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Friday, February 5, 2021

नयी सुबह में नयी उमंग

Morning view in fields look great.
सुबह-सुबह का दृश्य

                                                      

Wheat grass looks cool in the morning.
 गेहूं


               नयी सुबह में नयी उमंग
              हर्षित मन में नयी तरंग 
            अंधकार को दूर भगाती
             एक नया विश्वास जगाती
             आशाओं के नवदीप जलें
              सुंदर -सुंदर  पुष्प खिलें
              इधर-उधर बिखरी है धूप
               प्रकृति का अद्भुत रूप
              पंछी उड़ते आसमान में
              बढ़ा हौंसला है उड़ान में
              चटक हुए जीवन के रंग
            अपने रूप पर गोरी दंग
             चमक बिखेरे अंशुमाली
              मन लुभाती छवि निराली
               पत्तों पर हैं ओस के मोती
                       दमक रही जीवन ज्योति         
                            

Mustard flowers look stunning in the morning.
सरसों
Radish pods flowers looks beautiful.
मूली (जिस पर फली लगती है)
                                                      
Flowers look stunning in the morning.
बटन फूल(स्थानीय नाम)



                           -वीरेंद्र सिंह
               

Thursday, January 28, 2021

आओ सखी एक गीत सुनो

                            आओ सखी एक गीत सुनो


Love story of a girl.
सांकेतिक चित्र


आओ सखी एक गीत सुनो

जीवन की एक रीत सुनो

पहली बार जो मुझे हो गई 

कैसी है वो प्रीत सुनो

आओ सखी एक गीत सुनो

जीवन की एक रीत सुनो


मेरे प्रेम की यह कहानी

सुन लो सब मेरी जुबानी

उनसे नज़रें जब चार हुईं

पल भर में दिल हार गई

इस हार में मेरी जीत सुनो

आओ सखी एक गीत सुनो..


नींद नहीं आती रातों में

रातें कटती हैं बातों में

दिन में भी कोई चैन नहीं

उस राह से हटते नैन नहीं

जिधर से आवे मनमीत सुनो

आओ सखी एक गीत सुनो..


जबसे हुई हूं मैं दीवानी

हर जुबां पर मेरी कहानी

सबने ठाना डोली सजेगी

जल्दी ही शहनाई बजेगी

मुधर बजेगा संगीत सुनो

आओ सखी एक गीत सुनो..


घर बाबुल का जब छूटेगा

साथ तुम्हारा भी टूटेगा

मुझे कभी न तुम भुलाना

मेरी यादों से दिल बहलाना

जग की यही है रीत सुनो

आओ सखी एक गीत सुनो

जीवन की  एक रीत सुनो

पहली बार जो मुझे हुई है 

ऐसी है वो प्रीत सुनो

                                                     

                                                                                   -वीरेंद्र सिंह


© Copyright 2021. All rights reserved.

Friday, January 22, 2021

जन्नत की हूर भी तेरे पैरों की धूल है


Ghazal on a stunning beauty. Beautiful girl.
सांकेतिक चित्र


शिक़वे शिकायतों की बातें फ़िज़ूल हैं,

हर रंग मेरे महबूब का मुझे क़ुबूल है।

ख़ता कोई भी तुमसे  हो नहीं सकती,

दामन पे तेरे दाग़ ज़माने की भूल है।

 धरती पे न होगी तेरे हुस्न की मिसाल,

 जन्नत की हूर भी तेरे पैरों की धूल है।

देखे तुम्हें ये चांद  इजाज़त नहीं उसे,

है तेरी सुगंध मेरी बस तू मेरा फूल है।

ये वादा है इशारों पे तेरे जान भी देंगे

  तोड़े नहीं वादा कभी अपना उसूल है।


-वीरेंद्र सिंह

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Friday, November 20, 2020

गांव में जीवन

शीत ऋतु में,
शहरों के कोलाहल से दूर,
बहुत दूर गांव-देहात में, 
नीले आसमान से आ रहीं सूरज की किरणें 
तन-मन को ऐसे ही सुख प्रदान करती हैं
जैसे भूख-प्यास से व्याकुल प्राणी को
भोजन और शीतल जल सुख प्रदान करते हैं!

मंद-मंद बहती शीतल हवा,
पक्षियों का कलरव,
दूर-दूर तक फैले गन्ने के खेत,
कोल्हू पर तैयार हो रहे
ताज़े गुड़ की सुगंध.
आंखों में ऐसे ही चमक पैदा करती हैं 
जैसे विरह की अग्नि में झुलस रहे प्रेमी की आंखें
अपनी प्रेमिका की झलक मात्र से चमक जाती हैं!

गांव में जीवन है।
जीवन में हंसी  है।
हंसी में प्रेम है।
और
प्रेम में  है निश्छलता
जो ऐसे ही अपनी ओर खींचती है
जैसे चुंबक, लोहे को खींचता है।
 


                   -वीरेंद्र सिंह
                     -----------



 





Friday, March 29, 2019

पत्नी नहीं प्रधानमंत्री हूं!




              नए ब्लॉग साथियों के लिए  पुन: प्रकाशन






wife  is the PM of a House. Wife is more powerful than her husband at home.




अपनी नई बहू को समझाते हुए
सासू माँ बोली!
देखो बेटी, पति परमेश्वर होता है!
अपने पति का कहना मानना ही
पत्नी का धर्म होता है!

सुनते ही बहू  तपाक से बोली,
नहीं माँजी!
अब ऐसा कहाँ होता है ?
अब पति परमेश्वर नहीं,
बाकी सब होता है!  
बदली हुई परिस्तिथियों में
पति का स्थान कुछ इस तरह से होता है!
जैसे ये देश है
वैसे ही हमारा ये  घर है!
जिस तरह देश का मालिक राष्ट्रपति होता है
उसी तरह घर का मालिक पति होता है!

राष्ट्रपति केवल नाम का ही मालिक होता है!
देश का असली कर्ता-धर्ता तो प्रधानमंत्री होता है!
जिसे सलाह देने के लिए उसका अपना  
एक 'निज़ी मंत्रिमंडल' होता है।  
कुछ दूसरे दलों का भी बाहरी समर्थन होता है।
चूँकि  वह बहुत ही शक्तिशाली होता है
इसलिए जो समर्थन नहीं देते, 
प्रधानमंत्री उनके लिए मुश्किलें पैदा करता है!

इधर 

पति भी केवल नाम का ही मालिक होता है!
और 
घर में पत्नी का स्थान
भारत के प्रधानमंत्री की तरह ही होता है!
पत्नी को सलाह देने के लिए उसका भी अपना
एक 'निज़ी मंत्रिमंडल' होता है!
जिसमें उसकी माँ का स्थान मुख्य होता है!
और कुछ पारिवारिक सदस्यों के साथ ही
उसके रिश्तेदारों का भी बाहर से समर्थन होता है!
इस तरह पत्नी भी बहुत शक्तिशाली होती है!
पति के घर वालों पर भारी पड़ने वाली होती है!
और जो उसका समर्थन नहीं करते
 उनका वो जीना हराम करने वाली होती है!

जिस तरह प्रधानमंत्री की सलाह पर
राष्ट्रपति को चलना होता है।
ठीक उसी तरह घर में पत्नी की सलाह पर
पति को चलना पड़ता है!
हाँ..कभी -२ विशेष परिस्तिथियों में
भारतीय राष्ट्रपति की तरह 
पति को भी पत्नी को न कहने का,
उसे किसी मसले पर पुनर्विचार करने का,
उसकी माँगो में कुछ संशोधन करने को कहने का
या फिर उन पर थोड़े समय तक,
कोई कार्रवाई न करने जैसे कुछ अधिकार हैं!
लेकिन ये केवल नाम के ही अधिकार हैं!
व्यवहारिक दृष्टि से  बेकार हैं!


अधिकतर मामलों में राष्ट्रपति की तरह
पति को भी सभी माँगों को मानना पड़ता है!
और
पत्नी ही सर्वोपरि है, 
ये स्वीकारना पड़ता है!

राष्ट्रपति और पति के अधिकारों में
कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी होते हैं।
जैसे राष्ट्रपति,
प्रधानमंत्री को पर्याप्त समर्थन के अभाव में
तुरंत हटा देता है।
लेकिन पति को ऐसा कोई अधिकार नहीं। 

पत्नी को किसी का समर्थन न भी हो,
तो भी उससे पीछा छुड़ाना  आसान नहीं!

 प्रधानमंत्री को'  
राष्ट्रपति को पीटने या उसके सामने
चिल्लाने का अधिकार नहीं है। 
लेकिन पत्नियों के मामले में
इस अधिकार को लेकर थोड़ी भ्रम की स्थिति है!
एक ओर जहाँ कुछ पत्नियाँ इस अधिकार का
खुल्लम-खुल्ला  प्रयोग करती हैं
तो  दूसरी ओर बहुत सी पत्नियों को
अपने पतियों को पीटने में घोर आपत्ति है!
लेकिन पतियों पर चिल्लाने के अधिकार का
वे भरपूर इस्तेमाल करती हैं!

माँजी!

इससे आगे बस इतना ही कहूँगी!
कि अब मैं भी इस घर की प्रधानमंत्री बनकर,
अपने निज़ी मंत्रिमंडल की ताक़त के दम पर,
यह घर चलाऊँगी!
पति से जो चाहूँगी वही करवाऊँगी!
उसे अपनी उँगलियों पर नचाऊँगी!
हालाँकि घर को सही से चलाने के लिए  
मुझे आपके समर्थन की ज़रुरत होगी!  

लेकिन माँजी! 

मैं आपकी कोई शर्त नहीं मान सकती हूँ।
आप तो जानती  हैं कि आपके समर्थन
के बिना भी मैं यह घर चला सकती हूँ।
लेकिन आपके लिए अति कष्टकारी  
मुश्किलें खड़ी कर सकती हूँ । 
इसलिए कोई भी निर्णय लेने से पहले
अच्छी तरह सोच लेना!
वरना बाद में मुझे दोष मत देना!

उम्मीद है अब आप समझ गई होंगी!
मैं तो बहुत थकी हुई हूँ!
शायद आप भी थक गई होंगी!
इसलिए कृपया अब आप यहाँ से चली जाएँ!
और मेरे लिए एक कप चाय ज़रूर भिजवाएँ!  




विशेष-  यह व्यंग्य रचना 27 जुलाई 2010 को मैंने अपने इसी ब्लॉग पर प्रकाशित की थी। उस वक्त ब्लॉग पाठकों ने काफी सराहा था। कुछ नए पाठक ब्लॉग पर आने लगे हैें। उन्हीं को ध्यान में रखते हुए पुन: प्रकाशित कर रहा हूं। इस पर आए कॉमेंट को नीच  यहां पर पढ़ा जा सकता है!


Wednesday, March 13, 2019

पत्ते से जीना सीखें




शाखा पर लगा पत्ता
अपने संगी संग
मस्त रहता है
दिन-रात
हर मौसम में
बिना ग्लानि
बिना  असंतोष
सब सहता है
गिरने के भय बिना 
हिलता -डुलता है
हवा के वेग से झूमता है
एक  ही स्थान पर दृढ़ 
अपने साहस के 
सभी प्रमाण देता है
फिर एक दिन 
डाल से अलग होता है
मिट्टी में मिल जाता है
किंतु पहले पूरा जीता है
कहने को  पत्ता है
किंतु सही अर्थ में
हमें सिखाता है
अनमोल जीवन
ऐसे जिया जाता है!
ऐस जिया जाता है!
--------------------
             

            वीरेंद्र सिंह
             =======





Sunday, March 3, 2019

बसंत को आने दो।



बारिश बड़ी नादान तुम
बसंत के मौसम में
बिन बुलाई मेहमान तुम

बार-बार आ जाती हो
नहीं किसी को भाती हो
अब करो प्रस्थान तुम
बारिश बड़ी नादान तुम
बसंत के मौसम में
बिन बुलाई मेहमान तुम

बसंत को आने दो
कोयल को गाने दो
सुनने दो फाल्गुनी हवा का गान तुम 
बारिश बड़ी नादान तुम
बसंत के मौसम में
बिन बुलाई मेहमान तुम

सावन में आना
झम झमाझम गाना
अभी करो विश्राम तुम
बारिश बड़ी नादान तुम
बसंत के मौसम में
बिन बुलाइ मेहमान तुम

खेतों में सरसों पीली-पीली
पानी से मिट्टी गीली-गीली
सबको कर रही हैरान तुम
बारिश बड़ी नादान तुम
बसंत के मौसम में 
बिन बुलाई मेहमान तुम


        - वीरेंद्र सिंह
        ========










Wednesday, October 27, 2010

पापा.... मैं भैया से कम नहीं



मेरे लड़की होने पर करो कोई भी ग़म नहीं
पापा.. मैं भैया से कम नहीं।

ख़ूब पढ़ूंगी, 
खूब लिखूंगी,
बाधाओं से नहीं डरूंगी,
जग में सबका नाम करूंगी।
अब कोई  उलझन  नहीं,
पापा... मैं भैया से कम नहीं।

मुझे मिले फटकार,
भैया को मिले दुलार,
दो मुझे मेरे हिस्से का प्यार,
जोड़ो फिर से ममता के टूटे तार।
करो अब कोई सितम नहीं,
पापा...मैं भैया से कम नहीं।

मम्मी-दादी को बता दो, 
सारी दुनिया को जता दो,
अपने मन का मैल हटा दो,
लड़की-लड़के का भेद मिटा दो।
करो  बेटी पर अब ज़ुल्म नहीं
पापा .... मैं भैया से कम नहीं।

मेरे लड़की होने पर करो कोई भी ग़म नहीं,
पापा ....मैं भैया से कम नहीं।



यह कविता 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों में देश की बेटियों की शानदार कामयाबी के अवसर पर लिखी गई थी।


       (नई दिल्ली में  राष्ट्रमंडल खेलों (2010) के सफ़लतापूर्वक सम्पन्न हो जाने के बाद आशानुरूप सभी लोग इन खेलों को लेकर अपने -२  मत व्यक्त  कर रहे  हैं।  इसमें कोई बुराई भी नहीं है  और इससे कई तथ्य भी सामने आ रहे हैं। ऐसे ही एक महत्वपूर्ण तथ्य पर मैं भी कुछ कहना  चाहता हूँ । बात कुछ इस तरह से है कि इन खेलों में पहले स्थान पर रहने वाले ऑस्ट्रेलिया के लिए सबसे ज़्यादा  पदक ऑस्ट्रेलिया की महिला खिलाड़ियों ने जीते हैं । चाहे वो सोने-चाँदी के पदक हों या कांस्य पदक.  तीनो ही वर्गों में महिलाओं ने बाज़ी मारी है। जिसका मुख्य कारण ऑस्ट्रेलिया में महिला और पुरषों को बीच किसी भी स्तर पर कोई भी भेदभाव का न पाया जाना है। पदकों के मामले में ऑस्ट्रेलियन महिलाएँ वहाँ के पुरषों पर भारी पड़ी।

 भारत के लिए महिला खिलाड़ियों ने भले ही पुरुष खिलाड़ियों से कम पदक जीते हों लेकिन पदक तालिका में भारत को दूसरे स्थान पर लाने का श्रेय महिला खिलाड़ियों को ही जाता है।  ये बात जग जाहिर है। अगर भारत में भी सभी माता-पिता अपने बच्चों के साथ लिंग के आधार पर कोई भेदभाव न करें...ख़ासकर उनकी परवरिश में, और हर क्षेत्र में दोनो को बराबर का मौक़ा दें तो वो दिन दूर नहीं जब भारतीय महिलाएँ भी जीवन के हर क्षेत्र में भारतीय पुरुषों को बराबर की टक्कर देंगी। उम्मीद है वो दिन ज़ल्द ही आएगा)

Tuesday, August 10, 2010

आओ करें पैसे को प्रणाम

                                 





पैसा ख़ुदा तो नही पर ख़ुदा की कसम खुदा से कम भी नहीं

 - विशेष: यह डायलॉग मेरा नहीं है।


    Money is not God but not less than God Money is everything.




आओ करें पैसे को प्रणाम,
मिलकर करें इसका गुणगान।
सारी दुनिया जपे इसका नाम,
आओ करें पैसे को प्रणाम।

बिन पैसे नहीं बनता काम,
 पैसे के लिए सभी परेशान,
अमीर हो या हो ग़रीब ,
सभी रखते पैसों का ध्यान।

आओ करो पैसे को प्रणाम
मिलकरा करें इसका गुणगान

समझ ले इतना ओ नादान,
पैसा है बड़ा मूल्यवान,
ऐसा कोई काम करो,
मिल जाए पैसा तमाम।

आओ करें पैसे को प्रणाम,
मिलकर करें इसका गुणगान।

जिन पर है पैसा वही महान,
उनकी है इज़्जत उनकी शान,
भले ही असल  में हो पापी, 
दुनिया की नज़रों में रहेंगे महान।

आओ करें पैसे को प्रणाम,
मिलकर करें इसका गुणगान।

पैसों से है सुंदर मकान
पैसा है सबको भगवान
यही है कड़वा सच
मत हो इतना हैरान

आओ करें पैसे को प्रणाम,
मिलकर करें इसका गुणगान।

ज्ञान, इंसान, ईमान
बड़ा चतुर है आज इंसान
रखता है हर बात का ज्ञान
सबकुछ करता  पैसे के लिए
रख देता है गिरवी ईमान

इसलिए हे श्रीमान,
छोड़ो सारे काम-धाम
पैसों की माला जपो
इसमें कहां का अपमान

आओ करें पैसे को प्रणाम,
मिलकर करें इसका गुणगान।

                            वीरेंद्र सिंह

Tuesday, July 27, 2010

पत्नी नहीं 'प्रधानमंत्री' समझिए!




















अपनी नई बहू को समझाते हुए
सासू माँ बोली!
देखो बेटी, पति परमेश्वर होता है!
अपने पति का कहना मानना ही
पत्नी का धर्म होता है!

सुनते ही बहू  तपाक से बोली,
नहीं माँजी!
अब ऐसा कहाँ होता है ?
अब पति परमेश्वर नहीं,
बाकी सब होता है!  
बदली हुई परिस्तिथियों में
पति का स्थान कुछ इस तरह से होता है!
जैसे ये देश है
वैसे ही हमारा ये  घर है!
जिस तरह देका मालिक राष्ट्रपति होता है
उसी तरह घर का मालिक पति होता है!

राष्ट्रपति केवल नाम का ही मालिक होता है!
देश का असली कर्ता-धर्ता तो प्रधानमंत्री होता है!
जिसे सलाह देने के लिए उसका अपना  
एक 'निज़ी मंत्रिमंडल' होता है।  
कुछ दूसरे दलों का भी बाहरी समर्थन होता है।
चूँकि  वह बहुत ही शक्तिशाली होता है
इसलिए जो समर्थन नहीं देते, 
प्रधानमंत्री उनके लिए मुश्किलें पैदा करता है!

इधर 
पति भी केवल नाम का ही मालिक होता है!
और 
घर में पत्नी का स्थान
भारत के प्रधानमंत्री की तरह ही होता है!
पत्नी को सलाह देने के लिए उसका भी अपना
एक 'निज़ी मंत्रिमंडल' होता है!
जिसमें उसकी माँ का स्थान मुख्य होता है!
और कुछ पारिवारिक सदस्यों के साथ ही
उसके रिश्तेदारों का भी बाहर से समर्थन होता है!
इस तरह पत्नी भी बहुत शक्तिशाली होती है!
पति के घर वालों पर भारी पड़ने वाली होती है!
और जो उसका समर्थन नहीं करते
 उनका वो जीना हराम करने वाली होती है!

जिस तरह प्रधानमंत्री की सलाह पर
राष्ट्रपति को चलना होता है।
ठीक उसी तरह घर में पत्नी की सलाह पर
पति को चलना पड़ता है!
हाँ..कभी -२ विशेष परिस्तिथियों में
भारतीय राष्ट्रपति की तरह 
पति को भी पत्नी को न कहने का,
उसे किसी मसले पर पुनर्विचार करने का,
उसकी माँगो में कुछ संशोधन करने को कहने का
या फिर उन पर थोड़े समय तक,
कोई कार्यवाही न करने जैसे कुछ अधिकार हैं!
लेकिन ये केवल नाम के ही अधिकार हैं!
व्यवहारिक दृष्टि से  बेकार हैं!

अधिकतर मामलों में राष्ट्रपति की तरह
पति को भी सभी माँगों को मानना पड़ता है!
और
पत्नी ही सर्वोपरि है, 
ये स्वीकारना पड़ता है!

राष्ट्रपति और पति के अधिकारों में
कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी होते हैं।
जैसे राष्ट्रपति,
प्रधानमंत्री को पर्याप्त समर्थन के अभाव में
तुरंत हटा देता है।

लेकिन पति को ऐसा कोई अधिकार नहीं। 
पत्नी को किसी का समर्थन न भी हो,
तो भी उससे पीछा छुड़ाना  आसान नहीं!

दूसरी बात प्रधानमंत्री को'  
राष्ट्रपति को पीटने या उसके सामने
चिल्लाने का अधिकार नहीं है। 
लेकिन पत्नियों के मामले में
इस अधिकार को लेकर थोड़ी भ्रम की स्थिति है!
एक ओर जहाँ कुछ पत्नियाँ इस अधिकार का
खुल्लम-खुल्ला  प्रयोग करती हैं
तो  दूसरी ओर बहुत सी पत्नियों को
अपने पतियों को पीटने में घोर आपत्ति है!
लेकिन पतियों पर चिल्लाने के अधिकार का
वे भरपूर इस्तेमाल करती हैं!

माँजी!
इससे आगे बस इतना ही कहूँगी!
कि अब मैं भी इस घर की प्रधानमंत्री बनकर,
अपने निज़ी मंत्रिमंडल की ताक़त के दम पर,
ये घर चलाऊँगी!
पति से जो चाहूँगी वही करवाऊँगी!
उसे अपनी उँगलियों पर नचाऊँगी!
हालाँकि घर को सही से चलाने के लिए  
मुझे आपके समर्थन की ज़रुरत होगी!  

लेकिन माँजी! 
मैं आपकी कोई शर्त नहीं मान सकती हूँ।
आप तो जानती  हैं कि आपके समर्थन
के बिना भी मैं यह घर चला सकती हूँ।
लेकिन आपके लिए अति कष्टकारी  
मुश्किलें खड़ी कर सकती हूँ । 
इसलिए कोई भी निर्णय लेने से पहले
अच्छी तरह सोच लेना!
वरना बाद में मुझे दोष मत देना!

उम्मीद है अब आप समझ गई होंगी!
मैं तो बहुत थकी हुई हूँ!
शायद आप भी थक गई होंगी!
इसलिए कृपया अब आप यहाँ से चली जाएँ!
और मेरे लिए एक कप चाय ज़रूर भिजवाएँ!  


विशेष:-  प्रिय ब्लॉग पाठकों...........ये केवल एक व्यंग्य रचना है।
              इसको सत्त्यता की कसौटी पर न परखें। 

                                            धन्यवाद 
     

Saturday, July 17, 2010

क्यों तोड़े तूने वादे...................



क्यों तोड़े तूने वादे............
बस.... इतना बता दे ........
क्यों तोड़े तूने वादे............
बस.... इतना बता दे .........
क्या मेरा दिल, दिल ना था .
तेरे प्यार के ये क़ाबिल न था.
ना करता तुझे प्यार कभी,
जो मैं जानता तेरे इरादे ............
क्यों तोड़े तूने वादे ..............
बस.... इतना बता दे...............
दिल में तुझे बसाया था .
तेरे प्यार में जहां भुलाया था .
क्या कमी रही थी मेरे प्यार में,
दीवाने को समझा दे ............
क्यों तोड़े तूने वादे .............
बस.... इतना बता दे ............
क्यों तूने ये ज़ख़्म दिए.
बिन तेरे हम कैसे जिएँ.
कैसे भुलाऊं उन लम्हों को,
मुझे इतना तू बतला दे.
क्यों तोड़े तूने वादे............
बस.... इतना बता दे ............
क्यों तोड़े तूने वादे ............
बस.... इतना बता दे ............


नोट :- प्रिय ब्लॉग पाठकों....... ये गीत पहले भी इसी ब्लॉग पर लिखा जा चुका है. लेकिन जिस समय ये लिखा गया था उस समय शायद ही किसी ने इसे पढ़ा हो . इसीलिए एक बार फिर मैं इसे आपके सामने पेश कर रहा हूँ . उम्मीद है ये आपको ज़रूर पसंद आएगा.

          मैंने इस गीत को उन दोस्तों को ध्यान में रखकर लिखा था जिनको प्यार में धोखा मिला है या उन्हें ऐसा लगता है कि उनको किसी ने प्यार में धोखा दिया है. लेकिन अगर आपके साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ तो आपको इस बात के लिए बधाई. और उम्मीद करता हूँ कि आपको भी  दीवानों की  ऐसी मासूम शिकायतें  सुनकर  कुछ और याद आएगा.  साथ ही इसे पढ़कर उनके दर्द का अहसास भी हो जाएगा . 

Saturday, July 10, 2010

महंगाई की मार


आजकल महंगाई बड़ा सता रही है!
अब तो जेब को भी रुलाई आ रही है!
ग़रीबों की तो बात ही छोड़ दीजिए,
ये अच्छे-अच्छों के पसीने छुड़ा रही है!

सरकार कहती है देश आगे बढ़ रहा है!
यहां आम आदमी का दम निकल रहा है!
ग़रीबों को दो वक़्त की रोटी के लाले पड़े हैं,
उधर अमीरों की पार्टी में खाना सड़ रहा है!


कुछ के लिए अभी भी सब कुछ आसान हैं!
बाकी सब परेशान हैं!
क्या खाए और क्या बचाए,
ये सोच-सोच कर हैरान हैं!

अरे ओ सत्तासीनों कुछ तो शर्म करो!
इस महंगाई को थोड़ा तो कम करो!
अपनी बेरुख़ी से सताई इस जनता पर,
 मालिक बस अब तो रहम करो!

Monday, July 5, 2010

मैं भी नेता बनूँगा!





मैं नेता बनूंगा!

देश के लिए कुछ करूं न करूं,
अपने लिए ज़रूर करूँगा!

मैं नेता बनूंगा!


क्या हुआ जो मैं अनपढ़ हूं,
बेकार हूं!
मेहनत से कमा कर खाने में लाचार हूं !
लेकिन राजनीति का तो मैं अनार हूं!
लोगों को बरगलाने में भी होशियार हूं!
शराब व शबाब का बन्दा शौक़ीन है!
आम आदमी की तरह जीने में मेरी तौहीन है!
रंग बदलने में भी माहिर हूं!
मैं अव्वल नंबर का शातिर हूं!
राजनीति में रंग जमाने को आतुर हूं!
ज़माना भले ही मुझसे परेशान है!
मेरी ताक़त को देख कर हैरान है!
सब कहते तु गुंडे-मवालियों का सरदार है!

इसलिए मुझसे पीछा छुड़ाने को बेक़रार हैं!
पर मैं ऐसा हरगिज़ नहीं होने दूंगा!
उनके वोट तो मैं लेकर ही रहूंगा!
फिर मैं अपने साथ थोड़ा सा
उनका भी तो भला करूंगा!
कुछ बदमाश जेल में होंगे!

ख़ासमख़ास पैरोल पर रिहा होंगे! 
इस तरह जनता की आंख का तारा बनूंगा!
मैं नेता बनूंगा!


जो कहते हैं मैं कुछ नहीं कर सकता!
ईमानदारी के दो पैसे नहीं कमा सकता!
उनसे मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूं!
कि 

मैं नेताओं वाले सभी काम कर सकता हूं!
जानवरों का चारा हज़म कर सकता हूं!

मौक़ा मिलते ही धन्नासेठ बन सकता हूं!
बड़े से बड़ा घोटाला कर सकता हूं!
लोगों को आपस में लड़वा सकता हूं!
बातों से ही लोगों का ख़ून बहा सकता हूं!
अपने लिए हर हद पार कर सकता हूं!


अपने बारे में और ज़्यादा क्या कहूं!
बस इतना और कह सकता हूं!
कि 

मौक़ा मिलने पर हीअपना असली रंग दिखा सकता हूं!
और दावे के साथ ये कहता हूं!
मैं एक ख़ास वर्ग वालों का चहेता हूं!
अक्सर मैं उनसे चंदा लेता हूं!

कुछ उनकी भलाई के नाम पर 
तो कुछ अन्य कामों पर ख़र्च करता हूं!
बाकी मैं रख लेता हूँ!
उनके हक़ के नाम पर
मैं शानदार राजनीति करूँगा!
मैं नेता बनूँगा।
देश के लिए कुछ करूँ या न करूँ,
अपने लिए जरूर करूगां!
मैं नेता बनूँगा!





नोट -: ये सच है कि सारे नेता एक से नहीं होते, हमारे देश में बहुत से ऐसे नेता हुए हैं जिन्होंने अपने निजी स्वार्थों से उपर उठकर देश हित में अच्छे-2 काम किए हैं। ये नेता बहुत ही क़ाबिल थे।लेकिन आजकल ऐसे नेता कुछ कम ही हैं। दूसरी बात, देश को चलाने के लिए नेता ज़रूरी भी हैं। इसलिए कुछ ऐसे लोग भी नेता बन गए या बन रहे हैं जो किसी लायक़ ही नहीं हैं! ऐसे नेता केवल अपना ही भला देखते हैं! देश की चिंता ये बिल्कुल नहीं करते! ये व्यंग्य ऐसे ही नेताओं पर है! 

अगर ब्लॉग पाठक कोई नेता हो या बनना चाहता या चाहते हों तो मेरी शुभकामनाएँ उनके साथ हैं। अच्छे नागरिकों की तरह अच्छे नेताओं की भी देश को बहुत ज़रुरत है और आम जनता भी उनका पूरा सम्मान करती है। चूँकि आप सब जानते हैं इसलिए मैं अपनी बात यहीं ख़त्म करता हूं।

धन्यवाद


Wednesday, June 30, 2010

माफ़ न करेंगे गुस्ताख़ी तिरंगे की शान में!


भारत माता के ऐसे-2 सपूत हैं  हिन्दुस्तान में‍!
जो मिटने को भी तैयार हैं  वतन की आन में!
यह सच है कि हम शान्ति के
दूत हैं, पुजारी हैं,
पर माफ़ न करेंगे गुस्ताख़ी तिरंगे की शान में!

Saturday, May 15, 2010

सर न उठा सकेगा एक भी जयचंद


देश के सारे दुश्मन मागेंगे पानी!

याद आ जाएगी उनको नानी!
सर न उठा सकेगा एक भी जयचंद,
गर एक हो जाए सभी हिन्दुस्तानी!



Saturday, May 1, 2010

मेरी ज़िंदगी में लगी वो आग है

आँखों में नमी, चेहरे पर उदासी, दामन में वफ़ा का दाग़ है,
पल-२ जला रही है मुझे, मेरी  ज़िंदगी  में लगी वो आग है!

Friday, April 9, 2010

मुट्ठी में बंद रेत की मानिंद वक़्त गुज़र गया!

मुट्ठी में बंद रेत की मानिंद वक़्त गुज़र गया,
देखते ही देखते मौसम बदल गया!

एक मैं  ही वक़्त  के साथ न  चल सका,
सारा जमाना कितना आगे निकल गया!



Thursday, April 8, 2010

ज़िंदगी के खट्टे-मीठे रंग

ज़िंदगी भी अजीब  रंग दिखाती है।
क़दम-२ पर इंसान को आजमाती  है।
कभी  मिलती है  ख़ुशी तो कभी ग़म,
कभी हिस्से में मायूसी भी आती है।



ज़िंदगी हँसने -हँसाने का नाम है!

Motivational song
सांकेतिक चित्र 



ज़िंदगी  हंसने -हंसाने  का नाम है।
ग़म में भी मुस्कुराने का नाम है।
क्या रखा है लड़ाई- झगड़े में  दोस्तों, 
ज़िंदगी प्यार से रहने का नाम है ।

लाखों -करोड़ों की इस भीड़ में,
कोई एक जो हो तक़दीर में,
जिसके बिना है हर ख़ुशी अधूरी,
ज़िंदगी उसे अपना बनाने का नाम है ।

ज़िंदगी हंसने -हंसाने का नाम है।
ग़म में भी मुस्कुराने का नाम है ।

हासिल करो वो मुक़ाम,
कि दुनिया करे तुम्हें सलाम।
अच्छी नहीं देश से गद्दारी दोस्त,
ज़िंदगी वतन पर मिटने का नाम है ।

ज़िंदगी हंसने -हंसाने का नाम है ।
ग़म में भी मुस्कुराने का नाम है ।
क्या रखा है लड़ाई- झगड़े में  दोस्तों, 
ज़िंदगी प्यार से रहने का नाम है ।

-वीरेंद्र सिंह 


Monday, April 5, 2010

गीत - क्यों तोड़े तूने वादे



Broken Heart
सांकेतिक चित्र 


क्यों तोड़े तूने वादे!
मुझे इतना बता दे!

क्या मेरा दिल, दिल ना था!
तेरे प्यार के ये क़ाबिल न था!
ना करता तुझे प्यार कभी,
जो मैं जानता तेरे इरादे!

क्यों तोड़े तूने वादे!
मुझे इतना बता दे!

 दिल में तुझे बसाया था ,
तेरे प्यार में जहां भुलाया था!
क्या कमी रही थी मेरे प्यार में,
दीवाने को समझा दे!

क्यों तोड़े तूने वादे!
मुझे इतना बता दे!


क्यों तूने ये ज़ख़्म दिए!
बिन तेरे हम कैसे जियें!
कैसे भूलाऊँ उन लम्हों को,
जरा इसका राज बता दे!

क्यों तोड़े तूने वादे!
मुझे इतना बता दे!

                          -वीरेंद्र सिंह