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Sunday, February 21, 2021

महीनिया

                    
                       

एक बार एक गाँव में एक व्यक्ति रहता था जिसका नाम महीनिया था। महीनिया का अपना घर तो था लेकिन घरवाली और बच्चे नहीं थे। हर जगह ऐसे लोग होते हैं जो शादी नहीं करते  या किसी वजह से उनकी शादी नहीं  हो पाती है। महीनिया की भी शादी नहीं हो पाई थी। अकेला होने की वजह से जब मन किया किसी दूसरे गाँव या स्थान पर घूमने निकल गया। इस दौरान वो किसी ऐसे घर की तलाश में रहता जहाँ वो  ठहर सके। उसकी एक खासियत यह भी थी कि वो जिसके घर में रुकता उसके घर से एक महीने से पहले नहीं जाता था।  इसलिए आस-पास के गाँव के लोगों ने उसका नाम महीनिया रख दिया। दूर-दूर तक लोग उसकी इस खासियत से परिचित थे।  महीनिया अव्वल दर्जे का बातूनी और हाजिर जवाब था।  अपने इसी गुण के कारण वो कोई न कोई ऐसा घर तलाश ही लेता जो उसे एक महीने तक रुकने दे।  जिस-जिस गाँव में भी वो जाता था उस गाँव के निवासी उसे कभी भूलते नहीं थे।


Story of a man who stays for one month as a guest
सांकेतिक लोगो

आदत के अनुसार महीनिया ने एक बार फिर से अन्य गाँव में जाकर किसी के घर एक माह रहने की योजना बनाई। उसने तय किया कि इस बार अपने गाँव से 6-7 कोस की दूरी पर स्थित उस गाँव में जाएगा जहां गए हुए उसे काफी लंबा समय हो गया है। पिछली बार जब वहाँ रहा था तो उसे कोई दिक्कत भी नहीं हुई थी। सोच-विचार कर अगले दिन महीनिया मुर्गे की बांग सुनते ही उठ बैठा। जल्दी से तैयार होकर एक थैले में अपने कपड़े रखकर उस गाँव के लिए निकल पड़ा। 


महीनिया तड़के यानी सूरज निकलने के कुछ देर बाद ही गाँव के पास पहुँच गया। गाँव से कुछ दूर पहले एक पेड़ खड़ा था। वो उस पेड़ के नीचे बैठकर सोचने लगा कि किस घर या किसकी बैठक (बड़े-बुजुर्गों का रहने का स्थान जहां वे रात को सो सके और दिन में अपने अन्य साथियों के साथ बातचीत भी कर सके)  में जाकर उसे टिकना चाहिए। गाँव के वे लोग जो सुबह-सुबह अपने खेतों पर घूमकर आते हैं उन्होंने महीनिया को देख लिया। उसका हाल-चाल पूछा लेकिन किसी ने भी उससे यह न कहा कि आओ हमारे घर चलो।  


थोड़ी देर में महीनिया के आने की ख़बर अन्य लोगों को भी होने लगी।  जिन लोगों ने महीनिया को देखा था उन्होंने  बाकी लोगों से बताना शुरु कर दिया कि आज तो महीनिया आ रहा है। मजाक-मजाक में सब एक दूसरे से  कहने लगे कि जिसे भी उसकी  सेवा करनी है उसे अपने घर ले आओ वरना फिर मत कहना की उसकी सेवा का मौक़ा न मिला। क्या पता फिर कब आए या आए ही ना? एक अन्य आदमी न कहा कि वो किसी के कहने से ना आता। अपनी मर्जी का मालिक है जिसके घर भी बैठ गया तो एक महीने बाद ही जाएगा।


उसी गाँव में एक बुढ़िया रहती थी। उसने भैंस भी पाल रखी थी ताकि उसका दूध बेचकर कुछ पैसे जोड़ने के साथ-2 अपना घर भी चला सके। उसकी भैंस दूध भी अच्छा देती थी। बुढ़िया की एक बेटी थी जिसकी शादी हो गई थी। एक  बेटा था जो दूसरे गाँव में किसी के घर काम करता था और वहीं रहता था। समय-समय पर वो अपनी माँ से मिलने आता था। बुढ़िया सोचती थी कि वो जल्दी से जल्दी पैसा इकट्ठा कर अपने बेटे की शादी कर देगी और अपने बेटे और बहू के साथ रहेगी। घर में बहू लाने का सपना पाले बुढ़िया रोज़ घर का काम निपटाकर घास लेने के लिए जंगल के लिए निकल जाती और शाम को ही वापस आती। बुढ़िया अपने जीवन से संतुष्ट थी।


 लेकिन उस दिन जैसे ही उसे महीनिया के आने की ख़बर हुई तो एक बार को उसे लगा कि कहीं ये महीनिया  उसके घर आकर ही न मर जाए? बुढ़िया का मतलब था कहीं उसी के घर न टिक जाए। एक-दो दिन की बात  हो तो कोई रख भी ले। ये तो पूरे महीने यहीं रहेगा। रोटी खाने के साथ-साथ दूध भी पीएगा जिसके लिए बुढ़िया बिल्कुल तैयार नहीं थी। उसने उस सुबह खीर बनाई थी। लेकिन अभी खाई नहीं थी। बुढ़िया ने सोचा खीर तो बाद में खा लूँगी। पहले घर से निकल जाऊँ और जंगल से थोड़ी सी घास ले आऊँ। घर का दरवाजा बंद रहेगा तो महीनिया आएगा भी नहीं।  ऐसा सोचकर बुढ़िया जल्दी से घास छीलने वाला खुरपा और घास लाने वाली जाली लेकर निकल पड़ी।


बुढ़िया ने जंगल में जाकर इत्मीनान की सांस ली। सोचने लगी भूख तो लगेगी लेकिन उस महीनिया से पीछा छूट जाएगा। जब तक वापस जाऊंगी किसी न किसी के घर वो रुक ही जाएगा। बुढ़िया ने घास छीलना शुरु किया और दोपहर तक इतना घास छील लिया कि उसकी जाली भर गई। बुढ़िया ने जाली उठाई और अपने घर की ओर चल पड़ी। घर पहुंचकर उसने देखा कि उसका दरवाजा खुला हुआ है। बुढ़िया के मन में थोड़ा खटका हुआ लेकिन जब घर के आँगन में  देखा और कोई दिखाई न दिया तो उसने चैन की सांस ली। 


बुढ़िया ने घास की जाली एक तरफ रख दी। वो थकी हुई थी। उसने पास में रखे जग से  थोड़ा सा पानी पिया।  बुढ़िया ने अपने आप से कहा कि पहले आराम करूँगी फिर खीर खाऊँगी और वहीं पास में पड़ी एक खाट पर पसर गई।  वो अपनी चतुराई पर बहुत खुश थी। पड़ोस की एक महिला ने  बाहर से  ही पूछा," आज सवेरे-सवेरे ही जंगल चली गई थीं क्या?"  बुढ़िया को लगा कि अपनी अक्ल का डंका बजाने का इससे बढ़िया मौक़ा न मिलेगा। ऐसा सोचकर बुढ़िया ने उस महिला से महीनिया के आने और उससे बचने की अपनी तरकीब के बारे में  कुछ यूं बताया,


" मैं बड़ी चतुर, बड़ी चालाक बड़ी कड़के की, लेके खुरपा-जाली निकल पड़ी तड़के की" 

ऐसा कहते ही बुढ़िया हँसने लगी। उसकी हँसी देखकर महिला के चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट आ गई।


तभी बुढ़िया के मकान के अंदर से एक आवाज आई, 


"मैं बड़ा चतुर, बड़ा चालाक, बड़ा कड़के का, गुड़ से निगल गया मैं खीर पड़ा तड़के का"


अपने घर के अंदर से आई महीनिया की आवाज सुनकर बुढ़िया जल्दी से पीछे मुड़ी और तेज-तेज कदमों से अपनी रसोई में  गई तो देखा कि महीनिया सारी खीर खा गया था। बुढ़िया सर पकड़कर वहीं बैठ गई।


                                            -वीरेंद्र सिंह




                                   

Saturday, February 20, 2021

वृद्ध व्यक्ति और चालाक महिला

किसी गाँव में एक वृद्ध व्यक्ति रहा करता था।  वृद्ध होने के चलते उसे कम दिखाई  देता था। उसकी पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। वृद्ध के कोई सन्तान भी नहीं थी।  गाँव के लोग अक्सर उसकी मदद किया करते थे। लेकिन लोगों की मदद के बाद भी उसका गुजारा मुश्किल से होता था। लोग कितने भी दयालु क्यों न हो लेकिन किसी बेसहारा वृद्ध का हर दिन ख्याल रखना आसान नहीं होता। किसी तरह वृद्ध व्यक्ति के जीवन की गाड़ी चल रही थी।

                                          
Story of an old man and a clever woman.
सांकेतिक लोगों 

अक्सर उसके पास खाने को कुछ नहीं होता था। ऐसे में वो किसी पास के घर से खाना मांग लाता या आटा ही ले आता। आटा मिलता  तो  वृद्ध व्यक्ति स्वयं आटा गूंथता और जैसे-तैसे रोटियाँ बनाकर खा लेता। उसके पड़ोस में एक महिला रहती थी। महिला अक्सर वृद्ध से कहा  करती थी कि जिस दिन उसे आटा मिला करे तो वो उस आटे को लेकर उसके पास आ जाया करे ताकि वो उसकी रोटियाँ बनाकर वृद्ध को खिला सके।


वृद्ध को रोटियाँ बनाने में बहुत परेशानी होती थी। इसलिए वो भी यही चाहता था कि कोई मांगे हुए आटे की रोटियाँ बनाकर उसे दे दिया करे। लेकिन उस महिला के पास जाने में वो हिचकता था। इसका कारण यह था कि जो भी महिला वृद्ध को आटा दिया करती तो उससे एक बात जरूर कहती कि देखो अपनी पड़ोसी महिला से रोटियाँ मत बनवाना नहीं तो वो तुम्हारे आटे से बनी सभी रोटियाँ तुम्हें नहीं देगी! 


इस डर के कारण वृद्ध व्यक्ति पड़ोसी महिला से रोटियाँ बनवाने कतराता था। लेकिन रोटियाँ बनाने में होने वाली कठिनाई ने  उसकी हिचक जल्दी ही ख़त्म कर दी। एक दिन वृद्ध व्यक्ति के पास थोड़ा सा आटा रखा था। रोटियाँ सेकने का उसका बिल्कुल मन नहीं था। वृद्ध ने सोचा कि मेरे पास लगभग चार-पाँच रोटियों का आटा है।  इस आटे से वो महिला चाहकर भी रोटियाँ अपने पास नहीं रख पाएगी। क्यों न पड़ोस वाली महिला से रोटियाँ सिकवा ले?


यह सोचकर वृद्ध व्यक्ति आटा लेकर उस महिला के पास जा पहुंचा। 
उसे देखकर महिला समझ गयी कि वो रोटियाँ सिकवाने के लिए आटा लाया है। महिला ने वृद्ध से आटा लेते हुए कहा ," जब तक मैं इस आटे की रोटियाँ बनाऊँ तुम वहाँ खाट पर जाकर बैठ जाओ।"  वृद्ध व्यक्ति पास ही पड़ी  एक खाट पर बैठ गया। 


महिला ने आटा  गूँथ कर पाँच  रोटियों के हिसाब से गुँथे  हुए आटे के पाँच  गोले बनाएँ। महिला ने उस आटे से पाँच रोटियाँ बनाईं।  उधर वृद्ध देख तो नहीं पाया था लेकिन जब महिला ने आटे के गोलों को पाँच बार थपका था तो आवाज सुनकर वृद्ध ने अनुमान लगा लिया था कि उसके आटे से पाँच रोटियाँ बनीं है। 


लेकिन उस महिला ने वृद्ध को केवल चार रोटियाँ ही दीं।  चार रोटियाँ पाकर वृद्ध निराश हो गया। उसे पूरा विश्वास था कि उसके आटे से पाँच रोटियाँ बनी थीं। वृद्ध व्यक्ति ने उस महिला से पूछा -


"पटाखे पाँच रोटी चार क्यों हुई?"  अर्थात तुमने तो पाँच-पाँच बार आटे के गोलों को थपका  था। लेकिन रोटी बस चार ही बनीं!

इस पर उस महिला ने जवाब दिया -

"एक बर टूटी, दो बर पुयी! बुड्ढे रोटी चार ही हुई!"

मतलब एक रोटी टूट गई थी तो उसे दोबारा थपकना पड़ा! इसलिए रोटियाँ चार ही बनीं! 

वृद्ध चुपचाप चार रोटियाँ लेकर अपने घर आ गया। 
  
     -  वीरेंद्र सिंह