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Wednesday, March 17, 2021

शैव्या - नारी शक्ति का प्रतीक

हिंदू पौराणिक ग्रंथ, पद्म पुराण में एक महान पतिव्रता स्त्री की कथा मिलती है। इस स्त्री का नाम शैव्या था।  कथा के अनुसार प्रतिष्ठानपुर नगर में शैव्या नाम की एक पतिवत्रा स्त्री रहती थी। उसका पति कौशिक नाम का एक ब्राह्मण था जो अत्यधिक क्रोधी था।  वह शैव्या पर क्रोधित होता , उसका अपमान करता लेकिन शैव्या अपने पति का बेहद सम्मान करती थी। कौशिक कोढ़ से पीड़ित था जिसके चलते उसके सभी सगे-संबंधी उसे छोड़कर चले गए थे। लेकिन उसकी पत्नी अपने पति की तन-मन से सेवा करती रही। एक दिन कौशिक ने एक अत्यधिक रूपवान वैश्या को देखा। वो उससे मिलने को व्याकुल हो उठा। उसने अपनी पत्नी से सारी  बात बताई और उससे निवेदन किया कि वो उसे उस वैश्या के  पास लेकर चले। 



शैव्या को अपनी पति की इस इच्छा पर जरा भी क्रोध नहीं आया। उसने प्रसन्नतापूर्वक अपने पति की इच्छा को पूरा करने का प्रण किया।  उसने  कुछ विचार किया और पहले उस वैश्या के पास गई। शैव्या ने उसे अपने पति की इच्छा के बारे में बताया।  उस वैश्या ने कहा कि अपने पति को आधी रात के बाद लेकर आना। 

शैव्या ने आधी रात के  बाद अपने पति को कंधे पर डाला और वैश्या के घर की ओर चल पड़ी। रात होने के कारण कुछ दिखाई नहीं देता था। रास्ते में माण्डव ऋषि, चोरी के आरोप में सूली पर इस प्रकार लटके थे कि कोई सूली हिला दे तो उन्हें अत्यधिक पीड़ा होती थी। माण्डव ऋषि अपने शक्ति के प्रभाव से इस पीड़ा से बच सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि उनका विश्वास था कि बचपन में चीटियों को काँटे चुभोने के चलते उन्हें इस कष्ट से गुजरना पड़ रहा है। अंधेरे में शैव्या के पति का पैर सुली से टकरा गया जिससे  ऋषि को अत्यधिक कष्ट हुआ। उन्होंने तुरंत शाप देते हुआ कहा कि जिसने भी सुली को हिलाया है सूर्य निकलते ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। शैव्या ने ऋषि को समझाने का प्रयास कि अंधेरा होने की वजह से ऐसा हुआ इसलिए वो अपना शाप वापस लेले। माण्डव ऋषि ने शाप वापस लेने से मना कर दिया। शैव्या ने ऋषि को चुनौती देते  हुआ कहा कि अगर वो अपना शाप वापस नहीं लेंगे तो वो कल सूर्य उदय ही नहीं होने देगी। और फिर ऐसी ही हुआ। जब सूर्य नहीं निकला तो सृष्टि में हाहाकार मच गया। अंत में स्वयं बृह्मा ने आकर शैव्या  को वचन दिया कि सूर्य निकलने पर उसके पति को वो जीवित कर देंगे। इस प्रकार एक पतिव्रता स्त्री ने न केवल अपने पति के प्राणों की रक्षा की अपितु उसे स्वस्थ भी कर दिया। (जैसा कि ऑनलाइन माध्यमों में वर्णित है)
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पद्मपुराण में कथा कैसे वर्णित है यह स्वयं पढ़कर ही पता चलेगा। इस कथा को आमजन भी कुछ अलग प्रकार से सुनते सुनाते हैं। अपनी सूझ-बूझ, चतुराई, अज्ञानता या फिर स्वार्थवश या समयानुसार कुछ परिवर्तन भी कर देते हैं।   अब इस कथा पर आधारित लोककथा का वर्णन करूंगा जो अत्यधिक रोचक है।

एक समय की  बात  है कि एक गाँव में एक धनी व्यक्ति रहता था।  उसकी पत्नी एक साधारण महिला थी लेकिन वो अपने पति से अत्यधिक प्रेम करने वाली एक पतिव्रता स्त्री थी। अपने  पति के अतिरिक्त वो किसी अन्य पुरुष से बात नहीं करती थी।  गाँव के लोग उसे लज्जावती के नाम से पुकारते थे। लज्जावती का पति एक नंबर का दुष्ट था। वो परस्त्रीगमन करता था।  उसके पास धन की कमी भी नहीं थी। नगर की सबसे सुंदर वैश्या से उसका याराना था। उसने लज्जावताी के तमाम गहने भी उस वेश्या को दे दिए थे। लज्जावती यह सब जानती थी लेकिन उसने कभी अपने पति का विरोध नहीं किया था। पति के सुख को वो अपना सुख समझती थी।  लज्जावती के पति को एक भयानक बीमारी ने घेर लिया। वो कोढ़ से ग्रस्त हो गया। धीरे-धीरे उसकी अवस्था बिगड़ने लगी। उसका स्वास्थय नष्ट होने लगा। धन तो पहले ही समाप्त हो चुका था। ऐसी हालत में  उस वैश्या ने भी उससे मिलने से इंकार कर दिया।



लज्जावती दिन-रात अपने पति की सेवा करती।  यह देखकर उसके पति को अपने किए पर पछतावा होता। लेकिन अब क्या हो सकता था?  एक दिन लज्जावती के पति को लगा कि उसका अंत कभी भी हो सकता है। उसने अपनी पत्नी से कहा कि सबकुछ जानते  हुए भी  तू मेरी इतनी सेवा करती है। मुझे अपने किए पर बहुत पछतावा है। उसने लज्जावती से कहा कि तू मेरी एक  इच्छा  और पूरी कर दे।  तू एक बार मुझे उस वैश्या के पास लेकर चल। लज्जावती को भी यह अहसास था कि यह उसके पति की आखिरी इच्छा भी हो सकती थी। उसने हर हाल में अपने पति को उस वैश्या के पास  ले जाकर उसकी इस इच्छा को पूरा करने का प्रण किया।

उसी रात वो अपने पति को कंधे पर डालकर उस वेश्या के पास ले जाने लगी जिससे उसका पति अंतिम बार मिलना चाहता था। अंधेरा घना था। लज्जावती को केवल यही ध्यान था कि वो हर हाल में अपने पति की अंतिम इच्छा को पूरा करेगी। मार्ग में एक ऋषि तपस्यारत थे। होनीवश लज्जावती  का पैर ऋषि के जल के लौटे में लग गया। पैर लगते ही लौटा उलट गया और सारा जल बिखर गया जिससे ऋषि अत्यधिक क्रोधित हुए। क्रोध में ऋषि ने शाप दिया कि जिसके ध्यान में तुने मेरे जल के पात्र को पैर से गिरा दिया वो सूरज की पहली किरण के साथ मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। ऋषि के ऐसे वचन सुनकर लज्जावती ने कहा कि हे ऋषिवर आपके जल के पात्र को मैंने जानबूझकर पैर नहीं मारा है। भूलवश मुझसे यह अपराध हुआ है। फिर जो अपराध मुझसे हुआ है उसका दंड आप मेरे पति को न दें।  लज्जावती ने हर तरह से ऋषि से क्षमा माँगी। अपने पति की अंतिम इच्छा के बारे में भी बताया। और यह भी बताया कि अगर वो अपने पति की अंतिम इच्छा  पूरी नहीं कर सकी तो जीवित नहीं रह सकेगी। अंत में लज्जावती ने कहा कि ऋषिवर मेरी भूल का दंड मेरे पति को देने का आपको कोई अधिकार नहीं है। 

लेकिन ऋषि ने लज्जावती की  एक न सुनी। लज्जावती ने फिर से विनती कि आप अपना शाप वापस ले लीजिए। मान जाइये। लेकिन ऋषि टस से मस न हुए। लज्जावती को क्रोध आ गया। क्रोध भरी वाणी में उसने ऋषि से कहा कि अगर  आप हठ नहीं छोड़ते तो मेरा भी प्रण है कि मैं सूरज ही नहीं निकलने दूँगी।  ऐसा कहकर लज्जावती  कंधे पर अपने पति को लटकाए एक पैर पर खड़ी हो गई। उस पतिव्रता की शक्ति के सामने भगवान भास्कर असहाय हो गए।  सारे जगत में त्राहिमाम मच गया। अंत में स्वयं ब्रह्मा ने लज्जावती से निवेदन किया कि वो अपनी जिद छोड़ दे। लेकिन लज्जावती ने कहा कि अगर सूरज निकलने देती हूँ तो मेरे पति के प्राणों का क्या होगा? तब ब्रह्मा ने कहा कि हे देवी मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि सूरज निकलने से तेरे पति के प्राण निकलने पर मैं उसे जीवित भी करूंगा और उसे स्वस्थ भी कर दूँगा। अब तू अपनी जिद छोड़ दे। ब्रह्मा के आश्वासन पर लज्जावती ने अपनी शक्ति वापस ले ली और  सूरज फिर से निकल आया।   लज्जावती का मरने के बाद जीवित हो उठा।  लेकिन पूरी तरह स्वस्थ और पहले से अधिक सुंदर और आकर्षक पुरुष के रूप में। लज्जावती के पति को भी अपनी भूल का ज्ञान हुआ इसलिए उसने अपनी पत्नी से क्षमा माँगी। अपने पति को पुनः पाकर लज्जावती की आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।



                   प्रस्तुति: - वीरेंद्र सिंह

Tuesday, March 16, 2021

ऐसे राजा की कथा जो एक शाप के कारण कुल सहित नष्ट हो गया था।

एक ऐसे राजा की कथा जो ब्राह्मणों के शाप के कारण कुटुम्ब सहित नष्ट हो गया था और कुटुम्ब सहित ही अगले जन्म में राक्षस कुल में जन्मा था।


यह महत्वपूर्ण  कथा सुनाने से पहले मैं आपसे  एक प्रसंग साझा करना चाहता हूँ।  एक युवक को फिल्म देखने का बहुत शौक था। एक-एक फिल्म को कई-कई बार देखता था। एक बार वो कहीं पर बैठकर डींग मार रहा था कि मैंने शोले फिल्म 20 बार देखी है।  तभी वहां बैठे एक सज्जन ने उससे पूछा कि क्या तुम बता सकते हो कि फिल्म में गब्बर के बाप का नाम क्या था? प्रश्न सुनकर वह बोला कि फिल्म में गब्बर का बाप था ही नहीं इसलिए उसके बाप के नाम होने का सवाल ही नहीं उठता।  इस पर उस सज्जन ने जवाब दिया कि देखो गब्बर को सजा सुनाते वक्त जज गब्बर के बाप का नाम लेता है। जज कहता है कि गब्बर सिंह वल्द हरि सिंह....?  यानी फिल्म में गब्बर सिंह के बाप का नाम हरि सिंह था। यह सुनकर युवक का मुँह लटक जाता है। यह प्रसंग साझा करने का एक उद्देश्य यह कि हम अपने धर्म को लेकर बहुत ही भावुक होते हैं लेकिन धर्म या धर्मग्रंथों की बहुत सी ऐसी  बातें हैं जिन्हें बहुत से लोग नहीं जानते! जिनके जानने की अपेक्षा हमसे  होती है। रामायण को ही ले लीजिए। तुलसीदासकृत रामचरितमानस में तमाम प्रसंग हैं। लेकिन लोगों को पता ही नहीं। मेरे गाँव में ही हर साल बहुत से घरों में रामायण का पाठ होता है जिसमें रामचरितमानस की चौपाइयों को माइक पर पढ़ा जाता है ताकि सब सुन सके। कभी-कभी हिंदी अर्थ भी बताया जाता है। लेकिन किसी से रामचरितमानस के किसी प्रसंग के बारे में जानना चाहोगे हूँ तो बहुत सारे लोग बता ही नहीं पाएँगे।  ऐसा ही एक प्रसंग आज मैं आपके साथ साझा कर रहा हूँ। आशा है यह आपको पसंद आएगा।






प्राचीन समय में  कैकय नाम का एक देश (राज्य) था जिसके राजा सत्यकेतु थे। राजा सत्यकेतु बड़े बलवान, तेजस्वी और प्रतापी राजा थे। राजा के दो पुत्र थे। बड़े पुत्र का नाम प्रतापभानु था और छोटे पुत्र का नाम अरिमर्दन था। अरिमर्दन युद्ध में पर्वत के समान अटल रहता था। उसकी भुजाओं में बड़ा बल था। दोनों भाइयों में अत्यधिक प्रेम और स्नेह था। समय आने पर राजा का बड़ा लड़का राज्य का उत्तराधिकारी  हुआ। बड़े पुत्र को राज-काज सौंपकर  राजा सत्यकेतु भगवान के भजन के लिए वन को चले गए। उधर राजा प्रतापभानु  वेद में बताई रीति से प्रजा का पालन करने लगे। उनके राज्य में लेशमात्र भी पाप नहीं होता था। राजा के मंत्री का नाम धर्मरुचि था। धर्मरुचि बड़ा ही बुद्धिमान और राजा का हित चाहने वाला था। वो राजा  के हित के लिए उन्हें नीति सिखाया करता था।


राजा प्रतापभानु के पास चतुरंगिणी सेना थी जो अत्यधिक शक्तिशाली थी। अपनी सेना के शौर्य पर राजा मन ही मन बहुत प्रसन्न रहता था।  शुभ दिन और मुहूर्त पर  राजा दिग्विजय के लिए चल पड़ा। जहाँ-तहाँ लड़ाइयाँ हुईं। राजा प्रतापभानु ने सब राजाओं को जीत लिया। अपनी भुजाओं के बल से राजा ने सातों द्वीपों को अपने वश  में कर लिया। जिन राजाओं को जीता था उनसे दंड वसूल कर उन्हें छोड़ दिया। उस समय प्रतापभानु ही एकमात्र चक्रवर्ती राजा था। 

दिग्विजय के बाद राजा ने अपने नगर में प्रवेश किया। राजा प्रतापभानु के राज्य में प्रजा सुखी थी। सभी स्त्री-पुरुष धर्मात्मा थे। स्वयं राजा वेदों के अनुसार राजा के जो भी कर्तव्य थे उनका पालन करता था। प्रतिदिन दान देता था। उत्तम शास्त्र, वेद, और पुराण सुनता था। वेद-पुराणों में जो यज्ञ राजा के लिए बताए गए थे उन सब यज्ञों को राजा ने प्रेम सहित हजार-हजार बार किया था। उसने ब्राह्मणों के लिए घर,  प्रजा के लिए कुएँ-तालाब, फूलबाड़ियाँ और बगीचे बनवाए थे। 

एक बार राजा प्रतापभानु एक अच्छे घोड़े पर सवार होकर विंध्याचल के घने जंगलों में शिकार के लिए गया था। राजा को जंगलों में एक सुअर दिखाई दिया।  अपने दाँतों के कारण वह सुअर ऐसा प्रतीत होता मानो चंद्रमा को ग्रसकर राहु वन में आ छिपा हो। चंद्रमा बड़ा होने से उसके मुँह में समाता नहीं और क्रोधवश राहु उसे उगलता नहीं। विशाल शरीर वाला यह सुअर घोड़े की आहट से घुरघुराता हुआ चौकन्ना होकर देखता है।

राजा, नीत पर्वत के शिखर के समान विशाल इस सुअर की ओर बढ़े। राजा को अपनी ओर आता देख सुअर भाग खड़ा हुआ। राजा ने  बाण चलाया लेकिन सुअर दुबक गया। राजा ने सुअर को मारने के बहुत प्रयास किए लेकिन सुअर छल से हर बार बच जाता। वार होने पर छिप  जाता लेकिन बाद में पुन: प्रकट हो जाता। राजा क्रोधवश सुअर को मारने के लिए आगे  बढ़ता  गया। सुअर बहुत दूर घने जंगल में चला गया। लेकिन राजा ने उसका पीछा नहीं छोड़ा और उसके पीछे चलता गया। घबराकर सुअर एक पहाड़ की गुफा में जा छिपा। गुफा में जाना कठिन जानकर राजा बड़ा निराश हुआ और लौटने लगा लेकिन घोर वन में  रास्ता भटक गया। 






भूख-प्यास से बेहाल थका-मांदा राजा नदी-तालाब खोजने लगा। वन में भटकते-भटकते राजा को एक आश्रम दिखाई दिया। उस आश्रम में मुनिवेश बनाए एक राजा, जिसका राज्य प्रतापभानु ने छीन लिया था और जो सेना को छोड़कर युद्ध से भाग गया था, रहता था। कपट से मुनिवेश बनाकर रहना वाला राजा युद्ध से भागने की ग्लानि के चलते न तो घर ही गया था और अभिमानी होने की वजह से प्रतापभानु से भी नहीं मिला था। 

प्रतापभानु को अपने आश्रम में देखकर कपटी मुनि ने उसे पहचान लिया लेकिन अत्यधिक प्यासा और थका होने की वजह से प्रतापभानु उसे नहीं पहचान सका। कपटी मुनि का वेष देखकर राजा प्रतापभानु ने उसे महामुनि समझा और अपने घोड़े से उतरकर उसे प्रणाम किया। हालाँकि अत्यधिक चतुर होने की वजह से राजा ने मुनिवेशधारी कपटी राजा को अपना नाम नहीं बताया।


मुनि ने राजा प्यासा जानकर उसे सरोवर दिखलाया। राजा ने घोड़े सहित उसमें स्नान और जलपान किया। कपटी तपस्वी, राजा को आश्रम में ले गया और सूर्यास्त का समय जान  उसे आसन देकर अत्यधिक कोमल वाणी में उसने राजा से पूछा, "तुम कौन हो?"  तुम्हारे लक्षणों से लगता है कि तुम चक्रवर्ती राजा हो। लेकिन तुम्हें देखकर मुझे तुम पर दया आती है। 


राजा ने कहा कि प्रतापभानु नाम का एक राजा है । मैं उसका मंत्री हूँ। वन में रास्ता भूल गया हूं। मेरा बड़ा भाग्य है कि आपके चरणों के दर्शन हुए। कपटी तपस्वी ने कहा कि तुम्हारा नगर यहाँ से सत्तर योजन पर है और अब अँधेरा हो गया है। इसलिए आज यहीं ठहरो। सबेरा होते ही चले जाना। राजा ने  कहा जैसी आपकी इच्छा।
 
इसके बाद में राजा ने उस तपस्वी की भाँति-भाँति से प्रशंसा की और उसका परिचय जानना चाहा।  राजा अभी तक उसे पहचान नहीं पाया था। जबकि तपस्वी राजा को देखते ही पहचान गया था। राजा शुद्ध हृदय वाला था लेकिन तपस्वी कपटी था। एक तो वैरी, फिर जाति का क्षत्रिय और फिर राजा । इसलिए उसने छल-बल से अपना काम बनाना चाहा।


राजा की बात सुनकर तपस्वी मन ही मन प्रसन्न हुआ और फिर बोला," हम निर्धन और भिखारी हैं।"
राजा ने कहा कि आप जैसे अभिमान रहित सदा अपने स्वरूप को छिपाए रहते हैं। मुझे पर कृपा करें। आप जो हैं सो हैं। मैं आपके चरणों में नमस्कार करता हूं। राजा को अपने वश में जान कपटी तपस्वी फिर बोला। सुनो राजा मैं आपको सत्य कहता हूँ। मैं यहाँ  लंबे काल से हूँ। आजतक मैं किसी से नहीं मिला। मैं छिपकर रता हँ। मेरा किसी से कोई प्रयोजन नहीं है। तुम सरल हृदय वाले राजा हो इसलिए तुम्हें बताता हूं। हमारा नाम एकतनु है। कपटी तपस्वी ने कहा कि जब सृष्टि की उत्पत्ति हुई थी तभी मेरी उत्पत्ति हुई थी। तब से मैंने दूसरा देह धारण नहीं किया है। इसी से मेरा नाम एकतनु है।


राजा को आश्चर्यचकित देख कपटी मुनि बोला, " पुत्र मन में आश्चर्य मत करो। तप से सबकुछ संभव है। संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे तप से हासिल न किया जा सके।" यह सुनकर राजा को बहुत अच्छा लगा। कपटी ने और भी बहुत सी कथाएँ सुनाई। तप की महिमा का वर्णन किया। तपस्वी के वश में होकर राजा उसे अपना नाम  बताने लगा। कपटी बोला कि मैं तुम्हारा नाम जानता हूं। लेकिन मुझे तुम्हारा कपट अच्छा लगा। यह नीति के अनुसार है कि राजा जहाँ-तहाँ अपना नाम नहीं बताते। इसलिए तुमपर मुझे प्रेम आ रहा है।

तुम्हारा नाम प्रतापभानु है। तुम्हारे पिता सत्यकेतु थे। राजन गुरुकृपा से मैं सब जानता हूँ। तुम्हारी सरलता, सीधापन देखकर मेरे मन में तुम्हारे लिए ममता उत्पन्न हो गई है। मैं प्रसन्न हूँ। जो तुम्हारे मन को भावे वही माँग लो। कपटी मुनि के ऐसे वचन सुनकर राजा मन में अत्यधिक हर्षित हुआ। राजा ने कपटी मुनि से कहा." मेरा शरीर वृद्धावस्था, मृत्यु और दु:ख से रहित हो, मुझे युद्ध में कोई जीत न सके और पृथ्वी पर मेरा सौ कल्पतक एकछत्र अकण्टक राज्य हो।"

कपटी तपस्वी ने कहा - हे राजन! ऐसा ही हो, काल तुम्हारे चरणों में सिर नवाएगा। लेकिन तप के बल से ब्राह्मण बलवान रहते हैं तुम्हें उनके क्रोध से बचना होगा। उनके क्रोध से रक्षा करने वाला कोई नहीं है। हे नरपति! यदि तुम बाह्मणों को वश में कर लो तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी तुम्हारे अधीन हो जाएँगे। ब्राह्मणों के शाप  के अतिरिक्त तुम्हारा नाश किसी काल में न होगा। कपटी मुनि ने आगे कहा कि मुझसे मिलने के बारे में किसी और से कुछ न कहना क्योंकि छटे कान में यह बात पड़ते ही तुम्हारा नाश हो जाएगा।

राजा ने कपटी मुनि से कहा कि मैं तो केवल एक ही डर से डर रहा हूं कि  ब्राह्मणों का शाप बड़ा भयानक होता है।  फिर उसने कपटी मुनि से ब्राह्मणों  को अपने वश में करने का उपाय पूछा। कपटी मुनि ने कहा कि उपाय तो बहुत हैं लेकिन सभी बड़े कष्टसाध्य हैं। मैं तुम्हें एक सहज उपाय बताता हूं लेकिन उसमें भी एक कठिनता है। कारण यह है कि मैं जब से पैदा हुआ हूँ तब से किसी के घर अथवा गाँव में नहीं गया हूँ। लेकिन नहीं जाता हूँ तो तुम्हारा काम बिगड़ता है। 

यह सुनकर राजा कोमल वाणी में बोला कि बडे लोग छोटों पर स्नेह करते हैं। ऐसा कहकर राजा ने कपटी मुनि के चरण पकड़ कर कहा कि आप मेरे लिए इतना कष्ट करिए। कपटी बोला कि राजन् जगत में मेरे लिए कुछ भी दुलर्भ नहीं। मैं तुम्हारा काम अवश्य करूँगा। हे राजन्! मैं यदि रसोई बनाऊँ और तुम उसे परोसो और मुझे कोई जान न पावे, तो उस अन्न को जो कोई खाएगा सो-सो तुम्हारा आज्ञाकारी बन जाएगा। यही नहीं, भोजन करने वालों के घर भी जो कोई भोजन करेगा वो भी तुम्हारे अधीन हो जाएगा। नए ब्राह्मणों को आमंत्रित करना। मैं तुम्हारे संकल्प के लिए  एक वर्ष तक भोजन बना दिया करूँगा। इस प्रकार सभी ब्राह्मण तुम्हारे वश में हो जाएँगे और वे तुम्हारे लिए हवन, यज्ञ और पूजा करेंगे जिससे देवता भी तुम्हारे वश में हो जाएँगे। मैं इस रूप में कभी नहीं आऊँगा। राजन! मैं माया से तुम्हारे पुरोहित को हर लाऊँगा और तप के बल से एक वर्ष तक उसे यहाँ रखूँगा और मैं उसका रूप बनाकर तुम्हारा कार्य सिद्ध करूँगा। अब तुम सो जाओ। मैं तप के बल पर घोड़े सहित तुमको सोते ही घर पहुँचा दूँगा। आज से तीसरे दिन हमारी भेंट होगी। मैं पुरोहित बनकर आऊँगा और तुम्हें सब कथा सुनाउँगा तो तुम मुझे पहचान लेना। आज्ञा मानकर राजा सो गया।

उसी वक्त कालकेतु राक्षस आया जिसने सुअर बनकर राजा को खूब छकाया था और वन में भटका दिया था। कालकेतु और तपस्वी राजा दोनों घनिष्ट मित्र थे। वह छल-प्रपंच में भी माहिर था। कालकेतु के 100 पुत्र और 10 भाई थे जो बड़े ही दुष्ट और पापी थे। देवताओं, संतों और ब्राह्मणों को दु:ख देते थे। इसलिए राजा प्रतापभानु ने उन सबको युद्ध में मार डाला था। इसी  बैर के चलते कालकेतु ने तपस्वी राजा के साथ सलाह कर शत्रु का नाश करने का षडयंत्र किया था। होनीवश राजा प्रतापभानु कुछ समझ नहीं सका था।

कपटी राजा अपने मित्र को देखकर अत्यधिक प्रसन्न हुआ। उसने सारा हाल कालकेतु को सुना दिया। कालकेतु ने कहा कि राजन, अब तुम चिंता त्याग कर सो जाओ। विधाता  ने बिना दवा ही रोग दूर कर दिया है। कुल सहित इस शत्रु को जड़ से उखाड़ कर चौथे दिन मैं तुमसे मिलूँगा। इस प्रकार तपस्वी राजा को दिलासा देकर महामायावी  राक्षस ने राजा प्रतापभानु को क्षणभर में घोड़े सहित उसे महल में पहुँचा दिया। राजा को रानी के पास सुलाकर घोड़े को घुड़साल  में बाँध दिया।

फिर वो राजा के पुरोहित को उठा ले गया और माया से उसकी बुद्धि को भ्रम में डाल उसे पहाड़ की खोह में ला रखा और स्वयं पुरोहित का रूप धरकर उसके विस्तर पर लेट गया। सबेरा होने से पहले ही राजा जाग गया। स्वयं को अपने महल में पाकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। मन ही मन राजा ने कपटी मुनि की महिमा का गुणगान किया।

राजा को तीन दिन तीन युग के समान लगे। इस दौरान उसकी बुद्धि कपटी मुनि के चरणों में ही लगी रही। उपयुक्त समय जानकर पुरोहित के वेश में राक्षस उसके सामने प्रकट हुआ। राजा को  कपटी मुनि के साथ हुई गुप्त सलाह बताई। संकेत के अनुसार  गुरु को पहचानकर राजा बड़ा प्रसन्न हुआ। भ्रमवश राजा को यह भी पता न चला कि यह तपस्वी मुनि नहीं बल्कि राक्षस है।  राजा ने तत्काल एक लाख ब्राह्मणों को कुटुम्ब सहित निमंत्रण दे दिया।

पुरोहित बने राक्षस ने छह रस और चार प्रकार के भोजन, जैसा कि वेदों में वर्णन है. बनाए। उसने मायामय रसोई तैयार की। इतने व्यंजन बनाए कि कोई गिन नहीं सकता था। कपट से अनेक प्रकार के पशुओं का मांस पकाया और उसमें उस दुष्ट ने ब्राह्मणों का मांस भी मिला दिया। राजा ने सब ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलाया और चरण धोकर आदर सहित बैठाया।

ज्यों ही राजा भोजन परोसने लगा, उसी क्षण कालकेतुकृत आकाशवाणी हुई- हे ब्राह्मणों! उठो और अपने घर जाओ, यह अन्न मत खाओ। इसमें ब्राह्मणों का मांस मिला है। आकाशवाणी का विश्वास मानकर सब ब्राह्मण उठ खड़े हुए। राजा व्याकुल हो गया। होनीवश उसके मुँह से एक बात भी न निकली।

ब्राह्मणों को  बड़ा क्रोध हुआ। क्रोधवश उन्होंने कुछ  भी विचार नहीं किया। ब्राह्मणों ने कहा- अरे मूर्ख राजा! तु परिवार सहित राक्षस हो। नीच क्षत्रिय! तुने परिवार  सहित ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें नष्ट करना चाहा लेकिन ईश्वर ने हमारे धर्म की रक्षा की। अब तू परिवार सहित नष्ट हो जा।  एक वर्ष के भीतर तेरा नाश हो जाए। तेरे कुल में कोई पानी देने वाला न रहेगा। शाप सुनकर राजा अत्यंत व्याकुल हो गया। लेकिन एक बार फिर आकाशवाणी हुई-हे ब्राह्मणों! तुमने विचार कर शाप नहीं दिया। राजा ने कुछ भी अपराध नहीं किया था। आकाशाणी सुनकर सब ब्राह्मण चकित हुए। उधर राजा वहाँ गया जहाँ भोजन बना था। राजा ने देखा कि वहाँ न तो भोजन था और न ही भोजन तैयार करने वाला पुरोहित। अपार चिंता में डूबा राजा ने लौटकर ब्राह्मणों को सारी बात बता दी और भयभीत  और व्याकुल होकर राजा पृथ्वी पर गिर पड़ा।


ब्राह्मणों ने कहा- हे राजन! यद्यपि तुम्हारा दोष नहीं है, तो भी होनी होकर ही रहेगी। ब्राह्मणों का शाप टाले टल नहीं सकता। ऐसा कहकर सभी ब्राह्मण अपने घर चले गए। जब नगरवासियों को पता चला तो वे भी चिंतित हो गए। 

उधर पुरोहित को उसके घर पहुँचाकर असुर कालकेतु ने कपटी तपस्वी को सारी बात बता दी। कपटी तपस्वी ने जहाँ-तहाँ पत्र भेजे। परिणामस्वरूप राजा प्रतापभानु के शत्रु राजाओं ने उस पर आक्रमण कर दिया। शत्रु राजाओं ने नगर को घेर लिया। भयंकर लड़ाई शुरु हो गई। राजा प्रतापभानु अपने भाई और मंत्री सहित युद्ध में मारा गया। सत्यकेतु के कुल में कोई नहीं बचा।  ब्राह्मणों का शाप झूठा कैसे हो सकता था। 

समय पाकर यही राजा परिवार सहित रावण नामक राक्षस हुआ। उसके दस सिर और बीस भुजाएँ थीं। वो बड़ा ही प्रचंड शूरवीर था।  राजा प्रतापभानु का भाई अरिमर्दन, कुंभकर्ण हुआ और उसका मंत्री धर्मरुचि रावण का सौतेला भाई विभीषण हुआ। अपनी प्रकृति के अनुरूप यह इस जन्म में भी नीति पर चलने वाला और धर्म के अनुसार आचरण करने वाला था। राजा के सब पुत्र और सेवक बड़े भयानक राक्षस  हुए थे।   इस प्रकार ब्राह्मणों का शाप पूरी तरह सत्य सिद्ध हुआ।


 प्रस्तुति: वीरेंद्र सिंह

Tuesday, February 16, 2021

बसंत पंचमी के अवसर पर विशेष प्रस्तुति


                    बसंत पंचमी और इसका महत्व

सबसे पहले आप सभी को बसंत पंचमी की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ, मंगलकामनाएँ  और बधाई। आप  के जीवन में बसंत ऐसे ही आते रहें।

आज माघ मास की पंचमी तिथि है । इस दिन को बसंत पंचमी भी कहते हैें। इसी तिथि से बसंत ऋतु का आगमन  माना जाता है। बसंत ऋतु को सभी ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ कहा गया है  इसलिए इसे ऋतुराज भी कहते हैं। बसंत ऋतु में प्रकृति अपने अनुपम और अद्भुत सौंदर्य का दर्शन कराती है। प्राचीन काल से ही कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से  ऋतुराज की महिमा का सुंदर वर्णन किया है। यह परंपरा अभी भी जारी है और कवि आज  भी उतने ही उत्साह से बसंत ऋतु का वर्णन अपनी कविताओं के माध्यम से करते हैं। बसंत ऋतु के महत्व का पता इस बात से भी चलता है कि हमें अपनी उम्र, बसंत की संख्या से बताने में विशेष आनंंद और संतुष्टि मिलती है। जैसे अगर कोई व्यक्ति 60 वर्ष का हो चुका है तो बड़े गर्व से कहता है कि वो जीवन के 60 बसंत देख चुका  है।



                         सरस्वती पूजा और इसका महत्व

आज ही के दिन ज्ञान, विद्या, और वाणी की देवी माँ सरस्वती का प्राकट्य दिवस(जन्म-दिवस) भी माना जाता है ।  इसलिए आज के दिन माँ सरस्वती की पूजा-अर्चना  पूरे श्रद्धा भाव से कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। विद्याथिर्यों को तो अवश्य ही माँ सरस्वती की पूजा करनी चाहिए। छोटे बच्चों की  शिक्षा प्रारंभ करने के लिए आज का दिन शुभ माना गया है। किसी नई कला की शुरूआत भी आज के दिन की जा सकती है। ध्यान रहे कि इस दिन कुछ भी नकारात्मक नहीं करना चाहिए।  माँ सरस्वती से प्रार्थना करनी चाहिए कि  उनका आशीर्वाद और उनकी  कॄपा  हम  पर सदा बनी रहे।

               



      कामदेव और देवी रति की पूजा और इसका महत्व

बसंत पंचमी के अवसर पर कामदेव और उनकी पत्नी देवी रति की उपासना भी की जाती है। ऐसा करने से वैवाहिक जीवन में प्रेम और आकर्षण बढ़ता है और जीवन खुशहाल बनता है। दरअसल कामदेव का संबंध बसंत ऋतु से भी है।  हम देखते हैं कि बंसत ऋतु  में मौसम बेहद सुहावना हो जाता है। न ज्यादा सर्दी और न ही ज्यादा गर्मी होती है। विविध रंगों वाले फूल जगह-जगह दिखाई देने लगते हैं जो सबका मन मोह लेते हैं। मन में आशा का  संचार होता है। इसका असर प्राणियों पर होता है जिसके प्रभाव से प्रेमभाव जाग्रत होता है।  प्रेमभाव जाग्रत होने से सृष्टि आगे  बढ़ती है। एक मान्यता यह भी है कि कामदेव और उनकी पत्नी रति,  दोनों ही काम के देवता हैं। कहा जाता है कि कामदेव के पास फूलों से बना एक धनुष है जिससे वो कामरूपी तीर छोड़ते हैं। इस तीर का प्रभाव हर प्राणी पर होता है। तीर के प्रभाव से प्राणियों में कामभाव जाग्रत हो जाता है और स्त्री-पुरुष में आकर्षण और प्रेम बढ़ता है जिससे सृष्टि आगे बढ़ती है।

                           



                                   -वीरेंद्र सिंह