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Tuesday, March 9, 2021

वो दिन अब ना रहे

 वक्त बड़ा बलवान है। वक्त के हिसाब से रहने में ही भलाई है। वो दिन और थे जब आप मुसीबत में फँसे हों तो लोग मदद को आगे आ जाया करते थे। मगर वो दिन अब ना रहे! अब लोग मदद के लिए ना आते बल्कि  फोटो लेने और वीडियो बनाने के लिए आते  हैं। ये ज्ञान मुझे मेरे एक पड़ोसी ने एक लौटा हल्दी वाले दूध  के  बदले में दिया  था। मेरे इस पड़ोसी  से शनि, राहू और केतू एक साथ नाराज हो गए थे! जिसके चलते उनकी पत्नी के मन में ये बात अच्छी तरह बैठ गई थी कि उनके पति का चक्कर किसी पराई स्त्री के साथ चल रहा है। इसलिए उनकी पत्नी ने कसम खाई थी कि जब तक उस पराई स्त्री का भूत अपने पति के सिर से नहीं उतारेगी तब तक  कुछ और नहीं खाएगी!


 
इसके लिए पड़ोसी की पत्नी ने पूरी तैयारी कर ली। जैसे ही शाम को मेरा पड़ोसी अपने घर आया तो पाँच मिनट बाद ही उसकी चीखें सुनकर पूरा मोहल्ला उसके घर इकट्ठा हो गया। लोगों ने देखा कि पड़ोसी की पत्नी अपने पति के सिर से पराई स्त्री का भूत उतारने के लिए ज़बरदस्त एक्शन मोड में थी! मोहल्ले वालों को देखकर पड़ोसी को लगा कि अब वो बच जाएगा! लेकिन ये क्या?  सभी ने अपने-अपने मोबाइल फोनों से उसकी पिटाई का वीडियो बनाना शुरु कर दिया। कुछ बुजुर्ग महिला-पुरुषों ने पड़ोसी की पत्नी से जानना भी चाहा कि आखिर माजरा क्या है ? वो क्यों अपने पति को इतनी बूरी तरह कूट रही है?  


वीडियो बनाने वालों को उनका इस तरह पूछताछ करना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। सभी ने एक स्वर में उन्हें चुप रहने की सख्त हिदायत दी। साथ ही पड़ोसी की पत्नी से विनती की कि आपने जो पीछे से लात मार कर अपने पति को हवा में उछाला था  उसे एक बार फिर से दोहरा दीजिए! आपका वो एक्शन ठीक से रिकॉर्ड नहीं हो पाया था! एक दूसरे व्यक्ति ने लगभग चिल्लाते हुए कहा, " भाबीजी वंस मोर! बहुत बढ़िया एक्शन दिखाया है आपने!  मैं तो अभी-अभी आया हूँ! केवल चंद सेकेंड का ही वीडियो रिकॉर्ड कर पाया हूँ! अब तक जो कुछ हुआ है अगर आप उसे एक बार फिर से दोहरा दें तो बड़ी मेहरबानी हो जाएगी! कुछ लोगों ने बढ़िया एक्शन दिखाने के लिए उसकी तारीफ भी की। लेकिन पड़ोसी को  बचाने का तनिक सा प्रयास भी किसी ने नहीं किया!


पड़ोसी की पत्नी को सिर्फ अपने पति के सिर से पराई स्त्री के भूत को उतारने की चिंता थी इसलिए उसने अपनी तरफ से कोई कोर-कसर बाकी न रख छोड़ी! लेकिन जैसे ही वीडियो बनाने वालों के इरादों का ख्याल आया तो शेरनी की तरह दहाड़कर उन पर लपकी। पलभर में सारे लोग नौ-दो ग्यारह हो गए! मेरे पड़ोसी फिर अकेले पड़ गए और एक बार फिर से पत्नी के हत्थे चढ़ गए। बेचारे तब तक ठुकते-पिटते रहे जब तक कि बेहोश नहीं हो गए। होश आने पर सीधे मेरे पास आए। उनके हालत देखकर मैं समझ गया  था कि पड़ोसी अत्यिधक पीड़ा में हैं। मैंने उन्हें एक लौटा हल्दी वाला दूध पिलाकर उनसे उनकी आप-बीती सुनी जो अभी आपने पढ़ी। "वो दिन अब ना रहे" कहकर पड़ोसी ने अपनी बात ख़त्म की!  इस प्रकरण से जो सीख मिलती है मुझे पूरा विश्वास है कि आप उसे अपने हित में याद रखेंगे! 
                          

                          -  वीरेंद्र सिंह




Saturday, March 6, 2021

उम्र बढ़ाओ भगवान! वरना नहीं करेंगे काम!

                                 

जब भी मैं लोगों को उनकी उचित-अनुचित माँगों को पूरा करने के लिए प्रदर्शन  करते देखता हूं तो मेरे अंदर का सोया  आंदोलनकारी  उस नाग की तरह फुफकार उठता है जिसकी पूँछ पर किसी ने जानबूझकर पैर रख दिया हो। इसकी वजह यह है कि एक आंदोनल मुझे भी करना था लेकिन 24 घंटों में से  20  घंटे तो फेसबुक, ट्वीटर, कू ,यूट्यूब, ब्लॉग वगैरहा  पर ख़र्च हे जाते हैं। अब बाकी बचे 4 घंटों  में  बाकी बचे काम करूँ या आंदोलन ? इसलिए आंदोलन कर रहे लोगों को देख कर मेरी आँखों से वो भयानक जलधारा बहती कि सारे पड़ोसी हाथ जोड़कर मेरे सामने खड़े होकर प्रार्थना करते हैं कि बस कर पगले! अब बहायगा क्या? जनहित में मुझे अपने आँसुओं पर सब्र के बाँध का ब्रेक लगाना पड़ता है।  लेकिन ये आंदोलनकारी!  महज चंद लोगों के हित के लिए बेचारे ये लोग अपना सारा सुख-चैन छोड़कर सड़क पर  उतर आते हैं! माना कि खाने में उन्हें गाजर का हलवा और  बादाम पाक मिलता है! फ्री मालिश भी होती है! पीने को भी मिलती है! और भी बहुत कुछ मिलता है! लेकिन अपने घर  की सूखी रोटी के त्याग को  कम नहीं माना जा सकता!    




जहां तक मेरे आंदोलन का सवाल है तो यह संपूर्ण  मानवजाति के लिए है! बेहोश करने वाली बात यह है कि अपने आंदोलन की फाइल पर मैं स्वयं ही पालथी मारकर बैठा हूँ और बिना दूध की चाय पीते हुए इन्टरनेट पर खर्च हुए जा रहा हूँ!  आंदोलन शुरु कर दिया होता तो आंदोलन का नेता  होने के नाते टीवी चैनलों  को इंटरव्यू दे रहा होता! खीर खाता, दारू पीता,  दूध से कुल्ला करता!  दो चार चेलों को अपनी सेवा में रखता!  जब तक माँग  पूरी नहीं मानी जाती फुल मौज करता!

अब सवाल  उठता है कि किस बात का आंदोलन और किसके खिलाफ ?  आंदोलन उम्र बढ़ाने को लेकर होगा और भगवान के ख़िलाफ होगा! इसमें हैरान-परेशान होने वाली बात नहीं है! ये कोई वेतन-भत्ते बढ़ाने या किसी कानून को वापस लेने का आंदोलन नहीं है। यह आंदोलन उम्र बढ़ाने को लेकर  है। अब उम्र तो केवल भगवान ही बढ़़ा सकते हैं। इसलिए आंदोलन भगवान के ख़िलाफ़ होगा। और प्रचंड आंदोलन होगा!  चूँकि दो-चार साल में तो भगवान दर्शन भी नहीं देते। इसलिए लंबा आंदोलन करना होगा। आंदोलन कितना लंबा चलेगा उस पर अभी कुछ कहा नहीं जा सकता! लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि हमारा आंदोलन पूरी तरह सफल रहेगा। अगर आधी बात भी मान ली गईं तो समझो बात बन गई!

अगर किसी के मन में यह सवाल है कि भई उम्र बढ़ाने के लिए आंदोलन की कौन जरूरत आन पड़ी तो इसका जवाब यह है कि आम इंसान की उम्र तकरीबन 65 साल से लेकर 85-90 साल तक होती है। चंद भाग्यशाली ही ऐसे होते हैं जो 100 वर्ष या और 10-15 साल ज्यादा जी जाते हैं। आज से 100 साल पहले तक तो यह उम्र काफी थी। लेकिन पिछले 100 सालों में हालात बदल गए हैं। 20वीं सदी तो जैसे-तैसे कट गई  लेकिन 21वीं सदी में इतनी उम्र से काम नहीं चल सकता।  बिल्कुल वैसे ही जैसे पिछली सदी  में मिलने वाले वेतन-भत्तों से आज काम नहीं चल सकता था। आज की जरूरतें अलग हैं इसलिए वेतन-भत्ते और अन्य सुविधाओं में निरंतर बढ़ोतरी हुई है और होती रहेगी। चूँकि वेतन-भत्तों को बढ़ाने वाला डिपार्टमंट पृथ्वीलोक में ही है उसके कर्मचारियों का निवास भी यहीं है तो ख़ास दिक्कत नहीं होती । कभी-कभी दफ्तर में तालाबंदी और कामबंदी रूपी बह्मास्त्र चला दिया जाता है और बात बन जाती है! कभी-कभी तो उम्मीद से ज्यादा मिल जाता है!  वहीं उम्र बढ़ाने का डिपार्टमंट भगवान के पास है  और भगवान जी कुंभकर्ण वाली नींद में  सो रहे हैं। इसलिए उन्हें जगाने के लिए  आंदोलन ही एकमात्र रास्ता है। 

एक सवाल यह भी उठ सकता है कि भाई इस 21वीं सदी में इतनी उम्र से काम क्यों नहीं चल सकता? इसका जवाब है कि यह इंटरनेट का जमाना है। इंटरनेट पर बहुत सारे काम है। मसलन  कम से कम 50 साल तो केवल सोशल मीडिया पर वीडियो देखने के लिए ही चाहिए।  इतने ही साल यूट्यूब और फेसबुक के लिए चाहिए।  ट्वीटर और कू  जैसे प्लेटफॉर्म  के लिए अलग से  50 साल की उम्र का बोनस चाहिए।  बाकी बचे हजारों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों और न्यूज पोर्टलों के लिए अलग से 100 साल की आवश्यकता है! अब बचे  पढ़ाई-लिखाई, शादी-ब्याह, नौकरी वगैरहा जैसे मुख्य काम तो इनके लिए पहले की ही तरह 60-65 साल काफी हैं।  इस तरह कुलमिलाकर कम से कम 310-315 साल की उम्र की आवश्यकता है। लेकिन हम 300 में एडजस्ट कर लेगें।  अगर भगवान को इसमें कोई आपत्ति है तो..एक बार आमने-सामने बैठकर बात कर लेते हैं। जितनी उम्र पर सहमति बन जाएगी उसे मान लेंगे। 

 हमारा वादा है कि आंदोलन एकदम साफ-सुथरा और शांतिपूर्ण होगा। किसी भी तरह की हिंसा नहीं होगी। पूजा स्थलों पर कोई तोड़ -फोड़ नहीं होगी! कोई भगवान की सत्ता को चुनौती नहीं देगा। जब तक उम्र बढ़ाए जाने की माँग नहीं मानी जाती तब तक कोई काम नहीं करेगा। केवल एक ही नारा रहेगा; उम्र बढ़ाओ भगवान वरना नहीं करेंगे काम!

          - वीरेंद्र सिंह 

Friday, March 5, 2021

फिर आया ऊँट पहाड़ के नीचे!

लोकतंत्र में नेता लोग जब भी जनता के सामने दंडवत प्रणाम की मुद्रा में आते हैं तो यह दृश्य आत्मा को सुख देने वाला होता है। चुनाव के समय यह मौक़ा जनता को मिलता है। उप्र में पंचायत चुनाव होने वाले हैं। सरकार ग्राम विकास के लिए करोड़ों रुपये खर्च करती है। ग्राम प्रधान बनकर इन करोड़ों का एक हिस्सा अपने लिए भी ख़र्च करने का पूरा चांस मिलता है! इसलिए लोकल नेताओं ने ग्राम प्रधान बनने के सपने लेने शुरु कर दिये हैं। जनता और नेता दोनों एकमत हैं  कि  बेरोजगारी के दौर में अगर प्रधानी मिल जाए तो अगली सात पुश्तों की न सही कम से कम अपनी आर्थिक समस्याओं का समाधान पाँच साल में ही हो जाएगा। ऐसा मौक़ा हाथ से जाने देना मूर्खता होगी।         

    
satire on candidates doing funny things to seek votes in UP panchayat elections
सांकेतिक चित्र


चुनाव जीतकर मलाई खाने का सपना बड़ा मस्त होता है लेकिन होता तो सपना ही है। इसमें जब तक हक़ीकत के रंग न भरे जाए तब तक ऐसा सपना मुंगेरीलाल के हसीन सपने से ज्यादा कुछ नहीं है। इन सपनों में हक़ीकत का रंग भरने का काम जनता का है। इसलिए भावी प्रधान  बड़े जतन के साथ जनता को रिझाने का यत्न कर रहे हैं।  एक महीने पहले ही हर मतदाता के सामने अपनी मुंडी को झुकाना शुरू कर दिये हैं। कोई मतदाता दिन में 10 बार भी सामने पड़ जाता है तो 10 बार ही सिर झुकाकर उसके हाल-चाल पूछते हैं और शाम तक 10 बार और मिलने का विनम्र निवेदन करते हैं। अब अगर चुनाव जीतने के बाद नेताजी अगले पाँच साल तक किसी के सामने अपनी मुंडी न भी झुकाए तो किसी को बुरा नहीं मानना चाहिए। 


हाल-चाल पूछते-पूछते नेताजी की हालत भी अभी से पतली हो रखी है! जबकि चुनाव होने में महीनेभर का समय है!   कई बार हाल-चाल पूछते वक्त सारा हिसाब-किताब गड़बड़ा जा रहा है। एक व्यक्ति ने भावी प्रधान को बताया कि उसकी बीबी बहुत बीमार है तो भावी प्रधान ने उसको आश्वासन दिया कि चिंता मत करो। तुम्हारी बीबी मेरी बीबी! मैं उसको कुछ नहीं होने दूँगा। एक अन्य मतदाता से भावी प्रधान कहते हैं कि आपके वोट की चिंता तो हमें ना हैं! तुम्हारी भौजी यानी हमारी पत्नी जी कह रही थीं कि तुम्हारा वोट तो हर हाल में हमें ही मिलेगी! उस मतदाता की पत्नी साथ में ही खड़ी थी। अपनी पति की आँखों में जैसी ही उसने अपनी आँखे डाली पति महोदय ने पत्नी का हाथ पकड़कर तत्काल वहां से रवानगी डालने में ही अपनी भलाई समझी। भावी प्रधान की भावनओं में कोई खोट नहीं थी। बस सामने वाले को दिलासा देते हुए या अपनापन जताते हुए वो क्या बोल रहे थे उन्हें कुछ नहीं समझ आ रहा था! 

प्रधान बनने के सपने लेने वालों का चुनाव पूर्व का टाइम कितना जटिल होता है इसकी व्याख्या तो केवल वही कर सकते हैं। लेकिन कल्पना तो हर कोई कर सकता है। हार का खटका बराबर लगा रहता है जो उम्मीदवारों को चैन नहीं लेने देता। मतदाता को रिझाने के लिए बातों में इतनी मिठास भरकर रखनी पड़ती  है कि थोड़ी देर भी कोई उनकी बात सुनले तो उसे अगले दिन ही चैकअप कराना पड़ता है कि कहीं शुगर की बीमारी तो नही हो गई?

एक भावी प्रधान का हाल तो यह है कि अगर किसी मतदाता ने उसे दिन में केवल 5 बार ही दर्शन दिए हैं तो शाम को उसके घर जाकर उससे पूछता है कि भैया आज केवल पाँच बार ही आए? अगर बीस बार  न  भी आ सको तो कम से कम 10-15 बार तो सामने आ ही जाया करो। वरना दिल की धड़कन बढ़ने लगती है कि कहीं आपका नैन मटक्का किसी और पार्टी के साथ तो नही चल रहा है?  

 चुनाव में पत्नी की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है। इसका खुलासा भी स्वयं एक अन्य भावी प्रधान ने किया है। यह महोदय अचानक अपनी पत्नी की हर बात मानने लगे हैं और पत्नी के सामने आते ही हर बार उसका हाल-चाल पूछते हैं। पत्नी को बार-बार याद दिलाते हैं कि तुमने अपने मायके वालों को  बहुत दिनों से कोई गिफ्ट न दिया? सब ठीक तो है न? वगैरहा-वगैरहा!  किसी ने इसकी वजह पूछी तो कहने लगे कि ये चुनाव है। इसलिए कोई चांस नहीं ले सकते। पत्नी भले ही एक है लेकिन 100 वोटों का इंतज़ाम तो वो अकेले ही कर सकती है। दिन भर पूरे गाँव की औरतों से पानी-पाचा(पर-निंदा-पर-चर्चा) कर मजे लेने वाली पत्नी को इस वक्त नाराज़ करने की कोई तुक ही नहीं है। कहीं ऐंठ में टैट हो गई  तो अपना वोट भी नहीं डालेगी। बाकी सौ वोट भी जाएँगे सो अलग।


भावी प्रधानों में एक सहमति भी बनी है और बाकायदा सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए है कि फलां तारीख तक केवल गर्दन झुकाकर राम-राम, नमस्ते या दुआ सलाम कर हाल-चाल से ज्यादा नहीं बढ़ेगे। फलाँ तारीख से फलाँ तारीख तक केवल दारु और दावत का दौर चलेगा लेकिन कोई गिफ्ट वगैरहा अभी नहीं देना है। चुनाव से तीन दिन पहले गिफ्ट देना शुरू करना है। अगर किसी उम्मीदवार ने  तनिक भी सयानापन दिखाया तो उसकी खैर नहीं। सयानेपन से मतलब कि चुपचाप किसी मतदाता को अभी से शराब पिलाना. दावत या गिफ्ट देना वगैरहा-वगैरहा..। अगर सहमति न भी हुई होती तब भी चुनाव के इतने समय पहले लोगों को खिलाना-पिलाना शुरू करना कतई बुद्धिमानी नहीं है। फिर चुनाव में जीत तो किसी एक की ही होनी है। जीतने वाला तो अपना ख़र्च आसानी से निकाल लेगा। हारने वाले को हाथ मलने और पत्नी की तानों के अलावा कुछ नहीं मिलना। इसलिए बेहिसाब खर्च लिमिट में ही करने में भलाई है।


जनता और नेता का  संबंध पहाड़ और ऊँट जैसा होता है। जनता, पहाड़  होती है और नेता  ऊँट!  पहाड़, ऊँचा होता है लेकिन जब तक यह ऊँट,पहाड़ के नीचे नहीं आता तब तक इसे यही लगता है कि वो ऊँचा है। चुनाव के वक्त नेता लोग इस भ्रम रूपी केंचुली को थोड़े समय के लिए उतार देते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो नेता रूपी ऊँट, जनता नामक पहाड़ के नीचे अपने आप आ जाता है। और न केवल आता है बल्कि उसके खौफ़ से दुबला भी हो जाता है। थोड़े समय के लिए ही सही लेकिन इस ऊँट के पहाड़ के नीचे आने से जनता के चेहरे खिले हुए हैं।  






                                    -वीरेंद्र सिंह




उप्र पंचायत चुनाव प्रक्रिया लंबी चलनी है। इसलिए इससे संबंधित व्यंग्य में कुछ और कड़ी भी जुड़ जाए तो हैरान मत होइएगा। भगवान आपको मुझे  बर्दास्त करने  की शक्ति दे।  मैं आपके लिए प्रार्थना करूँगा। धन्यवाद। 



Wednesday, February 17, 2021

धंधे में मंदी से बचने का 'उल्लू बनाओ' उपाय!

                          

 पढ़े.. काम जमाने का अचूक उपाय!
 कैसे गुल्लू भी लोगों का उल्लू बनाएं!

                                                  

दिल्ली- नोएडा में भीड़ृ-भाड़ वाली जगहों या किसी मॉल के सामने कलकत्ता या बनारस का ड्राइ पान बेचने वाले की शक्ल पर कभी मत जाना। उसकी अक्ल की दाद देना और  दबाकर पान बेचने के लिए लगाई तरकीब को नमस्कार करना। पान वाले के पास में ही हैदराबाद की बिरयानी, मुंबई की भेलपूरी- सेवपूरी- झालमूड़ी, मद्रासी मैथा और गुजरात का शहद आमला  बेचने वाले उसी तरकीब के दम पर दमदार कमाई करते हैं।  इन्होंने अपने धंधे का चलाने की जो तिकड़म भिड़ाई है उसकी काट तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं मिलती। इसलिए इनको सम्मान मिलना चाहिए। धंधे को कामयाब बनाने की इनकी असाधारण समझ पर शोध होना चाहिए। जिस व्यक्ति ने पहली बार इस तरह के विचार को अपनाया था उसकी खोज-खबर लेनी चाहिए ताकि उसका पर्याप्त सम्मान किया जा सके। "धंधे में कामयाबी का गुरु" जैसे खिताब से उसे नवाजा जा सके। बिजनिस में रातों-रात रिकॉर्ड तोड़ कामयाबी के लिए आतुर तिकड़मबाज उसके चरणों की धुली अपने माथे पर लगा सके।  अगर वो अब इस दुनिया में न हो तो उसके परिजनों में से जो मिले उनका सम्मानित करना चाहिए। और हां  कामयाबी उनका ये उपाय हर जगह के लिए है।


The Perfect Selling Art
सांकेतिक चित्र
The perfect selling trick
सांकेतिक चित्र


                                                
 जीने के लिए कोई न कोई धंधा करना पड़ता है और उस धंधे को चलाना पड़ता। धंधा अगर मंदा  हो जाए तो तमाम तरह के  शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और  सामाजिक कष्ट पीड़ा देते हैं। इसलिए  धंधा कभी मंदा न पड़े इसके लिए बहुत कुछ करना पड़ता है। पान तो पान ही है। अगर आप उसे पान के नाम से बेचोगे तो खाने वाले को कुछ स्पेशल नहीं लगेगा। स्पेशल नहीं लगेगा तो पान नहीं खाएगा। नहीं खाएगा तो  धंधा चौपट हो जाएगा।  लेकिन अगर ग्राहक को  बताया जाए कि पान बनारस या कलकत्ता का है तो झपट के चबा डालेगा। महंगा हो तब भी।  बिरयानी वाला अगर हैदराबाद की बिरयानी कहकर न बेचे तो खाने वाला समझ जाएगा कि इसकी बीबी ने ही बनाई है और बहुत सारे लोग तो ये मान ही नहीं सकते कि बीबी भी बढ़िया बिरयानी बना सकती है। रेट कम कर दिये तब भी नहीं। सबका मानना है कि बिरयानी तो हैदराबाद वाले ही बनाते हैं। इसलिए  जब बिरयानी वाले की बीबी ने अपने छोटे-छोटे बच्चों की सुबह की नौकरी करने के साथ-साथ  बड़ी मुश्किल से बिरयानी तैयार की तो बेचने को ले जाने से पहले विक्रेता चतुर सिंह ने ठेले पर लिखवा दिया हैदराबाद की मशहूर बिरयानी। अब खाने वाले ये न पूछेगें कि बिरयानी किसने बनाई और किस हाल में? ठेले पर लिख देने भर से बिरयानी में उन्हें हैदराबाद का स्वाद आने लगता है। जैसे पान में बनारस और कलकत्ता के पान का स्वाद आ जाता है।  इसका पता लगाने की फुरसत किसके पास है कि पान या बिरयानी में वास्तव में कहां का स्वाद है। अगर फुरसत हो भी तो किसे पड़ी है।

The perfect selling Art
सांकेतिक चित्र
The Trick of Getting success in selling
सांकेतिक चित्र



पड़ोस में एक मास्टर जी बहुत दिनों से कह रहे थे कि मैं अंग्रेज़ी बोलना सीखाता हूं। अपने घर के बाहर एक और मोहल्ले में जगह-जगह बोर्ड लगवा दिया कि  किसी भी उम्र के महिला-पुरुष, कामकाजी, बेकार, कॉलिज-गोइंग लड़के-लड़कियां मुझसे अंग्रेज़ी सीख सकते हैं। फीस भी कम लूंगा। लोगों ने पूछा तो जरूर लेकिन फीस न जमा की। मास्टर जी बेचैन हो उठे। पास के शहर में अंग्रेजी बोलना सीखाने वालों पर  गौर  किया तो ता चला कि उनके मोहल्ले का ही 10 साल पहले तीसरी बार में 10 वीं पास करने वाला गुल्लु ,  ब्रिटिश इंग्लिश सिखा रहा है। उसके छात्र बड़े प्यार और सम्मान से उसे गुलाब सर कहते हैं। सीखने वालों  की भीड़ लगी हुई है। मास्टर जी को पसीना आ गया। जो गुल्लू ढंग से हिंदी न बोल पाता हो वो ब्रिटिश अंग्रेज़ी सिखा रहा है। मास्टर जी के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। दौड़कर गुल्लू की कामयाबी का राज जानने के लिए उसके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए! गुल्लू ने मास्टर जी या यों कहिए कि किसी भी मास्टर को पहली बार बड़े ध्यान से सुना! सुनने के बाद मुस्कराया। उसकी कुटिल मुस्कान बता रही थी कि उसे पता चल गया है कृपा कहां रुकी पड़ी है। गुल्लु ने उल्लू बनाने का तरीका बताते हुए कहा कि मास्टर जी ऐसे अंग्रेज़ी कोई न सीखेगा! अब से यह कहना शुरू कर दो कि आप अमेरिकन,  कैंब्रिज, ऑक्सफर्ड या हॉवर्ड की अंग्रेज़ी सिखाते हो। फिर देखो! मास्टर जी ने उसी दिन कहना शुरु कर दिया कि आज से वो केवल अमेरिकन अंग्रेज़ी ही सिखाएंगे। रातों-रात मास्टर जी के दिन फिर गए। उन्हें मनमाफिक कामयाबी मिली। गुल्लू का उपाय अचूक निकला। 


                                      -वीरेंद्र सिंह

Sunday, February 7, 2021

वैलेंटाइंस डे(Valentine's day)

 

संत वैलेंटाइन की कृपा से बसंत बहार में झूमने का पहला मौक़ा युवाओं के नाम!

                        
                                          
बसंत की युवास्था का आनंद भी युवास्था वाले लड़के-लड़कियों यानी नई उम्र की नई फसल ने अपने लिए रिजर्व कर रखा है। वैसे है सबके लिए..लेकिन बसंत बहार में पगलाने - हकलाने- नाचने-गाने का पहला अवसर इन्हीं के हाथ लगता है। क्यों लगता है? वैलेंनटाइंस डे की कृपा से! अब बच्चे भी वैलेंटाइंस डे जानते हैं! इटली के संत वैलेंटाइन की याद में 14 फरवरी को मनाया जाना वाला संत दिवस। प्रेमी जन उन्हें प्रेम का समर्थक मानते हैं इसलिए उनकी पुण्यतिथि पर वैलेंटाइंस डे यानी प्रेम पृकटीकरण दिवस धूमधाम(कभी-कभी कुट-कुटाकर या पिटकर) मनाते हैं। यूरोप वाले संत दिवस भी मनाते हैं। वैलेंटाइंस डे भले ही एक दिन आता हो लेकिन चोंच लड़ाने को आतुर परिंदे  7 दिन पहले से ही रोज़ डे, प्रपोज डे, चॉकलेट डे, टेडी डे, प्रॉमिस डे, हग डे, किस डे के नाम पर फुल ऑन रोमांच, रोमांस और मस्ती में डूब जाते हैं। फिर आता है मुख्य दिवस यानी वेलेंटाइन डे।  मतलब प्रेम की स्वीकारोक्ति का दिन। अगर आप किसी से प्यार करते हैं तो इस दिन बेझिझक उससे कह सकते हैं। यह अंग्रेज़ों की देन है। लिहाजा वैलेंटाइंस डे किस  तरह  मनाया जाए यह उन्होंने ही तय किया है। 


Valentines are popular among youths. Happy Valinetine's day 2021.
वैलेंटाइंस डे का दिन गुलाबी-गुलाबी !


देसी छोरे-छोरियां हिंदुस्तानी तड़का मारकर अपने विधि-विधान स्वंय तय करते हैं
। वैलेंटाइंस डे वास्तव में मौज़-मस्ती वाला अति रोमांसकारी दिन होता है! उस दिन किसी भी बंधन को मानना, स्वीकारना या शर्माना  पाप होता है। इश्क का भूत खाते-पीते-मस्ती एक साथ करते हुए देखा जाता है। मूवी देखता है। सावधानीपूर्वक! थोड़ा सा ध्यान यह रखना होता कि  कहीं संस्कृति रक्षक दल के सिपाहियों की नजर न पड़ जाए नहीं तो मुर्गा बनना पड़ सकता है। कई बार सबके सामने पिटाई हो जाती है। सबसे ज्यादा डर इस बात का रहता है कि संस्कारियों की टोली उन्हें भाई-बहन न घोषित कर दे या कहीं वहीं फेरे न करा दे। वेलेंटाइंस डे है, कोई रक्षा बंधन डे और मैरिज डे तो है नहीं। वैसे भी भाई-बहन बनने की तुक नहीं और मैरिज डे होता नहीं। वेलेंटाइंस डे के पहले 7 दिन और बाद के दिनों में मेरिज डे कभी नहीं होता। वेलेंटाइंस डे के बाद स्लेप डे यानी थप्पड़ डे, किक डे, परफ्यूम डे, फ्लर्टिंग डे, कंफेशन डे, ब्रेक अप डे और भी न जाने कौन-कौन डे लिस्ट में होते हैं।

 मैेरिज डे क्यों नहीं होता ये  एक शोध का विषय है। चॉकलेट खिला दी। गुलाब दे दिया। टेडी बेयर दिया। फ्लर्ट  किया,  प्रॉमिस किया,, गले लगाया,  किस किया,  प्रपोज किया, वेलेंटाइन वाले दिन साथ-साथ घूमे-फिरे, सारे अरमां पूरे कर लिये, एक दूसरे को दिल के आकार वाले लाल-गुलाबी गुब्बारे थमा दिए, साथ में खाया-पिया। संस्कारी योद्धाओं से भी पिटाई खाई और इज़हार-ए-इश्क भी किया। लेकिन सारा कार्यक्रम ब्रेकअप डे तक ही चलता है। मैेरिज डे नहीं आता। वेलेंटाइंस डे के अगले दिन थप्पड़ डे होता है। ये किसलिए होता होगा?  दोनों ही एक दूसरे को थप्पड़ लगा सकते हैं या फिर लड़की को ही विशेषाधिकार होता है यह भी स्पष्ट नहीं है। मुझे लगता है कि यह लड़की(लड़के के लिए भी हो सकता है) के लिए होता होगा कि अगर लड़का पसंद नहीं तो  उसे थप्पड़ मार के जता सके कि चल भाग अगली बार दिख न जाइयो! और अगर लड़का फिर भी न माने तो फिर किक डे आता है ताकि लड़की किक मारकर लड़के को भगा सके। जो लड़का थप्पड खाकर न भाग हो वो  किक पड़ने पर मान जाएगा ये बात तो वैसे भी गले नहीं उतरती!  इसलिए अब परफ्यूम डे आता है। परफ्यूम की खुशबू से वातावरण सेट किया जाता है। पटरी से उतरी अपनी गाड़ी को वापस पटरी पर कैसे लाया जाता है नौजवान पीढ़ी बहुत अच्छे से जानती है। थप्पड़ और किक खाने के बाद परफ्यूम से जो माहौल बनाया था उसके लाभ की आस में फ्लर्ट की कार्यवाही शुरू होती है।


 अब दो बातें होती है। लड़की मानेगी या नहीं मानेगी! लड़की नहीं मानेंगी तो उसी दिन ब्रेक अप। लड़की मान जाती है तो अगले दिन कंफेशन कर लेती है और उससे अगले दिन ब्रेकअप। अब सवाल ये उठता है कि जब मान गई तो  ब्रेक अप क्यों? सीधा सा उत्तर है!  कंफेशन के बाद तो मैरिज की बात आती है। और मैरिज डे होता नहीं है! यानी वैलेंटाइंस डे प्रोग्राम में बस इतना ही होता है! रोज़ डे से शुरू होता है और ब्रेकअप पर ख़त्म होता है। वैसे अगर मैरिज डे होता भी तो क्या मैरिज होती! अब होती या नहीं होती उन पर छोड़ देते हैं जो इसी दिन गुटरगूँ करते हैं। ऋतुराज के स्नेह की नर्म धूप में खूब इतराते हैं। हर्षित मन से उम्मीदों के साथ बसंत ऋतु का स्वागत करते हैं! आप भी करिए। बसंत -बहार की बयार में बहने-बहकने का अधिकार सबका है!  इसलिए बहना-बहकना शुरू कर दीजिए! बसंत-बहार का स्वागत करिए। 

 
                                           
                              -वीरेंद्र सिंह

Friday, January 29, 2021

ख़ूब चले उसका सिक्का! ढोंग कला में जो है पक्का!

                                      कलाओं में कला, ढोंग कला



विधाता ने इंसान पर बहुत सी ऐसी कलाओं की भी बारिश की है जिनका प्रदर्शन नैतिक रूप से सही नहीं माना जाता। जैसे झूठ बोलने की कला! चोरी करने या चुगली करने की कला, जिसका खाओ उसी का बैंड बजाने की कला। ऐसी और भी बहुत सी कलाएँ हैं। ये सभी कलाएँ बड़े काम की हैं। ऐसी ही एक कला  है.. 'ढोंग कला' मतलब ढोंग करना (नाट्य कला मेरी नज़र सम्मानित कला है)'! ऊपर जिन कलाओं की चर्चा की गई है यह उनकी ही रिश्तेदार है। यह बड़ी अद्भुत कला है! व्यवहारिक जीवन में इसका प्रयोग भाँति-भाँति से किया जा सकता है। स्थिति चाहे जैसी हो आप इसे काम पर लगा सकते हैं। इस कला का फायदा अगर कायदे से उठा लिया तो बंदे को जीवन भर कुछ और करने का कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा। हर स्थिति में इस कला का लाभ लिया जा सकता है। 


Satire on Art of fooling others. A must read satire.
ढोंग करना भी एक कला है जो सबको नहीं आती!



कोई काम बिगड़ जाए तो इस कला की मदद से वह काम फिर से बन सकता है। हाँ.. पूरी तरह बनेगा या नहीं ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितने बड़े कलाकार हैं। देखिए कला में माहिर होना बहुत ज़रूरी है। तभी पूरा फायदा मिलता है। अगर कोई जेबकतरा जेब काटने में सफ़ाई न बरते तो जेब तो हाथ से जाएगी ही, साथ में कुटाई भी हो जायेगी।  लेकिन ...लेकिन..ये 'लेकिन' बहुत कमाल की चीज़ है! अगर किसी बंदे को जेब कतरना निहायत ही ज़रूरी हो तो क्या करे? इसका उपाय ये है कि जेब काटने की कला को तो बाद में धार दे पहले ढोंग कला को उभार ले। फिर देखिए तस्वीर बदलती है या नहीं! किसी की  जेब पर हाथ साफ़ करते वक्त अगर जेबकतरे का हाथ जेब मालिक के हाथ में आ भी जाए तो फौरन ढोंग शुरू कर दें। बीमार, पागल या गूंगे -बहरे होने का ढोंग आराम से किया जा सकता है। एकदम नीचे गिरकर कुछ ऐसी हरकतें कर सकते हैं कि आप पर दौरा पड़ा है। जेब मालिक के पैरो को मजबूती से पकड़-जकड़ कर, रो-रोकर अपनी बेचारगी प्रदर्शित कर सकते हैं। ढोंग जितना बढ़िया होगा बचने के चांस उतने ही बेहतर होंगे। अगर थोड़ी बहुत गाली खाकर ही बच निकले तो समझो मेहनत वसूल हो गयी! पिटने से तो बचे।


 किसी बड़े आंदोलन में व्यवस्था बनाये रखने की ज़िम्मेदारी संभाल रहा कोई पुलिसवाला अगर भीड़ के  हत्थे, निहत्था चढ़ जाए तो कैसे बचेगा? वक़्त बिल्कुल नहीं होता। इससे पहले कि कोई उसे बचाए भीड़ उसे धुन देगी। तत्काल ढोंग करना होगा। सबसे पहले बेहोश होने का ढोंग करे। अगर अच्छे से कर लिया तो बहुत ख़ूब। नहीं तो  फौरन हाथ जोड़ कर भीड़ से क्षमायाचना करें और उन्हें कायदे से समझाए कि भैया मैं तो तुम्हारे ही साथ हूं।  नौकरी के चक्कर में उधर खड़ा हूं वरना तुम्हारे आंदोलन के लिए तो मेरी जान भी हाजिर है। घर बैठे चार छोटे-छोटे बच्चों की कसम अगर मेरे कंधों पर उनकी ज़िम्मेदारी न होती तो अपने हाथ का यह  डंडा अभी अपने साथी पुलिसवालों वालों पर बजा रहा होता। आप लोगों के  बीच में आया ही इसलिए हूं। अपने साथियों के साथ तो मेरा दम घुट रहा था। अब जब आपके बीच में आ ही गया हूं तो भैया गले मिले बिना तो ना जाऊंगा। मेरी आँख से बहते हुए आँसुओं को आपके कंधों का सहारा मिल जाए तो मेरा जीवन धन्य हो जाएगा। एक सेल्फी भी लूंगा। इसे अपने बच्चों को दिखाऊँगा कि कैसे मैंने अपने साथियों की आँखों में धूल झोंककर आप जैसे क्रांतिकारियों के इतने करीब से दर्शन का सौभाग्य पाया था। 


मैंने एक मनचले को अपनी ढोंग कला के अद्भुत प्रदर्शन के दम पर एकदम पिटने, कुटने, ठुकने वाली सिचुएशन से कुशलतापूर्वक बाहर आते देखा है। बंदे ने जिस लड़की को छेड़ दिया था उसने वहीं उसका गला पकड़  उसका भविष्य तय कर दिया था! नीच..अधम.. आज तो तु गया! इतने सैंडल मारूंगी कि अपनी बीबी को भी नहीं छेड़ेगा। जैसे ही उसने सैंडल निकाला मनचले ने अपनी दोनों आंखों से आँसुओं का सैलाव बहाते हुए लड़की के पैरों में लौटम-लौट ऐसा ढोंग किया कि लड़की को मनचले की खातिरदारी का प्रोग्राम कैंसिल करना पड़ा।

राजनीतिक नेताओं के ढोंग से आप सभी परिचित होंगे। सच तो ये है कि नेता लोग ढोंग ही ज्यादा करते हैं, काम कम करते हैं।  किसी बड़े नेता की पोल खुलने वाली हो या खुल जाए तो उसे तो हर हाल में ढोंग कला की शरण में जाना ही होगा। बिना ढोंग के उसकी नेतागीरी गंदे नाले में डूब जाएगी। इसलिए जब भी कोई नेता ढोंग करता है तो उसका आनंद लिया जाना चाहिए। ऐसे नेता बहुत अच्छे लगते हैं जो टॉप ढोंगियों में अपना नाम दर्ज कराने को आतुर रहते हैं।  लेकिन बहुत से नेता ऐसी भी हैं जिन्हें ढोंग कला अच्छे से नहीं आती लेकिन मजबूरी में इस कला की शरण में जाना पड़ता है। ऐसे नेताओ की नेतागिरी तो बची रहती है लेकिन गालियों का स्वाद भी लेना पड़ता है।

इसलिए ढोंग करते  हुए सावधानी बरतनी चाहिए। मतलब कि ढोंग कला को ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हो तो ढोंग ज़बरदस्त होना चाहिए ताकि परिणाम आशानुरूप आए। ध्यान रखना कि अगर ढोंग कला का प्रदर्शन प्रभावशाली नहीं तो आपका बैंड भी बज सकता है। बहुत से आधत्यात्मिक गुरु ढोंग कला में निपुण न होने की वजह से जेल में चक्की पीस रहे हैं। इसलिए अगर ढोंग कला की कृपा चाहिए तो पहले इसमें आप को थोड़ी मेहनत करनी होगी।  इस सलाह को गांठ बाँध लीजिए कि.....
                                                  जम जाए उसका सिक्का!
                                                  ढोंग कला में जो है पक्का!                          
                                              
                                                 -वीरेंद्र सिंह




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Saturday, January 16, 2021

चीनियों की इस ट्रिक को हमें अपनाना होगा

यह चीनी कमाल तो हमें भी ज़रूर करना चाहिए!

 दुनिया में बड़े-बड़े चमत्कारी लोग भरे पड़े हैं। चीनी लोग भी उन्हीं में से हैं।  चीनी  जो कमाल करते हैं उसकी बात ही निराली है। उस कमाल से चीनी मालामाल हो रहे हैं। दुनिया भर में छाए हुए हैं।  कोरोना काल में भी चीनी अर्थव्यवस्था मटक-मटक कर चल रही है। इसके उल्टे बाकी दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं ज़ोर-ज़ोर से हांफ रही हैं। नहीं-नहीं! ये कोई जादू नहीं करते। बस मेड इन चाइना सामान को दुनिया के कोने-कोने में फेंकने का कमाल करते हैं ये चीनी। घटिया क्वालिटी का सामान हो या बढ़िया क्वालिटी का...इन्होंने हर हाल में अपने सामान को बाकी देशों पर थोपना है। बस यही कमाल हमें भी करना है। हम चीनियों से सामान तो बहुत लेते हैं लेकिन अब वक्त आ गया है कि हम चीनियों जैसा कमाल भी करें।  मेड इन चाइना वस्तुओं को रंग मेड इन इंडिया वस्तुओं  के सामने फीका करें। हम ऐसा कर सकते हैं! चीनियों ने मेड इन इंडिया पायजामे में बड़ी चतुराई से मेड इन चाइना का नाड़ा डाला है! हमारी पेंट में अपनी जिप चिपका दी। हमारे बच्चों को अपने खिलौने दिलवा दिए। बड़ों की जेब में अपना बनाया फोन हमसे ही रखवा लिया। चीनियों ने ऐसा पुख्ता इंतज़ाम कैसे किए  हैं कि कोई बंदा ओवरस्मार्टनस दिखाते हुए किसी दूसरी कंपनी का मोबाइल ले भी ले तो उसे अपने फोन के लिए टैंपर्ड ग्लास, कैमरा लेंस प्रोटेक्टर और मोबाइल कवर चीनियों का ही लेना होगा। उस मोबाइल में चलने वाले ऐप चीनी होंगे।  उस मोबाइल से ऑनलाइन खरीदे जाने वाले ज्यादातर आइटम चीनी होंगे। मोबाइल धारक अक्सर उस फोन से बात या चैट करते हुए चीनियों को गरिया रहा होगा कि सालों ने हमारी सीमा पर फौज़ जमा कर रखी है वगैरा-वगैरा! यह कमाल हमें भी करना होगा। 

Need to find out how china made items are so common in India.


गजब यह भी है कि चीन सामानों की क्वालिटी चमगादड़ के सूप की तरह है जिसे केवल चीनी पसंद करते हैं। बावजूद इसके बाज़ार चीनी सामानों से अटे पड़े हैं! हमारे यहां भी चीनी सामानों की होली जलायी जाती है। सोशल मीडिया पर बाकायदा मेड-इन-चाइना वस्तुओं के ख़िलाफ़ अभियान चलते हैं।  भारतीय चीनी सामान न खरीदें इसके लिए जितना ज़ोर लगाया जाता उतने ज़ोर से आसमान में पत्थर फेंक कर उसमें सुराख़ किया जा सकता है। इतनी गालियों और दुत्कार से तो हरे-भरे पेड़ भी सूख जाएं जितनी चीनी सामानों को मिलती हैं। लेकिन इन चीनी सामानों से पीछा नहीं छूटता। हमारे घर के कोने-कोने में कुछ मिले न मिले लेकिन चीनी सामान मिल जाएँगे। चीनी अपने बनाए इंसानी अंजर-पंजर तक लेकर हमारे अस्पतालों के बाहर लाइन लगाकर खड़े हैं कि किसी मरीज़ को जरूरत हो ते ले ले। पहले कोरोना दिया। अब कोरोना वैक्सीन लेकर तैयार हैं। उनके पास सब है। अब तो हाल यह है कि  खरीदारी करते हुए भी दाम बाद में पूछते हैं पहले यह जानना पड़ता है कि फलां आइटम चीनी तो नहीं है! इतनी सावधानी पर भी चीनी सामानों की बिक्री पर ग्रहण नहीं लगता! चीनी इतना सब कैसे करते हैं इस पर भेजा फ्राई करना बनता है। यह कमाल हम भारतीयों को भी आना चाहिए। इसलिए सभी भारतीयों को इस चीनी चालाकी पर ज़रूर शोध करना चाहिए! अब चीनियों से सामान की बजाय सबक लिया जाए। उन्हें गालियां देने का मैं बुरा नहीं मानता। लेकिन अब वक्त आ गया है कि गालियों के साथ उन्हें मेड इन इंडिया सामान भी दिया जाए। उनकी गोली का स्वाद उन्हें भी चखाया जाए। जिस दिन ऐसा हो गया कसम से कलेजे को ठंडक मिल जाएगी!

Tuesday, November 24, 2020

जीती बाज़ी हारने की कला

जीती बाज़ी हारना हमें आता है..



एक राज्य के पूर्व सीएम पर जब अवैध रूप से जमीन कब्जाने के आरोपों के बारे सुना तो मन में कोई हैरानी न हुई। शायद इसलिए कि  इसमें हैरान करने जैसा कुछ था ही नहीं। मतलब कि अगर राजनेता या ताक़तवर लोग जमीन पर कब्जा नहीं करेंगे तो कौन करेगा। आम आदमी के पास तो इतनी भी हिम्मत नहीं कि वो अपनी जमीन बचा ले। अवैध कब्जा तो दूर की कोड़ी है। कभी-कभी दो वक़्त की रोटी बचाने में भी दम फूल जाता है। वहीं अगर ख़बर इससे उलट होती कि फलां राजनेता ने अपनी ज़मीन किसी ग़रीब को दान कर दी तो सुखद आश्चर्य जरूर होता।                                 

         आजकल सरकार हैरान हैं कि भारत में कोरोना के मामलों में फिर से इजाफा होने लगा है। हालांकि इसमें हैरान होने जैसी कोई बात नहीं है। हैरान तो इस बात पर होना चाहिए कि बाकी लोग अभी तक कोरोना से कैसे बचे हुए हैं? जबकि हम जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं कि कोरोना से जीतना तो दूर हम उससे हार जाएं और बुरी तरह हार जाएं। कोरोना को रोकने के लिए सरकार ने कुछ गाइडलाइनें बनाई गई थीं। हमने सरकार की उम्मीदों पर पानी फेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। तो फिर कोरोना मामले बढ़ने पर किस  बात की हैरानी। इसकी आशंका तो हर कोई जता रहा था। 

                                                                                                                                                                  अगर आप क्रिकेट के शौकीन हैं तो आपको ऐसे मैच ज़रूर याद होंगे जिनमें टीम इंडिया जीतने की कगार पहुंच कर  भी हार गई थी। ऐसा एक-दो बार ही हुआ है ऐसा भी नहीं है। जीत की दहलीज पर आते-आते  बहुत से मैच हारे गए हैं या कईं बार आसान मैच को भी मुश्किल बना दिया। लोगों को यह कहने पर मज़बूर होना पड़ता कि टीम इंडिया को तो जीता हुआ मैच हारने की या एक आसान मैच को भी मुश्किल बना देने की आदत बन गई है। हालांकि ऐसा भी नहीं था कि ऐसा जानबूझकर किया जाता था।  होता कुछ ऐसा था कि शुरुआत में सतर्कता से खेले और जीत के करीब पहुंच गए लेकिन जीत से कुछ कदम दूर थोड़े से लापरवाह हुए और या तो मैंच फंसा बैठे या  गवां बैठे। कहना यह है कि जीता हुआ मैच कैसे हारा जाता या एक आसान मैच को कैसे मुश्किल मैच बनाया जा सकता है वो टीम इंडिया को  बहुत अच्छे से आता है। 
                                                                                                                                                                                              कोरोना से हमारी जंग किसी क्रिकेट मैच से कम नहीं है। शुरुआत में हमने काफी सतर्कता बरती  लेकिन बाद में लापरवाही। नतीज़ा सामने है। एक जीती  हुई लड़ाई को हमने मुश्किल लड़ाई बनाकर ही दम लिया और यह सिद्ध कर दिया कि आसान मैच की तरह  आसान लड़ाई को भी मुश्किल बनाने की इस कला में हमें महारत हासिल है। खेलने का यह  हमारा अपना अंदाज़ है और हमारे इस चिर-परिचित अंदाज़ पर किसी को हैरान नहीं होना चाहिए। 


                                                         -वीरेंद्र सिंह 


 
 



Monday, March 25, 2019

दूसरों की चिंता करिए, अपनी जेब भरिए!

अपनी जेब भरने के लिए दूसरों की चिंता करनी ज़रूरी है



बचपन से सुनते आए हैं कि चिंता, चिता समान है! लेकिन किसी ने आज तक नहीं बताया कि दूसरों की चिंता करना तो किसी वरदान से कम नहीं है! दूसरों की चिंता में अपनी नींद खराब करने वालों की जेबें लालाजी के पेट की तरह फूली होती हैं और जिसकी जेब मोटी हो उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता! उदाहरण के लिए कोई भी पॉकेटमार अपनी चिंता कभी नहीं करता! उसे  केवल दूसरों के बटुओं की चिंता होती है! उसकी चिंता कमाल करती है! वो लोगों की पॉकेट उड़ा लेता है और संतोष की सांस लेता है! अपना मनपसंद भोजन करता है! चादर तानकर सोता है! सुबह अंगड़ाई लेते हुए उठता है। नाश्ता करता है और फिर से लोगों की पॉकेट की चिंता शुरू कर देता है! इस प्रकार लोगों की चिंता करते-करते वो बड़े आराम से दिन- महीने- साल गुजारता है! 


Trick of making money. Satire.



बहुत सारे लोग बड़े स्तर पर अपनी छोड़ दूसरों की चिंता करते हैं! कई-कई प्रकार से चिंता करते हैं! इसलिए इनकी  जेबें ही नहीं बल्कि बैंक बैलेंस भी मोटा होता है! साथ में चमचमाती गाड़ियों का जखीरा होता है! ये दूसरों को भी प्रेरित करते हैं कि हमारी तरह तुम भी लोगों की चिंता करो! जो बहुत अच्छे से लोगों की चिंता करते हैं उनको काम पर रखते हैं! इसके लिए बाकायदा मासिक वेतन देते हैं!अतिरिक्त सुविधाएं भी देते हैं! इस कैटेगरी में तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी आती हैं जो लोगों की चिंता करते-करते अरबों - खरबों का बिजनिस करने लगी हैं! 


अपने नेताओं की अपार सफलता के पीछे भी लोगों की चिंता यानी उनके कल्याण का विज्ञान छिपा है। नेता, बचपन से ही लोगों की चिंता करने लगते हैं! मां-बाप का पैसा बचाने के लिए वो पढ़ाई नहीं करते! दूसरों के माल पर मौज उड़ाना शुरू कर देते हैं ताकि मां-बाप की रही-सही चिंता भी खत्म हो जाए! युवा होते-होते वे आत्मनिर्भर हो जाते हैं! जो युवा नेता अत्यधिक होनहार होते हैं वे अतिरिक्त सुख-सुविधाएं भी जुटा लेते हैं! बड़े होने तक यह बात पूरी तरह समझ चुके होते हैं कि लोगों की चिंता करके ही अपने आपको चिंता मुक्त रखा जा सकता है! इसलिए मौक़ा मिलते ही लोगों की चिंता झपट लेते हैं! उसे अपना बना लेते हैं! मान लो कोई युवा नौकरी को लेकर चिंता में है तो युवा  नेता उससे कहेगा कि तुम नौकरी की चिंता कतई न करो। आज से तुम्हारी नौकरी की चिंता मेरी चिंता! तुम बस चार-पांच लाख रुपयों का जुगाड़ करो। बाकी सब मैं देख लूंगा। युवा तत्काल अपनी चिंता युवा नेता को सौंपकर चिंतामुक्त हो जाता है! हंसते-मुस्कराते चार-पांच लाख रुपये युवा नेता को सौंप देता है! दूसरों की चिंता के नाम पर युवा नेता ने चार-पांच लाख झटक लिए। केवल एक बेरोजगार युवा की चिंता को अपनाकर इतना कमा लेना कम नहीं है!

आगे जाकर युवा नेता चुनाव लड़ता है। वो लोगों को भरोसा देता है कि कैसे उसने दूसरों की चिंता को अपनी चिंता समझा है।बेरोजगारों को नौकरी दिलाई है! अगर वो जीता तो उसकी जीत में लोगों की जीत है! उसकी हार में लोगों की हार है! इसलिए मुझे जिताइए! अपनी चिंताएँ मुझे दान कर दीजिए! मैं आपकी चिंताएं दूर करुंगा! युवा नेता चीख-चीख कर जनता से कहता है कि वो अपनी चिंताएं उसके नाम कर दे! जनता तुरंत युवा नेता की बात मान लेती है। अपनी चिंताएं उसे अपर्ण कर देती हैं! उसे अपना बहुमूल्य वोट देकर अपना प्रतिनिधि चुनती है। युवा नेता जनता का युवा प्रतिनिधि बन जाता है। कुछ ही सालों में युवा प्रतिनिधि के साथ-साथ उसके परिजनों और रिश्तेदारों तक की जेबें और बैंक खाते इतने मोटे हो जाते हैं कि उनकी सात पुश्तों तक को कुछ भी करने की जरूरत नहीं पड़ती है! 

युवा नेता जब युवा नहीं रहता और थोड़ा अनुभवी हो जाता है तो वो अपनी क्षेत्र के साथ-साथ पूरे देश की चिंता करने लगता है! पूरे देश की चिंता को अपनी चिंता समझने लगता है। वो ऐसा तब तक करता जब तक कि वो पूरे देश का मंत्री बन नहीं जाता है! मंत्री बनते ही वो स्विस बैंक में खाता खोलता है। देश-विदेश में प्रोपर्टी बनाता है। इस प्रकार दूसरों की चिंता करते-करते वो नेता अपने सारे सपने पूरे करता जाता है।

तमाम युवा सारी जवानी एक सरकारी नौकरी की  तैयारी करते करते उम्रदराज और गंजे तक हो जाते हैं लेकिन नौकरी नहीं मिलती। जीवन यापन का सवाल खड़ा हो जाता है। थोड़ा चिंतन करने बाद तय करते हैं कि हमें भले ही  नौकरी न मिली हो लेकिन दूसरे युवाओं को बेकार नहीं रहने देंगे! युवाओं के भविष्य की चिंता करते हुए उन्हें कोचिंग देनी शुरू कर देते हैं और अपनी जीवन यापन का सवाल झटके में हल कर लेते हैं!  

इस चर्चा से यह शिक्षा मिलती है कि लोगों की चिंताओं को अपनी चिंता बनाओ। उन चिंताओं के समाधान के नाम पर आगे बढ़ो। इसके बाद फिर कभी पीछे मुड़कर देखने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। तमाम अरबपतियों-खबरपतियों की कार्यप्रणाली की रिसर्च करने के  बाद यही  निष्कर्ष निकलता है। बाबा रामदेव ने भी यही किया है। लोगों के स्वास्थ्य की चिंता करते-करते आज करोड़ों-अरबों का व्यापार करने लगे हैं। शुरू में बाबा ने अवश्य ही बड़े-बड़े हॉस्पिटलों की कमाई पर रिसर्च की होगी। बाबा अक्सर कहते भी हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने देश में लूट मचा रखी है। बाबा की बात माने या न माने यह आप पर है। सभी राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सफलता का राज यही है। सबने लोगों से कहा कि हमें आपकी हर प्रकार की जरूरत की चिंता है। आप बस दिन-रात पैसा कमाने पर ध्यान दें। अपनी चिंताएं हम पर फेंक दें। हम उनका न केवल ख्याल रखेंगे बल्कि सम्मान भी करेंगे! हिसाब लगा तो आपकी चिंताओं को सम्मानित भी करेंगे। इस प्रकार जिसने भी लोगों की चिंताओं का सम्मान किया, दुनिया ने उनका जबरदस्त (कभी-कभी जबरदस्ती) और भरपूर सम्मान किया है।

लोगों की चिंता कर- कर अपनी आने वाली पीढ़ियों तक की चिंता दूर करने की कथा अनंत है। सार यह है कि अगर अपनी चिंता करते रहे तो  बिना जले ही राख हो जाओगे। दूसरों की चिंता का ढोंग भी करोगे तो आप भी ऐश करोगे। फैसला कर लीजिए। 
       

Monday, March 18, 2019

रंग चढ़े जब फागुन का

Photo of Spring season
सांकेतिक चित्र 



फागुन में बौराने या फगियाने का भी अपना एक अलग ही आनंद है! फागुन यानी वसंत ऋतु का महीना।    फागुन में इंसान बिना विटामिन की गोली निगले भी युवा और तरोताज़ा महसूस करने लगते हैं। नित्य शाम-सवेरे शक्तिवर्द्धक चूर्ण का सेवन किए बिना ही घोड़े जैसी फुर्ती से दौड़ने लगते हैं, उछल-उछल कर चलते हैं! बिना क्रीम पाउडर लपेटे ही चेहरा धूप में रखे स्टील के बर्तनों की तरह चमचमाता है! यह फागुन का असर है कि अल्पकाल के लिए गंजों को भी बालों की कमी नहीं खलती! लड़कियां अपनी सहेलियों की सुंदरता से नहीं जलती! कौवे जैसे बेसुरे  प्राणी भी कोयल जैसा मीठा बोलने लगते हैं! बूढ़ों पर फागुन का अच्छा-सच्चा-कच्चा-पक्का असर होता है! बूढ़ों पर जवानी छाने की सबसे अधिक दुर्घटनाएं फागुन में ही होती हैं! नौजवान भी मौक़ा मिलते ही चौका मारने की ताक में रहते हैं! जहां तक कवियों की बात है तो इस प्रजाति के जीव शृंगार रस की कविताओं का सृजन कर अपने-अपने मनोभाव प्रकट करते हैं!

फागुन का प्रभाव ऑफिसों में न हो ये हो नहीं सकता! वहां का वातावरण भी हल्का-फुल्का हो जाता है। बॉस और उसके मातहतों के बीच संवाद में प्रेम रस उत्पन्न होने लगता है। कड़वाहट, सर्दी की तरह कम होने लगती है। प्रमोशन के अवसर ऐसे ही बढ़ने लगते हैं जैसे धीरे-धीरे दिन बढ़ रहा होता है। 

फागुन में उमंग और उत्साह का राज होता है। यह माह प्रेमियों के लिए भी बहुत अनुकूल होता है। प्रेम स्वीकृति की संभावना भी अधिक होती है! नये-नये पत्तों से सजे पेड़-पौधे नयनों को भाते हैं। रंग-रंग के फूल हृदय लुभाते हैं! प्रेम करने या प्रदर्शित करने के लिए इससे बढ़िया मौसम और कोई नहीं हो सकता! फागुन में प्रकृति का हर रूप शृंगार रस के लिए उद्दीपन का कार्य करता है।

फागुन में  होली आती है। होली में चमत्कार होता है! दुश्मन भी दोस्त बनकर गले लग जाता है! उम्र भले ही पचपन की हो दिल बचपन का हो जाता है। बूढ़ों के मन में  तरंग उठती है! उमंग पैदा होती है। होली में अबीर होता है, रंग होता है! गीत-संगीत होता है। जमकर धमाल और हुड़दंग होता है। रंग-बिरंगे चेहरे देखकर हर कोई दंग होता है! स्वादिष्ट पकवान होते हैं। पकवानों की नानी गुझिया होती है और खाने की भी मनाही नहीं होती। 

होली के साथ ही फागुन की विदाई हो जाती है और बस याद रह जाती है। जल्द ही गर्मी दस्तक देने लगती है! अब वंसत को भी बोरिया विस्तर बांधना पड़ता है! जीवन के एक और वसंत के खर्च हो जाने का पता तक नहीं चलता! प्रकृति का यही नियम है! मौसम के बाद मौसम आता है, जाता है और देखते ही देखते चला जाता है।  


                                                                                                              -वीरेंद्र सिंह
  

Sunday, December 4, 2016

संसद में बज रहे ढोल की पोल

 संसद के शीतकालीन सत्र में गतिरोध जारी है। 13 दिन गुजर गए लेकिन काम-धंधा शुरू होने की कोई ख़ुशखबरी अभी तक नहीं मिली है। मलाल तो हो रहा होगा लेकिन कोई बात नहीं! संसद के सत्र तो आगे भी आते रहेंगे। काम-धाम की तब देखी जाएगी। इसलिए हैरान-परेशान होने की जरूरत नही है! बस नज़रिया बदलने की जरूरत है! संसद में हो रहे हंगामे को हंगामा कतई नहीं समझा जाना चाहिए! इसे ढोल बजाना कहते हैं! 

ये ढोल विपक्ष बजा रहा है! इस ढोल की आवाज सनिए! ये ढोल इसलिए बजाया जाता है ताकि जनता जान सके कि अगर बैंक के सामने खड़े-खड़े जनता परेशान है तो संसद में उनके नेता भी कोई चैन से नहीं बैठे हैं। हंगामा, नारेबाज़ी, धरना प्रदर्शन इत्यादि-इत्यादि कितना कुछ करना पड़ता है। अपने कुछ बंदों को नियमित रूप से टीवी पर भेजना पड़ता है ताकि जनता को बताया जा सके कि ढोल उन्होंने ही बजाया था। ताकि जाना जा सके कि ढोल की आवाज जनता ने सुनी कि नहीं सुनी!  ये समझाया जा सके कि ढोल बजाना कितना जरूरी था। ढोल बजाने में किन-किन दलों और नेताओं ने साथ दिया! जो नेता सहयोग करने की बजाए कानों में उंगली डाल कर सत्ता पक्ष की साइड हो लिए उनको लताड़ना पड़ता है!

जनता को समझाना होता है कि आपको और हमें यानि प्रतिपक्ष को परेशान करने वाला दुश्मन एक ही है। लिहाजा आप हमारे साथ आ जाये। जिसने हमें परेशान किया है उसे सबक सिखाने के लिए जनता का हमारे साथ आना बहुत जरूरी है! मतलब अब गेंद जनता यानि आपके पाले में है। अब आप सोच रहे होंगे कि आप गेंद का क्या करेंगे! जिस गेंद का इस्तेमाल काफी बाद में होना हो उस गेंद की अभी क्या जरूरत!  आपकी बात में दम है लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है। मैं फिर कहूंगा कि आप नज़रिया बदलो। ढोल बजाने वाले नेताओं की योग्यता और क्षमता पर भरोसा  बनाए रखो। अपनी परेशानियां उनके हवाले कर दो। वे आपकी परेशानियों का सही इस्तेमाल करेंगे! आपकी परेशानियों को सीढ़ी बनाकर टॉप पर पहुंचेंगे! आपकी परेशानियों का इससे अच्छा उपयोग नहीं हो सकता है!

आप इसे इस तरह भी समझ सकते कि संसद भले ही नहीं चल रही हो लेकिन बाकी तो सब चल रहा है! और जो चल रहा है वो भी कम अभूतपूर्व नहीं है! इसे समझना पड़ेगा! जरा सोचिए! संसद चलने से देश का भला हो जाता और सत्ता पक्ष की धाक जम जाती! लेकिन प्रतिपक्ष को सांत्वना पुरस्कार के अलावा कुछ हासिल नहीं होता! अब भला इस बात को कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है! जब संसद चलने के लिए पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों ही बराबर के जिम्मेदार होते हैं तो फायदा भी तो दोनों को बराबर ही होना चाहिए न! मतलब महज संसद चलने से ही तो काम नहीं चलने वाला है न। इसलिए संसद चलने से जरूरी है सबकी राजनीति चले। लिहाजा राजनीति चल रही है। राहुल गांधी भी चल निकले हैं! राहुल का चलना कितना जरूरी था ये आप कांग्रेस से पूछ सकते हैं! वैसे क्या वाकई पूछने की जरूरत है?  


    





Monday, April 13, 2015

भगवान कढ़ी चावल की बरसात कर दे

फरवरी-मार्च और अपैल  में आमतौर पर बारिश ऐसे होती है जैसे चुनाव जीतने पर कभी-कभार नेता जी जनता के बीच याद दिलाने आ जाते हैं कि भूल मत जाना, अगले चुनावों में भी मुझे ही जिताना। लेकिन इस बार तो पीएम मोदी जी की हर महीने होने वाली मन की बात की तर्ज पर पिछले दो महीनों से हर वीकेंड पर बरसात शुरु हो जाती है। अब बेमौसम इतनी बारिश होगी तो साइड इफैक्ट होना लाज़मी है। किसानों की फसलें बर्बाद हो गई। आलू खेत में ही गल गए। कुछ किसानों ने तो दुखी होकर अपने आप ही अपना तबादला परलोक में कर लिया है। वैसे भी उनके लिए इस लोक में रखा ही क्या था? घर में खाने के लाले पड़ रहे हो तो हर जिम्मेदारी ऐसा बोझ लगती है जिसे ढोना ऐवरेस्ट पर्वत पर चढ़ने से भी ज्यादा मुश्किल होता है। हालांकि सरकार मदद का दिलासा दे रही है  लेकिन मरने वाले किसानों को पूरा भरोसा था कि रेगिस्तान में पानी मिल सकता है, कुछ एक गरीबों के घर में भी भूखे को पेट भर  खाना मिल सकता है लेकिन सरकार से उन्हें खोखले आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिल सकता और अगर मिला भी तो तब तक तो वैसे ही प्राण पखेरू उड़ जाएंगेऐसे में दो ही रास्ते बचते थे। पहला खुद ही स्वर्ग (पक्का नहीं कहा जा सकता)  सिधारने का और दूसरा सरकारी मदद के आश्वसनों के सहारे जिंदा रहने की कोशिश करना। बदनसीब किसानों ने दुनिया छोड़ना बेहतर समझा।


केंद्र और राज्य सरकारें किसानों की हरसंभव मदद का ऐसे दावा कर रही हैं जैसे कांग्रेस राहुल के बारे में घोषणा करती है कि वो ज़ोरदार वापसी करेंगे, दिल्ली के सीएम केजरीवाल ताल ठोकते हैं कि वो अगले पांच सालों में दिल्ली को विश्व के सबसे कम भ्रष्ट शहरों की सूची में टॉप के पांच शहरों में ला खड़ा करेंगे! बीजेपी जाहिर करती है कि पार्टी आडवाणी जी से समय-समय पर मार्गदर्शन प्राप्त करेगी! हालांकि सच्चाई सब जानते हैं। आज तक सरकारी मदद ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित होती आई है। किसानों पर मौसम की बैक टू बैक मार पड़ी है क्योंकि पिछले साल मॉनसून पर अननीनो प्रभाव ऐसे ही हुआ था जैसे बीते लोकसभा चुनाव में मतदाताओं पर कांग्रेस सरकार में हुए घोटालों का प्रभाव हो गया था। अलनीनो के चलते बारिश बेहद कम हुई थी जिस वजह से धान की फसल प्रभावित हुई थी जबकि इस बार बेमौसम और अत्यधिक बारिश की चलते गेहूं की फसल बर्बाद हो गई है। मौसम की दोहरी मार से अन्नदाता के सामने भूखो मरने की नौबत आ गई है। असर दिख भी रहा है कई किसान दम तोड़ चुके हैं। बचे हुए किसानों में अधिकांश को अभी तक कोई सहायता प्राप्त नहीं हुई है। कुछ समझदार किसानों का मानना है कि सरकारी राहत पहुंचने की संभावना उतनी ही है जितनी विदेशों में जमा काला धन के भारत आने की है। इसलिए सरकार से मदद की आस लगाए किसान भाईयों को अपन का सुझाव है कि वो सरकार की बजाए सीधे भगवान से गुहार लगाए और मांगे कि हे भगवान! कुछ नहीं चाहिए! बस खाने के लिए तैयार (Ready to eat) कढ़ी-चावल की बारिश कर दे! बहुत बारिश हो गई। बहुत ओले पड़ गए। अब तैयार राजमा-चावल डाल दे! जिन लोगों को ये आइडिया क्रेजी लगता हो तो भैया वही लोग इस बेमौसम की ओलो वाली बारिश के सभी पीड़ित किसानों को, बिना किसी भेदभाव के तत्काल (क्योंकि पहले ही बहुत देर हो चुकी है) सरकार से कुछ खाने का सामान और थोड़े  से रुपये दिला दे। भगवान आपका भला करेगा।



Monday, April 6, 2015

भैंसों के आंदोलन की अनोखी रणनीति

सारे देश की भैंसे आजकल टेंशन में हैं! महाराष्ट्र सरकार ने जहां गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है तो वहीं हरियाणा सरकार ने भी गोवंश संरक्षण और गो संवर्धन बिल पास कर दिया है। कम से कम इन राज्यों में ये फैसले गोवंश के लिए जीवनदान से कम नहीं है। लेकिन भैंसों के क़त्ल पर ये सरकारें मनमोहन सिंह की मुद्रा में हैं! बस इसी बात को लेकर भैंसें नाराज भी हैं और चिंतित भी! ऐसे में देशभर की भैंसों के टॉप लीड्रान ने अपने साथ हुए इस भेदभाव का पुरज़ोर विरोध करने के लिए घनघोर किस्म का आंदोलन छेड़ने का ऐलान किया है!

क्रोधित भैंस!

 भैंसों  के टॉप लीड्रान ने ऑर्डर पास किया है कि देशभर की सभी भैंसे तत्काल दिल्ली प्रस्थान करें! लेकिन ये तो बीजेपी की राज्यों की सरकारों का मामला है? मामला है लेकिन इस दल के बड़े नेता तो दिल्ली में रहते हैं। उनको भी तो इनकी गलती का अहसास कराना है! फिर दिल्ली में मीडिया कवरेज ज्यादा मिलेगी!  साथ ही दिल्ली की जनता को पते चले कि जो दूध वो पीते हैं उनमें हमारा दूध भी शामिल हैं।  जब हम ज़िंदा ही नहीं रहेंगी तो किसका दूध पियोगे? हां, हरियाणा और महाराष्ट्र की भैंसे अपने लोकल लीड्रान के साथ क्रमश मुंबई और जयपुर में सड़क- तोड़, भैंसा दोड़, उछल कूद और केवल बीजेपी समर्थकों को सींग मार-मार कर घनघोर प्रदर्शन करेंगी! इस दौरान वो घास नहीं खाएंगी बल्कि दुकानों में से उनके मालिकों को मार भगा कर जो कुछ भी खाने को मिलेगा वही खाएंगी! सब्जी मंडियों में भी फुल मौज मस्ती की जा सकती है!

वहीं राष्ट्रीय स्तर के भैंस नेता युवा भैंसों के साथ मिलकर दिल्ली में उधम मचाएंगे!  इस क्रम में वो सारी मर्यादाओं को ताक पर रखेंगे! ऐसा करना लाजमी है क्योंकि  जीवन- मरण का सवाल है! जब दो राज्यों की गायों के मारने पर प्रतिबंध है तो इन राज्यों की भैंसों को भी वही अधिकार दो! भैंसों के साथ भेदभाव कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा! भैंसे किसी भी रास्ते से आ सकती हैं! दिल्ली में जिस स्थान पर भी 800-900 भैंसे एक साथ हो जाएँ तो वहीं रास्तों में पसर जाएं! लेकिन गोबर पार्कों में ही करेंगी! भैंसों के छोटे-छोटे- बच्चों को सड़क से लेकर गाड़ियों तक कहीं भी गोबर/पॉटी( भैंसों के छोटे कटरे-कटिया शुरु में पॉटी करते हैं) करने की छूट होगी! युवा भैंसों को  उछल कूद करते हुए थोड़ी -बहुत हिंसा कर  अपनी प्रतिभा दिखाने का पूरा मौक़ा है। कोई मंत्री-संत्री आता दिखे तो उसको सींग मारकर घायल करना होगा! कोई पुलिस वाला लाठी-डंडों से डराएं तो सारी भैंसे एक साथ होकर उन्हें ऐसे खदेड़ कर आएंगी कि वो सीधा अपने ऑफिस जाकर इस्तीफा दे दे या कम से कम अगले एक साल की छुट्टी ही ले ले! भैंसों के प्रतिनिधि नेता सत्ता पक्ष यानि बीजेपी नेताओं को जमकर कोसेंगे। कुछ भैंस नेता अरविंद केजरीवाल के पास जाएंगे और उनसे गुहार लगाएंगे कि आप हमारे लिए अनशन करें जिसके बदले में आपके और आपके समर्थकों के घरों में सुबह-शाम बढ़िया नस्ल की भैंसे दूध देने जाएंगी!  अगर केजरी चाहें तो योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के घरों में भैंसों के नवजात बच्चे पॉटी करने के लिए भेजे जाएंगे! इसके बाद सबसे अच्छी नस्ल की भैंसे सोनिया जी के दरबार में जाकर राहुल भैया के लिए अपने-आप ही दूध देना शुरु कर देंगी! थोड़ी उम्रदराज और विद्धान भैंसे कुछ दूध देने वाली भैंसों के साथ अन्ना हजारे के पास आंदोलन के लिए नैतिक समर्थन मांगने जाएंगे।केजरीवाल कैसे सियासत का रसगुल्ला बने थे, को ध्यान में रखते हुए चालाक युवा भैंसों ने सुझाव दिया है कि अन्ना हजारे को ही आंदोलन का अगुवा बना दिया जाए। वहीं  कुछ भैंसे दूसरे विपक्षी नेताओं के घरों में दूध के लिए जाएंगी! बदले में उनसे अपने आंदोलन को समर्थन के साथ ही गैर बीजेपी राज्यों में भैंसों की हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग करते हुए क़ानून लाने की मांग करेंगी! समर्थन न मिलने पर राहुल सहित सबको दूध बंद। सभी भैंसों ने एक स्वर में लालू यादव से किसी भी प्रकार का समर्थन नहीं लेने का फैसला भी किया  है।

हालांकि आज़म ख़ान की भैंसों ने इस तरह के आंदोलन में भागीदारी करने से साफ मना कर दिया क्योंकि उन बावलियों को लगता है कि किसी में इतनी हिम्मत ही नहीं कि कोई उनकी तरफ आंख उठाकर भी देखे यानि वो पूर्ण रूप से सुरक्षित होने का मुगालता पाले हैं! वहीं चलने-फिरने से भी मजबूर और बीमार भैंसे भी मुंबई, जयपुर या दिल्ली नहीं देख पाएंगी जिसका उन्हें खासा मलाल है!

Thursday, March 12, 2015

झूठ बोलने पर कौआ नहीं काटता

झूठ बोले कौआ काटे! हम सभी ने सुना है। ऐसा इसलिए कहा जाता है कि ताकि लोग झूठ बोलने से बचें और सदा सत्य बोलें। और अगर झूठ बोला तो काला कौआ काट लेगा! क्या वाकई कौआ काटता है? अपने आपको  सफल  मानने वाले और अरबपति (जिनमें नेता, व्यापारी भी शामिल)  अगर इस  झूठ बोले कौआ काटे वाली बात पर विश्वास करते  तो क्या वो अरबपति बन जाते! मेरा मतलब ये है कि अगर वो झूठ बोलने से डरे होते तो क्या वो उस मुकाम को छू पाते जिस मुकाम पर वो आज हैं!

बचपन से ही हमें सच बोलने की सीख दी जाती है। झूठ बोलना पाप है, सदा सच बोलो जैसे उपदेश रोज़ सुनाए जाते रहे हैं। माता-पिता और हमारे गुरुजनों का हमेशा से ये मानना रहा है कि एक अच्छे इंसान की पहचान ही यही है कि वो सदा सच बोलता है। ये सीख आज भी उसी तरह दी जा रही है बिना इस बात की परवाह किए कि आज ज़माना कितना बदल गया है। आधुनिक समय में सफलता के लिए झूठ  बोलना कितना ज़रुरी हो गया है! बच्चे इस ‘अनावश्यक ज्ञान’ पर बड़ों से सवाल-ज़वाब नहीं करते अन्यथा पलटकर एक बार ज़रूरपूछते कि क्या आप हमेशा ही सच बोलते हैं? अभी तक आप बिना झूठ  बोले ही इतने आराम से गुज़र-बसर कर रहे हो? बड़े आए सच बोलने की सीख देने वाले! सच्चाई ये है कि जो जितना बड़ा झूठा होता है, ज़िदंगी में आगे बढ़ने और शान से जीने के उसके अवसर उतने ही ज़्यादा होते हैं!

अब देखिए न, नेता लोग अगर सच बोल दें कि हमने इतना माल डकार लिया! हमारे इतने करोड़रुपये स्विस बैंकों में जमा हैं! हमने वास्तव इतने अपराध किए हैं!  हत्या की है! बलात्कार किए हैं! लोगों को लूटा है, उन्हें धोखा दिया। वादे करके कभी पूरे नहीं किए हैं।लोगों को आपस में लड़वाते हैं!  हम राजनीति में सेवा करने नहीं बल्कि मेवा खाने के लिए आना चाहते हैं!  मंत्री और उनके संतरी ये सच बोल दें कि हम अव्वल नंबर के शातिर चोर हैं। हमने पता भी नहीं चलने दिया और ऑफिस का ऐसा सामान जो आसानी से अपने घर आ सकता था उसे अपने घर लाकर पटक दिया है! हमारी वजह से देश को इतना नुकसान हुआ है! हमने देश सेवा की बजाए जमकर सियासत की है। विरोधियों को ठिकाने लगाना और अपनो का काम कराना ही हमारी दिनचर्या रही है तो क्या होगा?  होगा क्या? आधे से ज़्यादा नेता, मंत्री-संतरी जेल में चक्की पीस रहे होंगे!  नेताओं का एक तरह से अकाल पड़ जाएगा! उतने नेता बाहर नहीं होंगे जितने ज़ेल में चक्की पीस रहे होंगे!  हमारे ऑफिस जाने वाले भाई -बंधु अच्छे से जानते हैं कि कभी- कभी झूठबोलना कितने काम आता है! ऑफिस के सीनियर लोगों का बस चले तो अपने से जूनियर और चपरासी को कभी छुट्टी लेने ही न दें। भला हो झूठ  बोलने के गुण का, जरूरत पड़ने पर क्या जूनियर, क्या चपरासी कोई न कोई झूठ बोलकर छुट्टी ले ही लेते हैं। 

आप अपने आस-पास ही नज़र उठा कर देख लो। ज़रूरत के वक्त आप सब को भी कैसे झूठ बोलना पड़ता है। जीवन के हर क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को किसी न किसी रूप में झूठ बोलना ही पड़ता है।  दूसरी तरफ अगर आपने सच बोलना जारी रखा तो भयानक मुसीबतें काले साए की तरह आपके पीछे पड़ जाएंगी! आपके अपने ही आपको छोड़कर चले जाएंगे! क्षण भर में ही अपने, पराए हो जाएंगे। लोग आपको पागल हटा हुआ, खिसकी हुई बुद्धि का, और न जाने क्या-क्या कहेंगे! ऐसे समय कोई आपका साथ दे न दे, दुर्भाग्य जरूर देगा!  हालत ऐसी हो जाएगी कि भगवान भी आपका भला नहीं कर सकता! न घर के रहेंगे न घाट के!

सबक ये  है कि भैया आधुनिक सभ्य समाज में अगर शान से आगे बढ़ना है, रुतबे के साथ जीना है तो आज से ही झूठ को कोसना बंद करें! साथ ही ढंग से झूठ बोलने के तौर-तरीकों को सीखें! अपने आप भी सीखें और दूसरों को भी प्रेरित करें! हो सके तो अनुसंधान करें! उचित तरीके से झूठ बोलने के शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था करें! अपने बच्चों को सच बोलने के घातक परिणामों से अवगत कराने के साथ-साथ ही जीवन में आगे बढ़ने में झूठ बोलने का क्या महत्व है ये भी अवश्य बताएं! बताना क्या है जी, ख़ुद प्रैक्टिकल कर के दिखाएं! नया ज़माना है!‘ख़ुद ही सीख जाएगा’ वाली धारणा को छोड़ दें! झूठ बोलने से कौआ नहीं काटता! कहीं ऐसा न हो कि जबतक बच्चे को झूठ की महिमा का ज्ञान हो तब तक बहुत देर हो जाए!  

Saturday, January 15, 2011

ख़बरों की मुरम्मत!

१- शिकारी की गोली से घायल एक लोमड़ी ने अपने आप को बचाते हुए शिकारी की बंदूक से शिकारी पर ही फ़ायर कर दिया! -एक ख़बर!
    -भई वाह! लोमड़ी हो तो ऐसी!

२- कक्षा ५  के  बच्चे  कक्षा २ की किताब  नहीं  पढ़  पाते  -एक ख़बर!
     - ये तो कुछ भी नहीं ज़नाब ....देश में  अधिकांश अध्यापक,  स्नातक और परास्नातक हिंदी / अंग्रेज़ी में प्रार्थनापत्र / एप्लीकेशन  तक  नहीं लिख पाते!

३- बढ़ती महँगाई पर फ़िर बुलाई बैठक -एक ख़बर!
                      -बैठक पर बैठक और जाँच पर जाँच!  इसके अलावा ये कर भी क्या सकते हैं!

४- बढ़ती "महँगाई" ने बाज़ार को डराया.- एक ख़बर!
                    -जब प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री तक की नींद उडी हुई है! तो फ़िर ये 'बाज़ार' किस खेत की मूली है!

५- अगले महीने रु.५ प्रति किलोग्राम से मिलेगी प्याज़ -एक ख़बर!
                -दिल बहलाने के लिए ग़ालिब ख्याल अच्छा है!

 ६- एक  'आर0 टी0 आई0  कार्यकर्त्ता'  ने राष्ट्रपति  की  "रसोई  के ख़र्च" के संबंध में जानकारी चाही है  -एक ख़बर!    
              - बेचारा! महामहिम पर भी महँगाई का असर देखना चाहता  है!


७- सचिन  और  रोहित  शर्मा  करें  पारी  की शुरुआत  -रवि  शास्त्री! 
   सचिन  और  विराट  कोहली  करें  पारी  की शुरुआत  -सौरव  गाँगुली!
                                               -सर जी! आप दोनो तो घणा भ्रम पैदा कर रहे हो!


८- मुलायम के लिए खरीदें थे विधायक-  अमर सिंह!
             -आख़िर मान ही लिया कि आप ने दलाली की है. वैसे ये तो सबको पहले ही पता था! 


९- दो साल पहले  ही जानकारी मिल जाने  के बाद भी सरकार विदेशों में जमा "काले धन" के मालिकों के  नाम क्यों नहीं बता रही है -सुप्रीम कोर्ट.   
         -पोल नहीं खुल जायेगी क्या? उनमे सबसे ज़्यादा तो सत्ताधारी दल  से ही होंगे !                  

10- "राहुल गांधी " की सुरक्षा में सेंध पर 'केंद्र'  ने  माँगा जवाब -एक ख़बर!
                 - "राहुल" की सुरक्षा की चिंता सही! लेकिन कभी "आम आदमी की सुरक्षा" की चिंता भी कर लिया करो!

११- अरुणाचल  के अफ़सरों को वीज़ा  नहीं देगा चीन- एक ख़बर!
      -इसीलिए तो कहते हैं कि कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं हो सकती!
                                           

Friday, January 7, 2011

'झूठ' के बिना तो भैया काम ना चले!

          बचपन से ही हमें सच बोलने की सीख दी जाती है। झूठ बोलना पाप है, जैसी बातें नित्य सुनाई जाती हैं।  सदा सत्य बोलें क्योंकि सच बोलने से ही आप एक अच्छे इंसान बन सकते हैं। यह रिवाज़ आज भी उसी तरह जारी है। बिना इस बात की परवाह किए कि आज ज़माना कितना  बदल गया है और आधुनिक जीवन में सफलता के लिए झूठ बोलना कितना ज़रूरी है! चूँकि इस मुद्दे पर बच्चें अपने बड़ों से ज़्यादा  सवाल जवाब नहीं करते वरना पलटकर एक बार यह ज़रूर पूछते कि क्या आपने कभी झूठ नहीं बोला?    क्या आप बिना झूठ बोले ही इतने आराम से ज़िन्दगी बसर कर रहें हैं?  बड़े आए सच बोलने  की सीख देने वाले!  मज़े की बात तो यह है कि घर के सभी सदस्य भी  इस बात से भली प्रकार परिचित होते हैं  कि झूठ बोले बगैर सामान्य ज़िन्दगी जीना कितना मुश्किल है! 


ज़रा ग़ौर फ़रमाए.... अगर सत्ता में बैठे नेता और बड़े-बड़े अफ़सर सच बोल दें  कि हमने इतना माल डकार लिया!   हमारा इतना माल  स्विट्ज़रलैंड  के बैंकों में जमा है, चूँकि हम अव्वल नंबर के शातिर  चोर  हैं  इसीलिए  दफ़्तर का बहुत सा सामान ( जिसे ले जाने  में कोई बहुत बड़ी दिक्कत न हो, भले ही सामान काम आए या न आए)  अब हमारे घर की शोभा बन गया  है!  हमने इतनी मासूम लड़कियों से  बलात्कार किया है! इतने लोगों को ठगा  है! हमारे कारण देश का इतना नुक़सान हुआ है!  हम राजनीति और नौकरी में देश की सेवा के लिए नहीं बल्कि मेवा खाने तथा सत्ता और कुर्सी  की  अपनी भूख के कारण आए हैं! इसीलिए हम वोट पाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं! वगैरह-वगैरह .....तो क्या होगा?  होगा क्या!  ऐसा नेता और अफ़सर जेल  में  चक्की पीस रहे होंगे! बहुत से मंत्री-संत्री भी वहीं होंगे.......यह भी हो सकता है कि जेलों में  नेताओं की संख्या दूसरे अपराधियों से  ज़्यादा हो जाए!  जेल के बाहर नेताओं  का अकाल हो जाएगा तो फ़िर देश कौन चलाएगा क्योंकि मुठ्ठीभर ईमानदार लोग(इससे ज़्यादा होंगे भी नहीं)  राजनीति को दूर से ही नमस्कार करते हैं। बेहतर यही होगा कि नेताओं और अफ़सरों को यहीं छोड़ते हैं।          
     

चलिए हम अपने आप  को ही परखते हैं .....क्या बिना झूठ के बगैर रहना इतना आसान है?  क्या ज़रुरत के वक़्त हम भी झूठ पर झूठ नहीं बोलते हैं?  बोलते हैं...लगभग सभी बोलते हैं साब! और जिस दिन सच बोलना शुरू कर दिया तो  भयानक मुसीबतें  काले साए की तरह पीछे पड़ जाएंगी! आपके दोस्त आपको छोड़कर चले जाएँगे! , क्षणभर में ही अपने, पराए हो जाएँगे! ऐसी अवस्था में आपका कोई साथ दे न दे, दुर्भाग्य  ज़रूर देगा! लोग आपको पागल, हटा हुआ, खिसकी हुई बुद्धि  का,  और न जाने क्या-क्या  समझेगें! भगवान भी आप का भला नहीं कर सकता! समझे ज़नाब! 
       

इसीलिए अगर आप सभ्य समाज का हिस्सा बनकर इज्ज़त से जीना  चाहते हैं तो आज से ही यानी कि नए साल में झूठ को कोसना बंद कीजिए और झूठ बोलने के तौर-तरीकों पर ख़ासा अनुसंधान कीजिए! झूठ बोलने के उचित शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था पर ज़ोर दीजिए! अपने बच्चों को सच बोलने के घातक खतरों के बारे में  बताने के साथ-2 झूठ बोलने का महत्त्व भी ज़रूर बताएँ!  बल्कि मैं तो ये कहूँगा कि  वाकायदा प्रैक्टिकल करके दिखाएँ.  'ख़ुद ही झूठ बोलना  सीख जाएगा' वाली धारणा को छोड़ दीजिए क्योंकि नया ज़माना है कहीं बहुत देर न हो जाए और आपका बच्चा पीछे रह जाए!  यक़ीन मानिए ऐसा करके आप उनको भविष्य में आने वाली  तमाम मुश्किलों से बचा देगें! मैंने अधिकांश लोगों को झूठ की सहायता से अपनी नैया पार लगाते हुए देखा है! बाकी तो आप सब जानते ही हैं! ग़र फ़िर भी कोई शक़ या दुविधा हो तो टिप्पड़ी करके ज़रूर बताएँ क्योंकि आप इस विषय पर क्या सोचते हैं ज़ाहिर है मैं भी ज़रूर जानना चाहूँगा!   

                                                                       वीरेंद्र सिंह