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Sunday, March 14, 2021

याद न जाए बचपन की

बचपन के दिन भूलाए नहीं भूलते। आप कितना भी प्रयास कर लें लेकिन बचपन की यादें रह-रहकर ताज़ा होती रहती हैं। कहानियाँ वैसे तो बड़े और बुजुर्ग ही सुनाया करते हैं। लेकिन थोड़े से बड़े होने पर बच्चे खुद एक दूसरे को अपने तरीके से कहानियाँ सुनाते हैं या  दिलचस्प सवाल-जवाब करते हैं। जो भी करते हैं उसका मुख्य उद्देश्य दूसरों पर अपनी चतुराई का सिक्का जमाना होता था।  एक दिलचस्प कहानी और कुछ सवाल-जवाब मैं  आपके लिए लाया हूं। उम्मीद है आपको पसंद आएँगे।




 1-

पहली कहानी कुछ इस तरह है।  एक था आटु। एक था बाटु और एक था मैं(कहानी सुनाने वाला)।  हम तीनों एक दिन जंगल में घूमने गए। रास्ते में हमें भुट्टे का पेड़ दिखाई दिया। आटु ने भी एक भुट्टा तोड़ा। बाटु ने भी और मैंने भी। हम भुट्टे लेकर आगे बढ़ गए। रास्ते में हमें जलती हुई आग मिली। हम तीनों ने अपने-अपने भूट्टे सेंकने शुरु किए। आटु और बाटु के भुट्टे तो बढ़िया से सिक गए लेकिन मेरा भुट्टा जल गया। इसके बाद आटु ने अपना आधा भुट्टा मुझे दिया। बाटु ने भी अपना आधा भुट्टा मुझे दे दिया। इसे प्रकार मेरे पास एक भुट्टा हो गया  लेकिन उन दोनों के पास केवल आधा-आधा भुट्टा ही रह गया।

2-

एक बच्चा अपने साथियों से पूछता है कि बताओ अगर आपके घर डीआजी साहब आए तो क्या करोगे?
बच्चा जवाब देगा कि उनका स्वागत करेंगे। उनको पानी और चाय भी पिलाएँगे। पहला बच्चा फिर से पूछता है अच्छा बताओ कि अगर आपके घर पीआईजी साहब आए तो क्या करोगॆ? यहां पूछने वाला बच्चा सुअर के बारे में पूछता है। अब अगर बच्चा जानता है कि पीआईजी(Pig) सुअर है तो कहेगा कि हम पीआजी साहब को डंडा मारकर भगाएँगे। लेकिन कई बच्चों को पता नहीं होता इसलिए वो कह देते थे कि हम पीआजी साहब का स्वागत भी उसी तरह करेंगे जैसे डीआजी साहब का। अब पूछने वाला बच्चा ऐसे बच्चों की ज़बरदस्त हँसी उड़ाता।

3-
 इसमें अपने को चतुर समझने वाला बच्चा पूछता कि बताओ एक घर में  तारतुक्का और मारमुक्का नाम के  दो भाई रहते थे। एक दिन तारतुक्का नाम का भाई किसी काम से बाहर चला गया। तो बताओ घर में कौन सा भाई बचा? अब  जिन बच्चों से पहली बार यह सवाल पूछा जाता तो बेचारे फँस जाते। वे बड़े जोश में कहते कि मारमुक्का बचा। पूछने वाला बच्चा तुरंत उसे एक मुक्का मार देता था। लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता था कि जिससे सवाल पूछा जाता था वो पूछने वाले का भी उस्ताद होता। सवाल पूछते वक्त बड़ा मासूम  बन जाता लेकिन सवाल पूछते ही उत्तर देने की बजाय पूछने वाले को ही एक मुक्का जमा देता।

4-

 एक खेल कुछ इस तरह होता कि इसमें एक बच्चा कहता कि अपने मन में कुछ रुपये सोच लो। फिर तुम मेरी कुछ बातें मान लेना तो मैं यह बता दूँगा कि तुम्हारे पास कितने रुपये बचे। दूसरा बच्चा मन ही मन एक संख्या यानी कुछ रुपये सोच लेता। पहला बच्चा  कहता कि जितने रुपये तुमने अपने लिए रखे हैं उतने ही अपने भाई के रख लो।  दूसरा बच्चा ऐसा ही करता। पहला बच्चा फिर कहता है कि इसमें 10 रुपये मेरे भी जोड़ लो। दूसरा  बच्चा 10 रुपये पहले बच्चे के भी जोड़ लेता। पहला बच्चा कहता कि अब इन सारे रुपयों को जोड़ लो। दूसरे बच्चे ने सारे रुपये जोड़ लिए। पहला बच्चा  कहता कि अब इनमें से आधे देवी को दान कर दो। दूसरे बच्चे ने कुल रुपयों में से आधे  रुपये देवी को दान कर दिए। पहला बच्चा अब कहता कि अपने भाई के पैसे अपने भाई को दे दो। बच्चा नंबर दो ऐसा ही करता। अब पहला बच्चा कहता कि तुम जानना चाहोगे कि तुमने कितने रुपये रखे थे। दूसरा बच्चा आश्चर्य से कहता कि बताओ? पहला बच्चा अपनी आँखों को नचाते हुए बताता कि अब तुम्हारे पास 5 रुपये बचे। पहला बच्चा हतप्रभ हो पूछता कि बता यार तुझे कैसे पता चला। अब पहला बच्चा नखरे दिखाता!

इसमें चतुराई यह है कि पहला बच्चा जितने रुपये अपने जुड़वाएगा उत्तर हर हाल में उसका  आधा होगा। 
मान लें कि आपने अपने मन में 100 रुपये रखे। इतने ही रुपये आपने अपने दोस्त या भाई के रख लिए। आपके पास 200 रुपये हुए। अब पहला बच्चा कहता है कि 100 रुपये( वो कोई भी संख्या जुड़वा सकता है)  मेरे भी जोड़ लो। दूसरे बच्चे के पास अब 300 रुपये हुए। इनमें से आधे देवी को दान कर दिए। तो बचे 150 रुपये। भाई के भाई को दे दो। तो बचे 50। यह पहले बच्चे के द्वारा जुड़वाए रुपयों की संख्या का आधा होता है।


                      -वीरेंद्र सिंह

Tuesday, February 23, 2021

दो पत्नियों की कथाएँ


सांकेतिक चित्र 



                                   (1)


एक बार एक गाँव में एक पंडितजी रहते थे। पंडितजी, पंडिताई करते और अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। वो लोगों के घर जाकर कथा भी किया करते थे। धर्मग्रंथों के  बारे में उनके ज्ञान का लोहा सभी मानते थे। इसलिए आस-पास के गाँवों में पंडितजी का बहुत मान-सम्मान था। वो जिसके घर भी जाते वहाँ उनका खूब आदर-सत्कार होता।  पंडितजी की बौद्धिकता के दम पर उनके जीवन की गाड़ी ठीक-ठाक चल रही थी। पंडितजी की पत्नी यानी पंडिताइन घर पर ही रहती थी। स्वभाव से वो काफी तेज महिला और थोड़ी जिद्दी महिला थी। 

एक  बार जब पंडितजी कहीं जाने को तैयार हो रहे थे तो पंडिताइन ने कहा कि पड़ोस के गाँव में एक महाराज जी श्रीमद् भगवद कथा कर रहे हैं । उनकी विशेष बात यह है कि वो सभी को बड़े अच्छे ढंग से गीता समझाते हैं और समझाने के बाद सबसे पूछते हैं कि अर्थ समझ आया।  जिन्हें समझ आ जाता है वे हाथ खड़ा कर देते हैं और बाद में महाराज जी को दक्षिणा भी देते हैं। जिनकी समझ में कथा नहीं आई उनसे दक्षिणा नहीं ली जाती । पंडिताइन ने आगे कहा कि आज मेरा भी मन वहाँ जाकर श्रीमद् भगवद कथा सुनने का है।

पंडितजी बोले कि अगर ऐसी बात है तो वापस आकर मैं तुम्हें भगवदगीता समझा दूँगा। तुम्हें दूसरे गाँव जाने की आवश्यकता नहीं है। फिर वहँ तुम्हें दक्षिणा भी देनी पड़ेगी।  इसलिए अगर मुझ से भगवद कथा सुनोगी तो कथा भी बढ़िया समझ आएगी और पैसे भी बचेंगे। दूसरे गाँव जाने से भी बचोगी। लेकिन पंडिताइन जिद पर अड़ गई कि मुझे तो महाराज जी से ही कथा समझनी है। 


पंडितजी ने पंडिताइन को बहुत समझाया लेकिन पंडिताइन ने अपना निर्णय नहीं  बदला। पंडितजी को क्रोध आ गया। उन्होंने कहा कि मूर्ख स्त्री बाहर के महाराज को पैसा देकर कथा सुनने के लिए तैयार है लेकिन अपने स्वयं के पति से कथा सुनने को तैयार नहीं। जबकि मुझसे कथा सुनने में  पैसे बचेंगे और अपना घर छोड़कर कहीं आना-जाना भी नहीं पड़ेगा।

पंडितजी की बात सुनकर अब पंडिताइन को क्रोध आ गया। पंडिताइन ने क्रोधित होकर कहा कि मूर्ख मैं नहीं बल्कि मूर्ख हो आप!  दक्षिणा तो तभी देनी पड़ेगी न जब मैं मान लूंगी कि मुझे कथा समझ आ गई। और जब मैं मानूँगी ही नहीं कि मुझे कथा समझ आ गई  है तो दक्षिणा क्यों  देनी पड़ेगी? अपनी पत्नी की बात सुनकर पंडितजी सकते में आ गए मगर पंडिताइन के तेवर  देखकर  उन्होंने चुप रहने में ही भलाई समझी। 
                                                     
                          
              (2)

एक गाँव में एक महिला और उसके  पति  के बीच अक्सर झगड़ा होता था। उनके पड़ोसियों को लगता कि इस  औरत के तो नसीब फूट गए। पता नहीं कैसा पति मिला है जो बेचारी को इतना परेशान  करता है। एक दिन उन दोनों के बीच फिर से झगड़ा  हुआ । जब उसका पति बाहर गया तो जाने से पहले अपनी पत्नी को हिदायत दी कि किसी से बताना मत कि हमारे बीच किस बात पर झगड़ा हुआ  है। पत्नी क्रोधित थी इसलिए कुछ नही  बोला। थोड़ी  देर बाद पास के घरों की महिलाएं  उसके पास आई और उससे पूछा कि तुम दोनों झगड़ क्यों रहे थे?


वो  चुप रही। दूसरी महिलाओं ने पूछा अच्छा यह तो  बता दो किस बात पर तुम इतना क्रोधित हो?
अब वो महिला बोल उठी। उसने कहा कि खाने को लेकर हमारे बीच झगड़ा हुआ था। मैंने 10 रोटियाँ बनाई थी जिसमें से 9 मेरा पति खा गया। मेरे लिए केवल एक ही छोड़ी थी। उन महिलाओं को उसके पति पर बड़ा क्रोध आया। एक पड़ोसी महिला ने कहा कि तुम और  रोटियाँ बना लो।  एक अन्य महिला ने पूछा कि क्या वाकई तुम्हारा पति नौ रोटियाँ खा जाता है?  एक और महिला ने उससे पूछा कि तुम कितने आटे की रोटियाँ तैयार करती हो जो तुम्हें कम पड़ जाती  है? 

इस पर उस महिला ने  बड़ी मासूमियत से जवाब दिया,


 नौ सेर की मैंने नौ बनाई , नौ सेर का एक चंदा,
 वो  मोटुआ  नौ खा गया मैंने खाया एक चंदा।

अर्थात  नौ सेर आटे से मैने 9 रोटियाँ बनाई और नौ सेर आटे से  ही मैंने एक बड़ी रोटी(चंदा) बनाई। इनमें से मेरे पति ने 9 रोटियाँ  खाई जबकि मुझे केवल एक रोटी(चंदा) ही छोड़ी।

पूरी  बात समझते ही पड़ोसी महिलाएँ  एक दूसरे का मुंह का ताकने लगी और चुपचाप अपने-अपने घरों को चली गईं।


                                                -वीरेंद सिंह

                             

Monday, February 22, 2021

प्रेमबाण





एक बार एक गुरु और उनका शिष्य घूमते-घमते बस्ती से  बहुत दूर ऐसे स्थान पर निकल आए जहां जंगल ही जंगल थे। दोनों को प्यास लगने लगी थी। लेकिन कहीं पानी  का कोई स्रोत दिखाई नहीं दे रहा था।  गुरु ने शिष्य से कहा कि अगर ज्यादा आगे जाएंगे तो हिंसक जानवरों से सामना हो सकता है। इसलिए अब लौट चलते हैं। प्यास तो लग रही है लेकिन और आगे जाना सही नहीं होगा। फिर कहीं पानी दिखाई भी तो नहीं दे रहा। गुरु की बात सुनकर शिष्य ने हाँ में गर्दन हिलाई और निवेदन किया कि गुरुजी मैं बहुत थक गया हूं। थोड़ी देर कहीं बैठ जाते हैं फिर वापस चलते हैं। 


दिन ढल रहा था। थोड़ी देर आराम करने के बाद दोनों वापस जाने लगे।  अचानक उन्होंने देखा कि एक स्थान पर कुछ कौवे और  चील  इकटठा हो रहें हैं। शिष्य ने अपने गुरु से कहा कि अभी कुछ देर पहले तो यहां कुछ नहीं था। अब अचानक से ये चील-कौवे क्यों उड़ने लगे। गुरु ने कहा यह जंगल है । जरूर कोई जानवर मरा पड़ा होगा!  शिष्य ने कहा कि गुरुजी चलकर देखते हैं कि जानवर ही है? या कहीं ऐसा तो नहीं कोई मनुष्य ही पानी के अभाव में मर गया हो?


गुरु ने कहा ऐसा लगता तो नहीं। फिर भी तुम्हारी उत्कंठा को शांत करने के लिए उधर ही चलते हैं। ऐसा कहकर गुरु अपने चेले के साथ उसी दिशा में चल पड़े जिधर चील-कौवे उड़ रहे थे। पास जाकर देखा तो एक  हिरन और एक हिरनी वहां मरे पड़े थे।  दोनों का देखने से ऐसा लगता था कि दोनों के प्राण कुछ देर पहले ही निकले थे। दोनों को देखकर ऐसा लगता था कि अभी उठकर भाग जाएंगे। दोनों की उम्र मरने वाली नहीं लगती थी। आश्चर्य की  बात यह थी कि  दोनों हिरनों के पास ही एक गड्ढा था जिसमें थोड़ा सा पानी था। गुरु ने दोनों हिरनों को देखा और सोच में पड़ गए।


वहीं शिष्य के मन में सवाल आता है कि न तो इनके शरीर पर कोई घाव है यानी किसी शिकारी ने तो इन्हें मारा नहीं। और न ही ऐसा लगता कि दोनों किसी बीमारी से मरे हैं!  प्यास से मरे हो ऐसा भी नहीं लगता क्योंकि गड्ढे में पानी है। किसी हिंसक जानवर भी नहीं मारा। हिंसक जानवर मारता तो खा जाता या कम से कम इनके शरीर पर कोई निशान तो होता।  तो फिर ये मरे तो मरे कैसे?  अपनी इस उत्सुकता को शिष्य ने अपने गुरु से कुछ इस तरह पूछा,.


            व्याधि  कोई लगती नहीं, न ही लगा है कोई बाण,

           पानी भी है पास में फिर किस विधि निकले प्राण?   


शिष्य का प्रश्न सुनकर गुरु जी थोड़ी देर के लिए शांत हो गए। फिर  उन्होंने शिष्य के प्रश्न का उत्तर कुछ इस प्रकार दिया,


        पानी थोड़ा हित घना, लगे प्रेम के बाण,

      तू पी- तू पी कहे मरे, बस इस विधि निकले प्राण!


गुरु ने शिष्य को समझाते हुए कहा कि ये दोनों हिरन और हिरनी आपस में पति-पत्नी थे। दोनों को प्यास लगी तो पानी की तलाश में भटककर यहां तक आ पहुँचे। यहां आकर दोनों  ने देखा कि केवल एक हिरन के लिए तो पर्याप्त पानी है लेकिन दोनों के लिए नहीं है। अगर एक हिरन पानी पीता तो वो आराम से ऐसी जगह जा सकता था जहां उसे और पानी मिल जाता। वहीं अगर दोनों ने पानी पिया तो दोनों का जीवित बचना मुश्किल था क्योंकि बाद में पानी कहां जाकर मिलता उन्हें नहीं पता था। इसलिए  हिरन ने  हिरनी की ओर प्यार से देखा और कहा कि देखो अगर मुझे पानी नहीं मिला तो मैं कहीं और तलाश लूंगा इसलिए यह पानी तुम पी लो। हिरनी बोली,"नहीं स्वामी! यह पानी आप पी लो। अगर मुझे पानी नहीं मिला  और मैं मर भी गई तो  कुछ नहीं होगा लेकिन अगर आप को कुछ हो गया तो हमारे बच्चों को कौन पालेगा। इसलिए यह पानी आप पी लो और यहाँ से जितनी जल्दी हो सके निकल जाओ।"  हिरनी की बात सुनकर हिरन बोला , " नहीं प्रिय , बच्चों को मुझसे ज्यादा तुम्हारी आवश्यकता है  इसलिए यह पानी तुम पी लो।" 


बहुत देर तक हिरन और हिरनी एक-दूसरे से विनती करते रहे कि पानी तुम पी लो--तुम पी लो। इस तरह दोनों में से किसी ने भी पानी नहीं पिया और अंत में प्यास की वजह से दोनों के ही प्राण पखेरु उड़ गए।  आपस में अत्यधिक  प्रेम होने के चलते दोनों ने एक दूसरे के लिए पानी नहीं पिया और अंत में दोनों ही प्यास से मर गये।


                -वीरेंद्र सिंह 



Sunday, February 21, 2021

महीनिया

                    
                       

एक बार एक गाँव में एक व्यक्ति रहता था जिसका नाम महीनिया था। महीनिया का अपना घर तो था लेकिन घरवाली और बच्चे नहीं थे। हर जगह ऐसे लोग होते हैं जो शादी नहीं करते  या किसी वजह से उनकी शादी नहीं  हो पाती है। महीनिया की भी शादी नहीं हो पाई थी। अकेला होने की वजह से जब मन किया किसी दूसरे गाँव या स्थान पर घूमने निकल गया। इस दौरान वो किसी ऐसे घर की तलाश में रहता जहाँ वो  ठहर सके। उसकी एक खासियत यह भी थी कि वो जिसके घर में रुकता उसके घर से एक महीने से पहले नहीं जाता था।  इसलिए आस-पास के गाँव के लोगों ने उसका नाम महीनिया रख दिया। दूर-दूर तक लोग उसकी इस खासियत से परिचित थे।  महीनिया अव्वल दर्जे का बातूनी और हाजिर जवाब था।  अपने इसी गुण के कारण वो कोई न कोई ऐसा घर तलाश ही लेता जो उसे एक महीने तक रुकने दे।  जिस-जिस गाँव में भी वो जाता था उस गाँव के निवासी उसे कभी भूलते नहीं थे।


Story of a man who stays for one month as a guest
सांकेतिक लोगो

आदत के अनुसार महीनिया ने एक बार फिर से अन्य गाँव में जाकर किसी के घर एक माह रहने की योजना बनाई। उसने तय किया कि इस बार अपने गाँव से 6-7 कोस की दूरी पर स्थित उस गाँव में जाएगा जहां गए हुए उसे काफी लंबा समय हो गया है। पिछली बार जब वहाँ रहा था तो उसे कोई दिक्कत भी नहीं हुई थी। सोच-विचार कर अगले दिन महीनिया मुर्गे की बांग सुनते ही उठ बैठा। जल्दी से तैयार होकर एक थैले में अपने कपड़े रखकर उस गाँव के लिए निकल पड़ा। 


महीनिया तड़के यानी सूरज निकलने के कुछ देर बाद ही गाँव के पास पहुँच गया। गाँव से कुछ दूर पहले एक पेड़ खड़ा था। वो उस पेड़ के नीचे बैठकर सोचने लगा कि किस घर या किसकी बैठक (बड़े-बुजुर्गों का रहने का स्थान जहां वे रात को सो सके और दिन में अपने अन्य साथियों के साथ बातचीत भी कर सके)  में जाकर उसे टिकना चाहिए। गाँव के वे लोग जो सुबह-सुबह अपने खेतों पर घूमकर आते हैं उन्होंने महीनिया को देख लिया। उसका हाल-चाल पूछा लेकिन किसी ने भी उससे यह न कहा कि आओ हमारे घर चलो।  


थोड़ी देर में महीनिया के आने की ख़बर अन्य लोगों को भी होने लगी।  जिन लोगों ने महीनिया को देखा था उन्होंने  बाकी लोगों से बताना शुरु कर दिया कि आज तो महीनिया आ रहा है। मजाक-मजाक में सब एक दूसरे से  कहने लगे कि जिसे भी उसकी  सेवा करनी है उसे अपने घर ले आओ वरना फिर मत कहना की उसकी सेवा का मौक़ा न मिला। क्या पता फिर कब आए या आए ही ना? एक अन्य आदमी न कहा कि वो किसी के कहने से ना आता। अपनी मर्जी का मालिक है जिसके घर भी बैठ गया तो एक महीने बाद ही जाएगा।


उसी गाँव में एक बुढ़िया रहती थी। उसने भैंस भी पाल रखी थी ताकि उसका दूध बेचकर कुछ पैसे जोड़ने के साथ-2 अपना घर भी चला सके। उसकी भैंस दूध भी अच्छा देती थी। बुढ़िया की एक बेटी थी जिसकी शादी हो गई थी। एक  बेटा था जो दूसरे गाँव में किसी के घर काम करता था और वहीं रहता था। समय-समय पर वो अपनी माँ से मिलने आता था। बुढ़िया सोचती थी कि वो जल्दी से जल्दी पैसा इकट्ठा कर अपने बेटे की शादी कर देगी और अपने बेटे और बहू के साथ रहेगी। घर में बहू लाने का सपना पाले बुढ़िया रोज़ घर का काम निपटाकर घास लेने के लिए जंगल के लिए निकल जाती और शाम को ही वापस आती। बुढ़िया अपने जीवन से संतुष्ट थी।


 लेकिन उस दिन जैसे ही उसे महीनिया के आने की ख़बर हुई तो एक बार को उसे लगा कि कहीं ये महीनिया  उसके घर आकर ही न मर जाए? बुढ़िया का मतलब था कहीं उसी के घर न टिक जाए। एक-दो दिन की बात  हो तो कोई रख भी ले। ये तो पूरे महीने यहीं रहेगा। रोटी खाने के साथ-साथ दूध भी पीएगा जिसके लिए बुढ़िया बिल्कुल तैयार नहीं थी। उसने उस सुबह खीर बनाई थी। लेकिन अभी खाई नहीं थी। बुढ़िया ने सोचा खीर तो बाद में खा लूँगी। पहले घर से निकल जाऊँ और जंगल से थोड़ी सी घास ले आऊँ। घर का दरवाजा बंद रहेगा तो महीनिया आएगा भी नहीं।  ऐसा सोचकर बुढ़िया जल्दी से घास छीलने वाला खुरपा और घास लाने वाली जाली लेकर निकल पड़ी।


बुढ़िया ने जंगल में जाकर इत्मीनान की सांस ली। सोचने लगी भूख तो लगेगी लेकिन उस महीनिया से पीछा छूट जाएगा। जब तक वापस जाऊंगी किसी न किसी के घर वो रुक ही जाएगा। बुढ़िया ने घास छीलना शुरु किया और दोपहर तक इतना घास छील लिया कि उसकी जाली भर गई। बुढ़िया ने जाली उठाई और अपने घर की ओर चल पड़ी। घर पहुंचकर उसने देखा कि उसका दरवाजा खुला हुआ है। बुढ़िया के मन में थोड़ा खटका हुआ लेकिन जब घर के आँगन में  देखा और कोई दिखाई न दिया तो उसने चैन की सांस ली। 


बुढ़िया ने घास की जाली एक तरफ रख दी। वो थकी हुई थी। उसने पास में रखे जग से  थोड़ा सा पानी पिया।  बुढ़िया ने अपने आप से कहा कि पहले आराम करूँगी फिर खीर खाऊँगी और वहीं पास में पड़ी एक खाट पर पसर गई।  वो अपनी चतुराई पर बहुत खुश थी। पड़ोस की एक महिला ने  बाहर से  ही पूछा," आज सवेरे-सवेरे ही जंगल चली गई थीं क्या?"  बुढ़िया को लगा कि अपनी अक्ल का डंका बजाने का इससे बढ़िया मौक़ा न मिलेगा। ऐसा सोचकर बुढ़िया ने उस महिला से महीनिया के आने और उससे बचने की अपनी तरकीब के बारे में  कुछ यूं बताया,


" मैं बड़ी चतुर, बड़ी चालाक बड़ी कड़के की, लेके खुरपा-जाली निकल पड़ी तड़के की" 

ऐसा कहते ही बुढ़िया हँसने लगी। उसकी हँसी देखकर महिला के चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट आ गई।


तभी बुढ़िया के मकान के अंदर से एक आवाज आई, 


"मैं बड़ा चतुर, बड़ा चालाक, बड़ा कड़के का, गुड़ से निगल गया मैं खीर पड़ा तड़के का"


अपने घर के अंदर से आई महीनिया की आवाज सुनकर बुढ़िया जल्दी से पीछे मुड़ी और तेज-तेज कदमों से अपनी रसोई में  गई तो देखा कि महीनिया सारी खीर खा गया था। बुढ़िया सर पकड़कर वहीं बैठ गई।


                                            -वीरेंद्र सिंह




                                   

Saturday, February 20, 2021

वृद्ध व्यक्ति और चालाक महिला

किसी गाँव में एक वृद्ध व्यक्ति रहा करता था।  वृद्ध होने के चलते उसे कम दिखाई  देता था। उसकी पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। वृद्ध के कोई सन्तान भी नहीं थी।  गाँव के लोग अक्सर उसकी मदद किया करते थे। लेकिन लोगों की मदद के बाद भी उसका गुजारा मुश्किल से होता था। लोग कितने भी दयालु क्यों न हो लेकिन किसी बेसहारा वृद्ध का हर दिन ख्याल रखना आसान नहीं होता। किसी तरह वृद्ध व्यक्ति के जीवन की गाड़ी चल रही थी।

                                          
Story of an old man and a clever woman.
सांकेतिक लोगों 

अक्सर उसके पास खाने को कुछ नहीं होता था। ऐसे में वो किसी पास के घर से खाना मांग लाता या आटा ही ले आता। आटा मिलता  तो  वृद्ध व्यक्ति स्वयं आटा गूंथता और जैसे-तैसे रोटियाँ बनाकर खा लेता। उसके पड़ोस में एक महिला रहती थी। महिला अक्सर वृद्ध से कहा  करती थी कि जिस दिन उसे आटा मिला करे तो वो उस आटे को लेकर उसके पास आ जाया करे ताकि वो उसकी रोटियाँ बनाकर वृद्ध को खिला सके।


वृद्ध को रोटियाँ बनाने में बहुत परेशानी होती थी। इसलिए वो भी यही चाहता था कि कोई मांगे हुए आटे की रोटियाँ बनाकर उसे दे दिया करे। लेकिन उस महिला के पास जाने में वो हिचकता था। इसका कारण यह था कि जो भी महिला वृद्ध को आटा दिया करती तो उससे एक बात जरूर कहती कि देखो अपनी पड़ोसी महिला से रोटियाँ मत बनवाना नहीं तो वो तुम्हारे आटे से बनी सभी रोटियाँ तुम्हें नहीं देगी! 


इस डर के कारण वृद्ध व्यक्ति पड़ोसी महिला से रोटियाँ बनवाने कतराता था। लेकिन रोटियाँ बनाने में होने वाली कठिनाई ने  उसकी हिचक जल्दी ही ख़त्म कर दी। एक दिन वृद्ध व्यक्ति के पास थोड़ा सा आटा रखा था। रोटियाँ सेकने का उसका बिल्कुल मन नहीं था। वृद्ध ने सोचा कि मेरे पास लगभग चार-पाँच रोटियों का आटा है।  इस आटे से वो महिला चाहकर भी रोटियाँ अपने पास नहीं रख पाएगी। क्यों न पड़ोस वाली महिला से रोटियाँ सिकवा ले?


यह सोचकर वृद्ध व्यक्ति आटा लेकर उस महिला के पास जा पहुंचा। 
उसे देखकर महिला समझ गयी कि वो रोटियाँ सिकवाने के लिए आटा लाया है। महिला ने वृद्ध से आटा लेते हुए कहा ," जब तक मैं इस आटे की रोटियाँ बनाऊँ तुम वहाँ खाट पर जाकर बैठ जाओ।"  वृद्ध व्यक्ति पास ही पड़ी  एक खाट पर बैठ गया। 


महिला ने आटा  गूँथ कर पाँच  रोटियों के हिसाब से गुँथे  हुए आटे के पाँच  गोले बनाएँ। महिला ने उस आटे से पाँच रोटियाँ बनाईं।  उधर वृद्ध देख तो नहीं पाया था लेकिन जब महिला ने आटे के गोलों को पाँच बार थपका था तो आवाज सुनकर वृद्ध ने अनुमान लगा लिया था कि उसके आटे से पाँच रोटियाँ बनीं है। 


लेकिन उस महिला ने वृद्ध को केवल चार रोटियाँ ही दीं।  चार रोटियाँ पाकर वृद्ध निराश हो गया। उसे पूरा विश्वास था कि उसके आटे से पाँच रोटियाँ बनी थीं। वृद्ध व्यक्ति ने उस महिला से पूछा -


"पटाखे पाँच रोटी चार क्यों हुई?"  अर्थात तुमने तो पाँच-पाँच बार आटे के गोलों को थपका  था। लेकिन रोटी बस चार ही बनीं!

इस पर उस महिला ने जवाब दिया -

"एक बर टूटी, दो बर पुयी! बुड्ढे रोटी चार ही हुई!"

मतलब एक रोटी टूट गई थी तो उसे दोबारा थपकना पड़ा! इसलिए रोटियाँ चार ही बनीं! 

वृद्ध चुपचाप चार रोटियाँ लेकर अपने घर आ गया। 
  
     -  वीरेंद्र सिंह