका ख्याल रखना पड़ता है!  मिल-बाँटकर खाने का रिवाज है! फिर आज मंत्री हैं। कल रहें न रहें। मगर ख़र्चे तो रहेंगे! वहीं आने वालीं पीढ़ियों के लिए कुछ न किया तो वे भी बुरा मान मान जाएँगी! गालियाँ देकर कहा करेंगी कि  हमारा दादा-परदादा तो मंत्री रहा था मगर हमारे लिए स्विटजरलैंड के  बैंकों में कैश,  अमेरिका में बंगले, मुंबई में 200-300 फ्लैट,  दो-चार हजार महँगी गाड़ियाँ और चाँद पर 20-25 घरों का जुगाड़ करके भी न गया? मंत्री क्या झक मारने के लिए बना था? 


 "दिक्कत ये भी है कि मंत्रीजी चाहकर भी 100 करोड़ रुपये महीने से कम नहीं कमा सकते! उन्हें भी तो चार मंत्रियों के बीच बैठना पड़ता है!"



"100 करोड़ महीने की कमाई वाले मंत्री जी से यह सीख मिलती है कि लक्ष्य ऊँचा रखें! भलाई और मलाई, दोनों इसी में हैं!"

ऊँचे लक्ष्य रखने की बात तो बड़े-बड़े मोटिवेशनल गुरु भी करते हैं। ऊपर से रिश्तेदारों, दोस्तों और सगे संबंधियों का  दबाव होता है।  फलाँ नेता ने तो इतने कमा लिए? 10-20 करोड़ तो फलाँ मंत्रीजी के कुर्ते की जेब में पड़े रहते हैं! ऐसे डायलॉगों  के निरंतर दबाव का जवाब  देना मंत्रीजी की नैतिक जिम्मेदारी होती है!  एक मजबूरी यह भी है कि एक मंत्री को भी अन्य चार मंत्रियों के बीच बैठना पड़ता है! लिहाजा 100 करोड़ रुपये महीने की अतिरिक्त कमाई का टार्गेट फिक्स करने के पीछे की मजबूरी को समझा जा सकता है! बहुत सोच-विचार करने पर मंत्रीजी को अहसास हुआ होगा कि भलाई और मलाई 100 करोड़ रुपये महीने की ऊपरी कमाई में  ही हैं! 100 बातों की एक बात यह भी है कि 21वीं सदी में अगर कोई मंत्री 100 करोड़ रुपये महीने की अतिरिक्त आय न कर सके तो फिर मंत्री क्या झक मारने के लिए बना है? 

"100 करोड़ महीने पर इतना बवाल ठीक नहीं! 21वीं सदी में महीनेभर में 100 करोड़ भी न कमा सके तो मंत्री क्या झक मारने के लिए बनें हैं!"

वहीं जो मंंत्री अभी तक अतिरिक्त कमाई के निचले स्तर पर  ही अटके पड़े हैं वे भी 100 करोड़ वाले  मंत्री जी से प्रेरणा लें  और आत्मविश्वास के साथ अपने लक्ष्य रिवाइज करें! क्रिकेट में जब कोई खिलाड़ी शतक मारता है तो  बाकी खिलाड़ी दोहरा शतक मारने का इरादा रख मैदान में उतरतो हैं! इसी तर्ज पर बाकी मंत्रियों को अपनी अतिरिक्त आय का टार्गेट कम से कम 150 से 200 करोड़ रुपये महीने या उससे भी अधिक रखकर  अपनी योग्यता का परिचय देना चाहिए! जो सांसद या विधायक किसी वजह से मंत्री न बन सके हों उन्हें भी आगे बढ़ने का पूरा हक़ है इसलिए महीने में 100 करोड़ की अतिरिक्त कमाई करने वाले मंत्रीजी को गुरु मान लें और एकलव्य की तरह  अपनी हैसियत और ज़रूरत  के मुताबिक प्रतिमाह अतिरिक्त आय का टार्गेट फिक्स कर उसे हासिल करें!  तरक्की करें! नौकरी-पेशा भी अतिरिक्त आय की बहती गंगा में हाथ धो सकते हैं! जहाँ तक आम जनता की बात है तो उसे तो फिलहाल सिर्फ कमाई की चिंता है क्योंकि कोरोना काल में ठप  हुई कमाई अभी तक शुरू नहीं हो सकी  है लिहाजा आम जनता की प्राथमिकता में अतिरिक्त आय नहीं है! केवल आय है!


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                 - वीरेंद्र सिंह

Wednesday, March 17, 2021

शैव्या - नारी शक्ति का प्रतीक

हिंदू पौराणिक ग्रंथ, पद्म पुराण में एक महान पतिव्रता स्त्री की कथा मिलती है। इस स्त्री का नाम शैव्या था।  कथा के अनुसार प्रतिष्ठानपुर नगर में शैव्या नाम की एक पतिवत्रा स्त्री रहती थी। उसका पति कौशिक नाम का एक ब्राह्मण था जो अत्यधिक क्रोधी था।  वह शैव्या पर क्रोधित होता , उसका अपमान करता लेकिन शैव्या अपने पति का बेहद सम्मान करती थी। कौशिक कोढ़ से पीड़ित था जिसके चलते उसके सभी सगे-संबंधी उसे छोड़कर चले गए थे। लेकिन उसकी पत्नी अपने पति की तन-मन से सेवा करती रही। एक दिन कौशिक ने एक अत्यधिक रूपवान वैश्या को देखा। वो उससे मिलने को व्याकुल हो उठा। उसने अपनी पत्नी से सारी  बात बताई और उससे निवेदन किया कि वो उसे उस वैश्या के  पास लेकर चले। 



शैव्या को अपनी पति की इस इच्छा पर जरा भी क्रोध नहीं आया। उसने प्रसन्नतापूर्वक अपने पति की इच्छा को पूरा करने का प्रण किया।  उसने  कुछ विचार किया और पहले उस वैश्या के पास गई। शैव्या ने उसे अपने पति की इच्छा के बारे में बताया।  उस वैश्या ने कहा कि अपने पति को आधी रात के बाद लेकर आना। 

शैव्या ने आधी रात के  बाद अपने पति को कंधे पर डाला और वैश्या के घर की ओर चल पड़ी। रात होने के कारण कुछ दिखाई नहीं देता था। रास्ते में माण्डव ऋषि, चोरी के आरोप में सूली पर इस प्रकार लटके थे कि कोई सूली हिला दे तो उन्हें अत्यधिक पीड़ा होती थी। माण्डव ऋषि अपने शक्ति के प्रभाव से इस पीड़ा से बच सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि उनका विश्वास था कि बचपन में चीटियों को काँटे चुभोने के चलते उन्हें इस कष्ट से गुजरना पड़ रहा है। अंधेरे में शैव्या के पति का पैर सुली से टकरा गया जिससे  ऋषि को अत्यधिक कष्ट हुआ। उन्होंने तुरंत शाप देते हुआ कहा कि जिसने भी सुली को हिलाया है सूर्य निकलते ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। शैव्या ने ऋषि को समझाने का प्रयास कि अंधेरा होने की वजह से ऐसा हुआ इसलिए वो अपना शाप वापस लेले। माण्डव ऋषि ने शाप वापस लेने से मना कर दिया। शैव्या ने ऋषि को चुनौती देते  हुआ कहा कि अगर वो अपना शाप वापस नहीं लेंगे तो वो कल सूर्य उदय ही नहीं होने देगी। और फिर ऐसी ही हुआ। जब सूर्य नहीं निकला तो सृष्टि में हाहाकार मच गया। अंत में स्वयं बृह्मा ने आकर शैव्या  को वचन दिया कि सूर्य निकलने पर उसके पति को वो जीवित कर देंगे। इस प्रकार एक पतिव्रता स्त्री ने न केवल अपने पति के प्राणों की रक्षा की अपितु उसे स्वस्थ भी कर दिया। (जैसा कि ऑनलाइन माध्यमों में वर्णित है)
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पद्मपुराण में कथा कैसे वर्णित है यह स्वयं पढ़कर ही पता चलेगा। इस कथा को आमजन भी कुछ अलग प्रकार से सुनते सुनाते हैं। अपनी सूझ-बूझ, चतुराई, अज्ञानता या फिर स्वार्थवश या समयानुसार कुछ परिवर्तन भी कर देते हैं।   अब इस कथा पर आधारित लोककथा का वर्णन करूंगा जो अत्यधिक रोचक है।

एक समय की  बात  है कि एक गाँव में एक धनी व्यक्ति रहता था।  उसकी पत्नी एक साधारण महिला थी लेकिन वो अपने पति से अत्यधिक प्रेम करने वाली एक पतिव्रता स्त्री थी। अपने  पति के अतिरिक्त वो किसी अन्य पुरुष से बात नहीं करती थी।  गाँव के लोग उसे लज्जावती के नाम से पुकारते थे। लज्जावती का पति एक नंबर का दुष्ट था। वो परस्त्रीगमन करता था।  उसके पास धन की कमी भी नहीं थी। नगर की सबसे सुंदर वैश्या से उसका याराना था। उसने लज्जावताी के तमाम गहने भी उस वेश्या को दे दिए थे। लज्जावती यह सब जानती थी लेकिन उसने कभी अपने पति का विरोध नहीं किया था। पति के सुख को वो अपना सुख समझती थी।  लज्जावती के पति को एक भयानक बीमारी ने घेर लिया। वो कोढ़ से ग्रस्त हो गया। धीरे-धीरे उसकी अवस्था बिगड़ने लगी। उसका स्वास्थय नष्ट होने लगा। धन तो पहले ही समाप्त हो चुका था। ऐसी हालत में  उस वैश्या ने भी उससे मिलने से इंकार कर दिया।



लज्जावती दिन-रात अपने पति की सेवा करती।  यह देखकर उसके पति को अपने किए पर पछतावा होता। लेकिन अब क्या हो सकता था?  एक दिन लज्जावती के पति को लगा कि उसका अंत कभी भी हो सकता है। उसने अपनी पत्नी से कहा कि सबकुछ जानते  हुए भी  तू मेरी इतनी सेवा करती है। मुझे अपने किए पर बहुत पछतावा है। उसने लज्जावती से कहा कि तू मेरी एक  इच्छा  और पूरी कर दे।  तू एक बार मुझे उस वैश्या के पास लेकर चल। लज्जावती को भी यह अहसास था कि यह उसके पति की आखिरी इच्छा भी हो सकती थी। उसने हर हाल में अपने पति को उस वैश्या के पास  ले जाकर उसकी इस इच्छा को पूरा करने का प्रण किया।

उसी रात वो अपने पति को कंधे पर डालकर उस वेश्या के पास ले जाने लगी जिससे उसका पति अंतिम बार मिलना चाहता था। अंधेरा घना था। लज्जावती को केवल यही ध्यान था कि वो हर हाल में अपने पति की अंतिम इच्छा को पूरा करेगी। मार्ग में एक ऋषि तपस्यारत थे। होनीवश लज्जावती  का पैर ऋषि के जल के लौटे में लग गया। पैर लगते ही लौटा उलट गया और सारा जल बिखर गया जिससे ऋषि अत्यधिक क्रोधित हुए। क्रोध में ऋषि ने शाप दिया कि जिसके ध्यान में तुने मेरे जल के पात्र को पैर से गिरा दिया वो सूरज की पहली किरण के साथ मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। ऋषि के ऐसे वचन सुनकर लज्जावती ने कहा कि हे ऋषिवर आपके जल के पात्र को मैंने जानबूझकर पैर नहीं मारा है। भूलवश मुझसे यह अपराध हुआ है। फिर जो अपराध मुझसे हुआ है उसका दंड आप मेरे पति को न दें।  लज्जावती ने हर तरह से ऋषि से क्षमा माँगी। अपने पति की अंतिम इच्छा के बारे में भी बताया। और यह भी बताया कि अगर वो अपने पति की अंतिम इच्छा  पूरी नहीं कर सकी तो जीवित नहीं रह सकेगी। अंत में लज्जावती ने कहा कि ऋषिवर मेरी भूल का दंड मेरे पति को देने का आपको कोई अधिकार नहीं है। 

लेकिन ऋषि ने लज्जावती की  एक न सुनी। लज्जावती ने फिर से विनती कि आप अपना शाप वापस ले लीजिए। मान जाइये। लेकिन ऋषि टस से मस न हुए। लज्जावती को क्रोध आ गया। क्रोध भरी वाणी में उसने ऋषि से कहा कि अगर  आप हठ नहीं छोड़ते तो मेरा भी प्रण है कि मैं सूरज ही नहीं निकलने दूँगी।  ऐसा कहकर लज्जावती  कंधे पर अपने पति को लटकाए एक पैर पर खड़ी हो गई। उस पतिव्रता की शक्ति के सामने भगवान भास्कर असहाय हो गए।  सारे जगत में त्राहिमाम मच गया। अंत में स्वयं ब्रह्मा ने लज्जावती से निवेदन किया कि वो अपनी जिद छोड़ दे। लेकिन लज्जावती ने कहा कि अगर सूरज निकलने देती हूँ तो मेरे पति के प्राणों का क्या होगा? तब ब्रह्मा ने कहा कि हे देवी मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि सूरज निकलने से तेरे पति के प्राण निकलने पर मैं उसे जीवित भी करूंगा और उसे स्वस्थ भी कर दूँगा। अब तू अपनी जिद छोड़ दे। ब्रह्मा के आश्वासन पर लज्जावती ने अपनी शक्ति वापस ले ली और  सूरज फिर से निकल आया।   लज्जावती का मरने के बाद जीवित हो उठा।  लेकिन पूरी तरह स्वस्थ और पहले से अधिक सुंदर और आकर्षक पुरुष के रूप में। लज्जावती के पति को भी अपनी भूल का ज्ञान हुआ इसलिए उसने अपनी पत्नी से क्षमा माँगी। अपने पति को पुनः पाकर लज्जावती की आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।



                   प्रस्तुति: - वीरेंद्र सिंह