Friday, January 22, 2021

जन्नत की हूर भी तेरे पैरों की धूल है


Ghazal on a stunning beauty. Beautiful girl.
सांकेतिक चित्र


शिक़वे शिकायतों की बातें फ़िज़ूल हैं,

हर रंग मेरे महबूब का मुझे क़ुबूल है।

ख़ता कोई भी तुमसे  हो नहीं सकती,

दामन पे तेरे दाग़ ज़माने की भूल है।

 धरती पे न होगी तेरे हुस्न की मिसाल,

 जन्नत की हूर भी तेरे पैरों की धूल है।

देखे तुम्हें ये चांद  इजाज़त नहीं उसे,

है तेरी सुगंध मेरी बस तू मेरा फूल है।

ये वादा है इशारों पे तेरे जान भी देंगे

  तोड़े नहीं वादा कभी अपना उसूल है।


-वीरेंद्र सिंह

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26 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन  में" आज शुक्रवार 22 जनवरी 2021 को साझा की गई है.........  "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. जी धन्यवाद। बहुत दिनों बाद आपका कॉमेंट मेरे ब्लॉग पोस्ट पर दिखाई दिया है। इसके लिए भी आपका आभार। सादर।

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  3. अद्भुत 👏👏👏
    पढ़ते ही श्रृंगार रस की साक्षात अनुभूति।
    निश्चय ही पाठक ऐसी रसमय रचनाओं के आस में उत्कंठित होते हैं होते हैं जिसमें मैं भी एक हूँ।
    बधाई एवं आशीष शुभकामनाएं।
    सादर।

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    1. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। उम्मीद है आपको यह रचना पसंद आई होगी।

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    1. आभार सर। आगे भी आते रहिएगा।

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  5. देखे तुम्हें ये चांद इजाज़त नहीं उसे,
    है तेरी सुगंध मेरी बस तू मेरा फूल है!!
    किसी विशेष के लिए गहन अनुराग की अनुभूति कराती बहुत सरस, मधुर रचना!! हार्दिक शुभकामनाएं वीरेंद्र जी🙏🙏

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    1. टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

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  6. बहुत सुंदर छंदो से सुशोभित लाजवाब रचना..

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    1. आपका बहुत-बहुत आभार।

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  7. इन्तहां !!
    बहुत उम्दा।

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  8. बहुत खूब !! अत्यंत सुन्दर और भावपूर्ण सृजन ।

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    1. धन्यवाद मीना जी। आपका बहुत-बहुत आभार।

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    1. आपका बहुत-बहुत आभार सर जी।

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    1. स्वागत है आपका ब्लॉग पर। आगे भी आते रहिएगा।

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  11. 'हर रंग मेरे महबूब का मुझे क़ुबूल है' । बहुत ख़ूब वीरेंद्र जी ।

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    1. धन्यवाद जितेन्द्र जी। आपका बहुत-बहुत आभार।

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