Tuesday, March 9, 2021

वो दिन अब ना रहे

 वक्त बड़ा बलवान है। वक्त के हिसाब से रहने में ही भलाई है। वो दिन और थे जब आप मुसीबत में फँसे हों तो लोग मदद को आगे आ जाया करते थे। मगर वो दिन अब ना रहे! अब लोग मदद के लिए ना आते बल्कि  फोटो लेने और वीडियो बनाने के लिए आते  हैं। ये ज्ञान मुझे मेरे एक पड़ोसी ने एक लौटा हल्दी वाले दूध  के  बदले में दिया  था। मेरे इस पड़ोसी  से शनि, राहू और केतू एक साथ नाराज हो गए थे! जिसके चलते उनकी पत्नी के मन में ये बात अच्छी तरह बैठ गई थी कि उनके पति का चक्कर किसी पराई स्त्री के साथ चल रहा है। इसलिए उनकी पत्नी ने कसम खाई थी कि जब तक उस पराई स्त्री का भूत अपने पति के सिर से नहीं उतारेगी तब तक  कुछ और नहीं खाएगी!


 
इसके लिए पड़ोसी की पत्नी ने पूरी तैयारी कर ली। जैसे ही शाम को मेरा पड़ोसी अपने घर आया तो पाँच मिनट बाद ही उसकी चीखें सुनकर पूरा मोहल्ला उसके घर इकट्ठा हो गया। लोगों ने देखा कि पड़ोसी की पत्नी अपने पति के सिर से पराई स्त्री का भूत उतारने के लिए ज़बरदस्त एक्शन मोड में थी! मोहल्ले वालों को देखकर पड़ोसी को लगा कि अब वो बच जाएगा! लेकिन ये क्या?  सभी ने अपने-अपने मोबाइल फोनों से उसकी पिटाई का वीडियो बनाना शुरु कर दिया। कुछ बुजुर्ग महिला-पुरुषों ने पड़ोसी की पत्नी से जानना भी चाहा कि आखिर माजरा क्या है ? वो क्यों अपने पति को इतनी बूरी तरह कूट रही है?  


वीडियो बनाने वालों को उनका इस तरह पूछताछ करना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। सभी ने एक स्वर में उन्हें चुप रहने की सख्त हिदायत दी। साथ ही पड़ोसी की पत्नी से विनती की कि आपने जो पीछे से लात मार कर अपने पति को हवा में उछाला था  उसे एक बार फिर से दोहरा दीजिए! आपका वो एक्शन ठीक से रिकॉर्ड नहीं हो पाया था! एक दूसरे व्यक्ति ने लगभग चिल्लाते हुए कहा, " भाबीजी वंस मोर! बहुत बढ़िया एक्शन दिखाया है आपने!  मैं तो अभी-अभी आया हूँ! केवल चंद सेकेंड का ही वीडियो रिकॉर्ड कर पाया हूँ! अब तक जो कुछ हुआ है अगर आप उसे एक बार फिर से दोहरा दें तो बड़ी मेहरबानी हो जाएगी! कुछ लोगों ने बढ़िया एक्शन दिखाने के लिए उसकी तारीफ भी की। लेकिन पड़ोसी को  बचाने का तनिक सा प्रयास भी किसी ने नहीं किया!


पड़ोसी की पत्नी को सिर्फ अपने पति के सिर से पराई स्त्री के भूत को उतारने की चिंता थी इसलिए उसने अपनी तरफ से कोई कोर-कसर बाकी न रख छोड़ी! लेकिन जैसे ही वीडियो बनाने वालों के इरादों का ख्याल आया तो शेरनी की तरह दहाड़कर उन पर लपकी। पलभर में सारे लोग नौ-दो ग्यारह हो गए! मेरे पड़ोसी फिर अकेले पड़ गए और एक बार फिर से पत्नी के हत्थे चढ़ गए। बेचारे तब तक ठुकते-पिटते रहे जब तक कि बेहोश नहीं हो गए। होश आने पर सीधे मेरे पास आए। उनके हालत देखकर मैं समझ गया  था कि पड़ोसी अत्यिधक पीड़ा में हैं। मैंने उन्हें एक लौटा हल्दी वाला दूध पिलाकर उनसे उनकी आप-बीती सुनी जो अभी आपने पढ़ी। "वो दिन अब ना रहे" कहकर पड़ोसी ने अपनी बात ख़त्म की!  इस प्रकरण से जो सीख मिलती है मुझे पूरा विश्वास है कि आप उसे अपने हित में याद रखेंगे! 
                          

                          -  वीरेंद्र सिंह




Saturday, March 6, 2021

उम्र बढ़ाओ भगवान! वरना नहीं करेंगे काम!

                                 

जब भी मैं लोगों को उनकी उचित-अनुचित माँगों को पूरा करने के लिए प्रदर्शन  करते देखता हूं तो मेरे अंदर का सोया  आंदोलनकारी  उस नाग की तरह फुफकार उठता है जिसकी पूँछ पर किसी ने जानबूझकर पैर रख दिया हो। इसकी वजह यह है कि एक आंदोनल मुझे भी करना था लेकिन 24 घंटों में से  20  घंटे तो फेसबुक, ट्वीटर, कू ,यूट्यूब, ब्लॉग वगैरहा  पर ख़र्च हे जाते हैं। अब बाकी बचे 4 घंटों  में  बाकी बचे काम करूँ या आंदोलन ? इसलिए आंदोलन कर रहे लोगों को देख कर मेरी आँखों से वो भयानक जलधारा बहती कि सारे पड़ोसी हाथ जोड़कर मेरे सामने खड़े होकर प्रार्थना करते हैं कि बस कर पगले! अब बहायगा क्या? जनहित में मुझे अपने आँसुओं पर सब्र के बाँध का ब्रेक लगाना पड़ता है।  लेकिन ये आंदोलनकारी!  महज चंद लोगों के हित के लिए बेचारे ये लोग अपना सारा सुख-चैन छोड़कर सड़क पर  उतर आते हैं! माना कि खाने में उन्हें गाजर का हलवा और  बादाम पाक मिलता है! फ्री मालिश भी होती है! पीने को भी मिलती है! और भी बहुत कुछ मिलता है! लेकिन अपने घर  की सूखी रोटी के त्याग को  कम नहीं माना जा सकता!    




जहां तक मेरे आंदोलन का सवाल है तो यह संपूर्ण  मानवजाति के लिए है! बेहोश करने वाली बात यह है कि अपने आंदोलन की फाइल पर मैं स्वयं ही पालथी मारकर बैठा हूँ और बिना दूध की चाय पीते हुए इन्टरनेट पर खर्च हुए जा रहा हूँ!  आंदोलन शुरु कर दिया होता तो आंदोलन का नेता  होने के नाते टीवी चैनलों  को इंटरव्यू दे रहा होता! खीर खाता, दारू पीता,  दूध से कुल्ला करता!  दो चार चेलों को अपनी सेवा में रखता!  जब तक माँग  पूरी नहीं मानी जाती फुल मौज करता!

अब सवाल  उठता है कि किस बात का आंदोलन और किसके खिलाफ ?  आंदोलन उम्र बढ़ाने को लेकर होगा और भगवान के ख़िलाफ होगा! इसमें हैरान-परेशान होने वाली बात नहीं है! ये कोई वेतन-भत्ते बढ़ाने या किसी कानून को वापस लेने का आंदोलन नहीं है। यह आंदोलन उम्र बढ़ाने को लेकर  है। अब उम्र तो केवल भगवान ही बढ़़ा सकते हैं। इसलिए आंदोलन भगवान के ख़िलाफ़ होगा। और प्रचंड आंदोलन होगा!  चूँकि दो-चार साल में तो भगवान दर्शन भी नहीं देते। इसलिए लंबा आंदोलन करना होगा। आंदोलन कितना लंबा चलेगा उस पर अभी कुछ कहा नहीं जा सकता! लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि हमारा आंदोलन पूरी तरह सफल रहेगा। अगर आधी बात भी मान ली गईं तो समझो बात बन गई!

अगर किसी के मन में यह सवाल है कि भई उम्र बढ़ाने के लिए आंदोलन की कौन जरूरत आन पड़ी तो इसका जवाब यह है कि आम इंसान की उम्र तकरीबन 65 साल से लेकर 85-90 साल तक होती है। चंद भाग्यशाली ही ऐसे होते हैं जो 100 वर्ष या और 10-15 साल ज्यादा जी जाते हैं। आज से 100 साल पहले तक तो यह उम्र काफी थी। लेकिन पिछले 100 सालों में हालात बदल गए हैं। 20वीं सदी तो जैसे-तैसे कट गई  लेकिन 21वीं सदी में इतनी उम्र से काम नहीं चल सकता।  बिल्कुल वैसे ही जैसे पिछली सदी  में मिलने वाले वेतन-भत्तों से आज काम नहीं चल सकता था। आज की जरूरतें अलग हैं इसलिए वेतन-भत्ते और अन्य सुविधाओं में निरंतर बढ़ोतरी हुई है और होती रहेगी। चूँकि वेतन-भत्तों को बढ़ाने वाला डिपार्टमंट पृथ्वीलोक में ही है उसके कर्मचारियों का निवास भी यहीं है तो ख़ास दिक्कत नहीं होती । कभी-कभी दफ्तर में तालाबंदी और कामबंदी रूपी बह्मास्त्र चला दिया जाता है और बात बन जाती है! कभी-कभी तो उम्मीद से ज्यादा मिल जाता है!  वहीं उम्र बढ़ाने का डिपार्टमंट भगवान के पास है  और भगवान जी कुंभकर्ण वाली नींद में  सो रहे हैं। इसलिए उन्हें जगाने के लिए  आंदोलन ही एकमात्र रास्ता है। 

एक सवाल यह भी उठ सकता है कि भाई इस 21वीं सदी में इतनी उम्र से काम क्यों नहीं चल सकता? इसका जवाब है कि यह इंटरनेट का जमाना है। इंटरनेट पर बहुत सारे काम है। मसलन  कम से कम 50 साल तो केवल सोशल मीडिया पर वीडियो देखने के लिए ही चाहिए।  इतने ही साल यूट्यूब और फेसबुक के लिए चाहिए।  ट्वीटर और कू  जैसे प्लेटफॉर्म  के लिए अलग से  50 साल की उम्र का बोनस चाहिए।  बाकी बचे हजारों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों और न्यूज पोर्टलों के लिए अलग से 100 साल की आवश्यकता है! अब बचे  पढ़ाई-लिखाई, शादी-ब्याह, नौकरी वगैरहा जैसे मुख्य काम तो इनके लिए पहले की ही तरह 60-65 साल काफी हैं।  इस तरह कुलमिलाकर कम से कम 310-315 साल की उम्र की आवश्यकता है। लेकिन हम 300 में एडजस्ट कर लेगें।  अगर भगवान को इसमें कोई आपत्ति है तो..एक बार आमने-सामने बैठकर बात कर लेते हैं। जितनी उम्र पर सहमति बन जाएगी उसे मान लेंगे। 

 हमारा वादा है कि आंदोलन एकदम साफ-सुथरा और शांतिपूर्ण होगा। किसी भी तरह की हिंसा नहीं होगी। पूजा स्थलों पर कोई तोड़ -फोड़ नहीं होगी! कोई भगवान की सत्ता को चुनौती नहीं देगा। जब तक उम्र बढ़ाए जाने की माँग नहीं मानी जाती तब तक कोई काम नहीं करेगा। केवल एक ही नारा रहेगा; उम्र बढ़ाओ भगवान वरना नहीं करेंगे काम!

          - वीरेंद्र सिंह 

Friday, March 5, 2021

फिर आया ऊँट पहाड़ के नीचे!

लोकतंत्र में नेता लोग जब भी जनता के सामने दंडवत प्रणाम की मुद्रा में आते हैं तो यह दृश्य आत्मा को सुख देने वाला होता है। चुनाव के समय यह मौक़ा जनता को मिलता है। उप्र में पंचायत चुनाव होने वाले हैं। सरकार ग्राम विकास के लिए करोड़ों रुपये खर्च करती है। ग्राम प्रधान बनकर इन करोड़ों का एक हिस्सा अपने लिए भी ख़र्च करने का पूरा चांस मिलता है! इसलिए लोकल नेताओं ने ग्राम प्रधान बनने के सपने लेने शुरु कर दिये हैं। जनता और नेता दोनों एकमत हैं  कि  बेरोजगारी के दौर में अगर प्रधानी मिल जाए तो अगली सात पुश्तों की न सही कम से कम अपनी आर्थिक समस्याओं का समाधान पाँच साल में ही हो जाएगा। ऐसा मौक़ा हाथ से जाने देना मूर्खता होगी।         

    
satire on candidates doing funny things to seek votes in UP panchayat elections
सांकेतिक चित्र


चुनाव जीतकर मलाई खाने का सपना बड़ा मस्त होता है लेकिन होता तो सपना ही है। इसमें जब तक हक़ीकत के रंग न भरे जाए तब तक ऐसा सपना मुंगेरीलाल के हसीन सपने से ज्यादा कुछ नहीं है। इन सपनों में हक़ीकत का रंग भरने का काम जनता का है। इसलिए भावी प्रधान  बड़े जतन के साथ जनता को रिझाने का यत्न कर रहे हैं।  एक महीने पहले ही हर मतदाता के सामने अपनी मुंडी को झुकाना शुरू कर दिये हैं। कोई मतदाता दिन में 10 बार भी सामने पड़ जाता है तो 10 बार ही सिर झुकाकर उसके हाल-चाल पूछते हैं और शाम तक 10 बार और मिलने का विनम्र निवेदन करते हैं। अब अगर चुनाव जीतने के बाद नेताजी अगले पाँच साल तक किसी के सामने अपनी मुंडी न भी झुकाए तो किसी को बुरा नहीं मानना चाहिए। 


हाल-चाल पूछते-पूछते नेताजी की हालत भी अभी से पतली हो रखी है! जबकि चुनाव होने में महीनेभर का समय है!   कई बार हाल-चाल पूछते वक्त सारा हिसाब-किताब गड़बड़ा जा रहा है। एक व्यक्ति ने भावी प्रधान को बताया कि उसकी बीबी बहुत बीमार है तो भावी प्रधान ने उसको आश्वासन दिया कि चिंता मत करो। तुम्हारी बीबी मेरी बीबी! मैं उसको कुछ नहीं होने दूँगा। एक अन्य मतदाता से भावी प्रधान कहते हैं कि आपके वोट की चिंता तो हमें ना हैं! तुम्हारी भौजी यानी हमारी पत्नी जी कह रही थीं कि तुम्हारा वोट तो हर हाल में हमें ही मिलेगी! उस मतदाता की पत्नी साथ में ही खड़ी थी। अपनी पति की आँखों में जैसी ही उसने अपनी आँखे डाली पति महोदय ने पत्नी का हाथ पकड़कर तत्काल वहां से रवानगी डालने में ही अपनी भलाई समझी। भावी प्रधान की भावनओं में कोई खोट नहीं थी। बस सामने वाले को दिलासा देते हुए या अपनापन जताते हुए वो क्या बोल रहे थे उन्हें कुछ नहीं समझ आ रहा था! 

प्रधान बनने के सपने लेने वालों का चुनाव पूर्व का टाइम कितना जटिल होता है इसकी व्याख्या तो केवल वही कर सकते हैं। लेकिन कल्पना तो हर कोई कर सकता है। हार का खटका बराबर लगा रहता है जो उम्मीदवारों को चैन नहीं लेने देता। मतदाता को रिझाने के लिए बातों में इतनी मिठास भरकर रखनी पड़ती  है कि थोड़ी देर भी कोई उनकी बात सुनले तो उसे अगले दिन ही चैकअप कराना पड़ता है कि कहीं शुगर की बीमारी तो नही हो गई?

एक भावी प्रधान का हाल तो यह है कि अगर किसी मतदाता ने उसे दिन में केवल 5 बार ही दर्शन दिए हैं तो शाम को उसके घर जाकर उससे पूछता है कि भैया आज केवल पाँच बार ही आए? अगर बीस बार  न  भी आ सको तो कम से कम 10-15 बार तो सामने आ ही जाया करो। वरना दिल की धड़कन बढ़ने लगती है कि कहीं आपका नैन मटक्का किसी और पार्टी के साथ तो नही चल रहा है?  

 चुनाव में पत्नी की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है। इसका खुलासा भी स्वयं एक अन्य भावी प्रधान ने किया है। यह महोदय अचानक अपनी पत्नी की हर बात मानने लगे हैं और पत्नी के सामने आते ही हर बार उसका हाल-चाल पूछते हैं। पत्नी को बार-बार याद दिलाते हैं कि तुमने अपने मायके वालों को  बहुत दिनों से कोई गिफ्ट न दिया? सब ठीक तो है न? वगैरहा-वगैरहा!  किसी ने इसकी वजह पूछी तो कहने लगे कि ये चुनाव है। इसलिए कोई चांस नहीं ले सकते। पत्नी भले ही एक है लेकिन 100 वोटों का इंतज़ाम तो वो अकेले ही कर सकती है। दिन भर पूरे गाँव की औरतों से पानी-पाचा(पर-निंदा-पर-चर्चा) कर मजे लेने वाली पत्नी को इस वक्त नाराज़ करने की कोई तुक ही नहीं है। कहीं ऐंठ में टैट हो गई  तो अपना वोट भी नहीं डालेगी। बाकी सौ वोट भी जाएँगे सो अलग।


भावी प्रधानों में एक सहमति भी बनी है और बाकायदा सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए है कि फलां तारीख तक केवल गर्दन झुकाकर राम-राम, नमस्ते या दुआ सलाम कर हाल-चाल से ज्यादा नहीं बढ़ेगे। फलाँ तारीख से फलाँ तारीख तक केवल दारु और दावत का दौर चलेगा लेकिन कोई गिफ्ट वगैरहा अभी नहीं देना है। चुनाव से तीन दिन पहले गिफ्ट देना शुरू करना है। अगर किसी उम्मीदवार ने  तनिक भी सयानापन दिखाया तो उसकी खैर नहीं। सयानेपन से मतलब कि चुपचाप किसी मतदाता को अभी से शराब पिलाना. दावत या गिफ्ट देना वगैरहा-वगैरहा..। अगर सहमति न भी हुई होती तब भी चुनाव के इतने समय पहले लोगों को खिलाना-पिलाना शुरू करना कतई बुद्धिमानी नहीं है। फिर चुनाव में जीत तो किसी एक की ही होनी है। जीतने वाला तो अपना ख़र्च आसानी से निकाल लेगा। हारने वाले को हाथ मलने और पत्नी की तानों के अलावा कुछ नहीं मिलना। इसलिए बेहिसाब खर्च लिमिट में ही करने में भलाई है।


जनता और नेता का  संबंध पहाड़ और ऊँट जैसा होता है। जनता, पहाड़  होती है और नेता  ऊँट!  पहाड़, ऊँचा होता है लेकिन जब तक यह ऊँट,पहाड़ के नीचे नहीं आता तब तक इसे यही लगता है कि वो ऊँचा है। चुनाव के वक्त नेता लोग इस भ्रम रूपी केंचुली को थोड़े समय के लिए उतार देते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो नेता रूपी ऊँट, जनता नामक पहाड़ के नीचे अपने आप आ जाता है। और न केवल आता है बल्कि उसके खौफ़ से दुबला भी हो जाता है। थोड़े समय के लिए ही सही लेकिन इस ऊँट के पहाड़ के नीचे आने से जनता के चेहरे खिले हुए हैं।  






                                    -वीरेंद्र सिंह




उप्र पंचायत चुनाव प्रक्रिया लंबी चलनी है। इसलिए इससे संबंधित व्यंग्य में कुछ और कड़ी भी जुड़ जाए तो हैरान मत होइएगा। भगवान आपको मुझे  बर्दास्त करने  की शक्ति दे।  मैं आपके लिए प्रार्थना करूँगा। धन्यवाद। 



Wednesday, February 24, 2021

पंच इंंद्रीय उद्यान(द गार्डन ऑफ फाइव सैंसेज)

 दिल्ली टूरिज्म द्वारा 34 वें गार्डन टूरिज्म फेस्टीवल  का आयोजन

 
दिल्ली पर्यटन द्वारा 34 वें उद्यान पर्यटन उत्सव ( 34th Garden Tourism Festival)  का आयोजन 19 फरवरी 2021 से 13 मार्च 2021 तक दिल्ली के साकेत स्थित पाँच इंद्रीय उद्यान ( The Garden of Five Senses)   में किया जा रहा है। यह गार्डन साकेत के सैद उल अजाब में स्थित है जो तकरीबन 20 एकड़ जमीन में है और  दिल्ली पर्यटन का महत्वपूर्ण लोकप्रिय पर्यटन स्थल है।  





गार्डन तक कैसे पहुँचे?

 साकेत मेट्रो स्टेशन से सुबह 11 बजे  से लेकर शाम 6 बजे तक गार्डन तक मुफ्त शटल सेवा उपलब्ध है। गार्डन खुलने का समय  वीकेंड में सुबह 11  बजे से लेकर शाम को 7 बजे तक है सप्ताह के बाकी दिनों में सुबह 11 बजे से शाम को 6 बजे तक है।  साकेत मेट्रो स्टेशन से लगभग 2 किमी दूर है। बाकी अपने वाहन द्वारा या दिल्ली बस सेवा का उपयोग भी किया जा सकता है। 


गार्डन घूमने का शुल्क भी लगता है। जो वीकेंड पर 50 रुपये प्रति व्यक्ति है। वहीं सप्ताह के बाकी दिनों यानी वीक डेज में 40 रुपये प्रति व्यक्ति है। सीनियर सिटिजन के लिए 40 रुपये है। 12 साल तक के  बच्चों से कोई शुल्क नहीं वसूला जाता है। 



उपलब्ध सुविधाएँ

गार्डन में पीने का पानी मुफ्त उपलब्ध है। फूड स्टॉल भी वगैरहा भी है जहां पर स्वादिष्ट व्यजनों का लुफ्त उठाया जा सकता है। जन सुविधाएँ उपलब्ध हैं।  आराम से बैठने की व्यवस्था भी है।

घूमने का सबसे अच्छा वक्त

गार्डन में आजकल काफी चहल-पहल नज़र आ रही है। बड़ी संख्या में लोग गार्डन में जा रहे हैं। साल का यह समय गार्डन घूमने के लिए शायद सबसे बढ़िया समय है। आजकल बसंत का मौसम है।  इसलिए हर साल दिल्ली टूरिज्म इस महीने में पर्यटन मेले का आयोजन करता है। गार्डन में विभिन्न तरह के फूल सबके आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इस गार्डन की वास्तुकला गजब की है। इस गार्डन का नाम पंच इंद्रीय इसलिए रखा गया है क्योंकि यहाँ पाँचों इंद्रियों ( आँख, कान, नाक, त्वचा और जीभ)  की तृप्ति को समर्पित है। प्रकृति प्रेमियों और  यंग कपल के बीच यह गार्डन कुछ ज्यादा ही लोकप्रिय है। व्यक्तिगत तौर पर मुझे इसकी वास्तुकला और यहाँ की कलाकृतियाँ काफी अच्छी लगी है। हरे-भरे लॉन,, झरने और इसे विशेष लुक देते हैं।  तमाम तरह के आकर्षक दृष्यों और आकर्षणों से सुसज्जित है।  इस गार्डन में एक बार अवश्य जाना चाहिए। 

फोटो के लिए एक अच्छा कैमरा साथ ले जाएँ तो बेहतर रहेगा। मोबाइल से भी काम चल जाता है। एक आईडी भी साथ रखनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर काम आ सकती है।


 कुछ फोटो मैंने भी क्लिक किए हैं। उनमें कुछ यहाँ दिए जा रहे हैं। इन चित्रों में पंच इंद्रीयों का दर्शाने वाली कलाकृतियाँ भी शामिल हैं।



वर्षा - गंध


 
Summer -indication of touch sense
ग्रीष्म - स्पर्श 


Spring- sight sense
बसंत - दृष्य


dew-winter-taste sense
हेमंत और शीत- स्वाद

Autumn - sound sense
शरद - ध्वनि



































                                 -  वीरेंद्र सिंह 

Tuesday, February 23, 2021

दो पत्नियों की कथाएँ


सांकेतिक चित्र 



                                   (1)


एक बार एक गाँव में एक पंडितजी रहते थे। पंडितजी, पंडिताई करते और अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। वो लोगों के घर जाकर कथा भी किया करते थे। धर्मग्रंथों के  बारे में उनके ज्ञान का लोहा सभी मानते थे। इसलिए आस-पास के गाँवों में पंडितजी का बहुत मान-सम्मान था। वो जिसके घर भी जाते वहाँ उनका खूब आदर-सत्कार होता।  पंडितजी की बौद्धिकता के दम पर उनके जीवन की गाड़ी ठीक-ठाक चल रही थी। पंडितजी की पत्नी यानी पंडिताइन घर पर ही रहती थी। स्वभाव से वो काफी तेज महिला और थोड़ी जिद्दी महिला थी। 

एक  बार जब पंडितजी कहीं जाने को तैयार हो रहे थे तो पंडिताइन ने कहा कि पड़ोस के गाँव में एक महाराज जी श्रीमद् भगवद कथा कर रहे हैं । उनकी विशेष बात यह है कि वो सभी को बड़े अच्छे ढंग से गीता समझाते हैं और समझाने के बाद सबसे पूछते हैं कि अर्थ समझ आया।  जिन्हें समझ आ जाता है वे हाथ खड़ा कर देते हैं और बाद में महाराज जी को दक्षिणा भी देते हैं। जिनकी समझ में कथा नहीं आई उनसे दक्षिणा नहीं ली जाती । पंडिताइन ने आगे कहा कि आज मेरा भी मन वहाँ जाकर श्रीमद् भगवद कथा सुनने का है।

पंडितजी बोले कि अगर ऐसी बात है तो वापस आकर मैं तुम्हें भगवदगीता समझा दूँगा। तुम्हें दूसरे गाँव जाने की आवश्यकता नहीं है। फिर वहँ तुम्हें दक्षिणा भी देनी पड़ेगी।  इसलिए अगर मुझ से भगवद कथा सुनोगी तो कथा भी बढ़िया समझ आएगी और पैसे भी बचेंगे। दूसरे गाँव जाने से भी बचोगी। लेकिन पंडिताइन जिद पर अड़ गई कि मुझे तो महाराज जी से ही कथा समझनी है। 


पंडितजी ने पंडिताइन को बहुत समझाया लेकिन पंडिताइन ने अपना निर्णय नहीं  बदला। पंडितजी को क्रोध आ गया। उन्होंने कहा कि मूर्ख स्त्री बाहर के महाराज को पैसा देकर कथा सुनने के लिए तैयार है लेकिन अपने स्वयं के पति से कथा सुनने को तैयार नहीं। जबकि मुझसे कथा सुनने में  पैसे बचेंगे और अपना घर छोड़कर कहीं आना-जाना भी नहीं पड़ेगा।

पंडितजी की बात सुनकर अब पंडिताइन को क्रोध आ गया। पंडिताइन ने क्रोधित होकर कहा कि मूर्ख मैं नहीं बल्कि मूर्ख हो आप!  दक्षिणा तो तभी देनी पड़ेगी न जब मैं मान लूंगी कि मुझे कथा समझ आ गई। और जब मैं मानूँगी ही नहीं कि मुझे कथा समझ आ गई  है तो दक्षिणा क्यों  देनी पड़ेगी? अपनी पत्नी की बात सुनकर पंडितजी सकते में आ गए मगर पंडिताइन के तेवर  देखकर  उन्होंने चुप रहने में ही भलाई समझी। 
                                                     
                          
              (2)

एक गाँव में एक महिला और उसके  पति  के बीच अक्सर झगड़ा होता था। उनके पड़ोसियों को लगता कि इस  औरत के तो नसीब फूट गए। पता नहीं कैसा पति मिला है जो बेचारी को इतना परेशान  करता है। एक दिन उन दोनों के बीच फिर से झगड़ा  हुआ । जब उसका पति बाहर गया तो जाने से पहले अपनी पत्नी को हिदायत दी कि किसी से बताना मत कि हमारे बीच किस बात पर झगड़ा हुआ  है। पत्नी क्रोधित थी इसलिए कुछ नही  बोला। थोड़ी  देर बाद पास के घरों की महिलाएं  उसके पास आई और उससे पूछा कि तुम दोनों झगड़ क्यों रहे थे?


वो  चुप रही। दूसरी महिलाओं ने पूछा अच्छा यह तो  बता दो किस बात पर तुम इतना क्रोधित हो?
अब वो महिला बोल उठी। उसने कहा कि खाने को लेकर हमारे बीच झगड़ा हुआ था। मैंने 10 रोटियाँ बनाई थी जिसमें से 9 मेरा पति खा गया। मेरे लिए केवल एक ही छोड़ी थी। उन महिलाओं को उसके पति पर बड़ा क्रोध आया। एक पड़ोसी महिला ने कहा कि तुम और  रोटियाँ बना लो।  एक अन्य महिला ने पूछा कि क्या वाकई तुम्हारा पति नौ रोटियाँ खा जाता है?  एक और महिला ने उससे पूछा कि तुम कितने आटे की रोटियाँ तैयार करती हो जो तुम्हें कम पड़ जाती  है? 

इस पर उस महिला ने  बड़ी मासूमियत से जवाब दिया,


 नौ सेर की मैंने नौ बनाई , नौ सेर का एक चंदा,
 वो  मोटुआ  नौ खा गया मैंने खाया एक चंदा।

अर्थात  नौ सेर आटे से मैने 9 रोटियाँ बनाई और नौ सेर आटे से  ही मैंने एक बड़ी रोटी(चंदा) बनाई। इनमें से मेरे पति ने 9 रोटियाँ  खाई जबकि मुझे केवल एक रोटी(चंदा) ही छोड़ी।

पूरी  बात समझते ही पड़ोसी महिलाएँ  एक दूसरे का मुंह का ताकने लगी और चुपचाप अपने-अपने घरों को चली गईं।


                                                -वीरेंद सिंह

                             

Monday, February 22, 2021

प्रेमबाण





एक बार एक गुरु और उनका शिष्य घूमते-घमते बस्ती से  बहुत दूर ऐसे स्थान पर निकल आए जहां जंगल ही जंगल थे। दोनों को प्यास लगने लगी थी। लेकिन कहीं पानी  का कोई स्रोत दिखाई नहीं दे रहा था।  गुरु ने शिष्य से कहा कि अगर ज्यादा आगे जाएंगे तो हिंसक जानवरों से सामना हो सकता है। इसलिए अब लौट चलते हैं। प्यास तो लग रही है लेकिन और आगे जाना सही नहीं होगा। फिर कहीं पानी दिखाई भी तो नहीं दे रहा। गुरु की बात सुनकर शिष्य ने हाँ में गर्दन हिलाई और निवेदन किया कि गुरुजी मैं बहुत थक गया हूं। थोड़ी देर कहीं बैठ जाते हैं फिर वापस चलते हैं। 


दिन ढल रहा था। थोड़ी देर आराम करने के बाद दोनों वापस जाने लगे।  अचानक उन्होंने देखा कि एक स्थान पर कुछ कौवे और  चील  इकटठा हो रहें हैं। शिष्य ने अपने गुरु से कहा कि अभी कुछ देर पहले तो यहां कुछ नहीं था। अब अचानक से ये चील-कौवे क्यों उड़ने लगे। गुरु ने कहा यह जंगल है । जरूर कोई जानवर मरा पड़ा होगा!  शिष्य ने कहा कि गुरुजी चलकर देखते हैं कि जानवर ही है? या कहीं ऐसा तो नहीं कोई मनुष्य ही पानी के अभाव में मर गया हो?


गुरु ने कहा ऐसा लगता तो नहीं। फिर भी तुम्हारी उत्कंठा को शांत करने के लिए उधर ही चलते हैं। ऐसा कहकर गुरु अपने चेले के साथ उसी दिशा में चल पड़े जिधर चील-कौवे उड़ रहे थे। पास जाकर देखा तो एक  हिरन और एक हिरनी वहां मरे पड़े थे।  दोनों का देखने से ऐसा लगता था कि दोनों के प्राण कुछ देर पहले ही निकले थे। दोनों को देखकर ऐसा लगता था कि अभी उठकर भाग जाएंगे। दोनों की उम्र मरने वाली नहीं लगती थी। आश्चर्य की  बात यह थी कि  दोनों हिरनों के पास ही एक गड्ढा था जिसमें थोड़ा सा पानी था। गुरु ने दोनों हिरनों को देखा और सोच में पड़ गए।


वहीं शिष्य के मन में सवाल आता है कि न तो इनके शरीर पर कोई घाव है यानी किसी शिकारी ने तो इन्हें मारा नहीं। और न ही ऐसा लगता कि दोनों किसी बीमारी से मरे हैं!  प्यास से मरे हो ऐसा भी नहीं लगता क्योंकि गड्ढे में पानी है। किसी हिंसक जानवर भी नहीं मारा। हिंसक जानवर मारता तो खा जाता या कम से कम इनके शरीर पर कोई निशान तो होता।  तो फिर ये मरे तो मरे कैसे?  अपनी इस उत्सुकता को शिष्य ने अपने गुरु से कुछ इस तरह पूछा,.


            व्याधि  कोई लगती नहीं, न ही लगा है कोई बाण,

           पानी भी है पास में फिर किस विधि निकले प्राण?   


शिष्य का प्रश्न सुनकर गुरु जी थोड़ी देर के लिए शांत हो गए। फिर  उन्होंने शिष्य के प्रश्न का उत्तर कुछ इस प्रकार दिया,


        पानी थोड़ा हित घना, लगे प्रेम के बाण,

      तू पी- तू पी कहे मरे, बस इस विधि निकले प्राण!


गुरु ने शिष्य को समझाते हुए कहा कि ये दोनों हिरन और हिरनी आपस में पति-पत्नी थे। दोनों को प्यास लगी तो पानी की तलाश में भटककर यहां तक आ पहुँचे। यहां आकर दोनों  ने देखा कि केवल एक हिरन के लिए तो पर्याप्त पानी है लेकिन दोनों के लिए नहीं है। अगर एक हिरन पानी पीता तो वो आराम से ऐसी जगह जा सकता था जहां उसे और पानी मिल जाता। वहीं अगर दोनों ने पानी पिया तो दोनों का जीवित बचना मुश्किल था क्योंकि बाद में पानी कहां जाकर मिलता उन्हें नहीं पता था। इसलिए  हिरन ने  हिरनी की ओर प्यार से देखा और कहा कि देखो अगर मुझे पानी नहीं मिला तो मैं कहीं और तलाश लूंगा इसलिए यह पानी तुम पी लो। हिरनी बोली,"नहीं स्वामी! यह पानी आप पी लो। अगर मुझे पानी नहीं मिला  और मैं मर भी गई तो  कुछ नहीं होगा लेकिन अगर आप को कुछ हो गया तो हमारे बच्चों को कौन पालेगा। इसलिए यह पानी आप पी लो और यहाँ से जितनी जल्दी हो सके निकल जाओ।"  हिरनी की बात सुनकर हिरन बोला , " नहीं प्रिय , बच्चों को मुझसे ज्यादा तुम्हारी आवश्यकता है  इसलिए यह पानी तुम पी लो।" 


बहुत देर तक हिरन और हिरनी एक-दूसरे से विनती करते रहे कि पानी तुम पी लो--तुम पी लो। इस तरह दोनों में से किसी ने भी पानी नहीं पिया और अंत में प्यास की वजह से दोनों के ही प्राण पखेरु उड़ गए।  आपस में अत्यधिक  प्रेम होने के चलते दोनों ने एक दूसरे के लिए पानी नहीं पिया और अंत में दोनों ही प्यास से मर गये।


                -वीरेंद्र सिंह 



Sunday, February 21, 2021

महीनिया

                    
                       

एक बार एक गाँव में एक व्यक्ति रहता था जिसका नाम महीनिया था। महीनिया का अपना घर तो था लेकिन घरवाली और बच्चे नहीं थे। हर जगह ऐसे लोग होते हैं जो शादी नहीं करते  या किसी वजह से उनकी शादी नहीं  हो पाती है। महीनिया की भी शादी नहीं हो पाई थी। अकेला होने की वजह से जब मन किया किसी दूसरे गाँव या स्थान पर घूमने निकल गया। इस दौरान वो किसी ऐसे घर की तलाश में रहता जहाँ वो  ठहर सके। उसकी एक खासियत यह भी थी कि वो जिसके घर में रुकता उसके घर से एक महीने से पहले नहीं जाता था।  इसलिए आस-पास के गाँव के लोगों ने उसका नाम महीनिया रख दिया। दूर-दूर तक लोग उसकी इस खासियत से परिचित थे।  महीनिया अव्वल दर्जे का बातूनी और हाजिर जवाब था।  अपने इसी गुण के कारण वो कोई न कोई ऐसा घर तलाश ही लेता जो उसे एक महीने तक रुकने दे।  जिस-जिस गाँव में भी वो जाता था उस गाँव के निवासी उसे कभी भूलते नहीं थे।


Story of a man who stays for one month as a guest
सांकेतिक लोगो

आदत के अनुसार महीनिया ने एक बार फिर से अन्य गाँव में जाकर किसी के घर एक माह रहने की योजना बनाई। उसने तय किया कि इस बार अपने गाँव से 6-7 कोस की दूरी पर स्थित उस गाँव में जाएगा जहां गए हुए उसे काफी लंबा समय हो गया है। पिछली बार जब वहाँ रहा था तो उसे कोई दिक्कत भी नहीं हुई थी। सोच-विचार कर अगले दिन महीनिया मुर्गे की बांग सुनते ही उठ बैठा। जल्दी से तैयार होकर एक थैले में अपने कपड़े रखकर उस गाँव के लिए निकल पड़ा। 


महीनिया तड़के यानी सूरज निकलने के कुछ देर बाद ही गाँव के पास पहुँच गया। गाँव से कुछ दूर पहले एक पेड़ खड़ा था। वो उस पेड़ के नीचे बैठकर सोचने लगा कि किस घर या किसकी बैठक (बड़े-बुजुर्गों का रहने का स्थान जहां वे रात को सो सके और दिन में अपने अन्य साथियों के साथ बातचीत भी कर सके)  में जाकर उसे टिकना चाहिए। गाँव के वे लोग जो सुबह-सुबह अपने खेतों पर घूमकर आते हैं उन्होंने महीनिया को देख लिया। उसका हाल-चाल पूछा लेकिन किसी ने भी उससे यह न कहा कि आओ हमारे घर चलो।  


थोड़ी देर में महीनिया के आने की ख़बर अन्य लोगों को भी होने लगी।  जिन लोगों ने महीनिया को देखा था उन्होंने  बाकी लोगों से बताना शुरु कर दिया कि आज तो महीनिया आ रहा है। मजाक-मजाक में सब एक दूसरे से  कहने लगे कि जिसे भी उसकी  सेवा करनी है उसे अपने घर ले आओ वरना फिर मत कहना की उसकी सेवा का मौक़ा न मिला। क्या पता फिर कब आए या आए ही ना? एक अन्य आदमी न कहा कि वो किसी के कहने से ना आता। अपनी मर्जी का मालिक है जिसके घर भी बैठ गया तो एक महीने बाद ही जाएगा।


उसी गाँव में एक बुढ़िया रहती थी। उसने भैंस भी पाल रखी थी ताकि उसका दूध बेचकर कुछ पैसे जोड़ने के साथ-2 अपना घर भी चला सके। उसकी भैंस दूध भी अच्छा देती थी। बुढ़िया की एक बेटी थी जिसकी शादी हो गई थी। एक  बेटा था जो दूसरे गाँव में किसी के घर काम करता था और वहीं रहता था। समय-समय पर वो अपनी माँ से मिलने आता था। बुढ़िया सोचती थी कि वो जल्दी से जल्दी पैसा इकट्ठा कर अपने बेटे की शादी कर देगी और अपने बेटे और बहू के साथ रहेगी। घर में बहू लाने का सपना पाले बुढ़िया रोज़ घर का काम निपटाकर घास लेने के लिए जंगल के लिए निकल जाती और शाम को ही वापस आती। बुढ़िया अपने जीवन से संतुष्ट थी।


 लेकिन उस दिन जैसे ही उसे महीनिया के आने की ख़बर हुई तो एक बार को उसे लगा कि कहीं ये महीनिया  उसके घर आकर ही न मर जाए? बुढ़िया का मतलब था कहीं उसी के घर न टिक जाए। एक-दो दिन की बात  हो तो कोई रख भी ले। ये तो पूरे महीने यहीं रहेगा। रोटी खाने के साथ-साथ दूध भी पीएगा जिसके लिए बुढ़िया बिल्कुल तैयार नहीं थी। उसने उस सुबह खीर बनाई थी। लेकिन अभी खाई नहीं थी। बुढ़िया ने सोचा खीर तो बाद में खा लूँगी। पहले घर से निकल जाऊँ और जंगल से थोड़ी सी घास ले आऊँ। घर का दरवाजा बंद रहेगा तो महीनिया आएगा भी नहीं।  ऐसा सोचकर बुढ़िया जल्दी से घास छीलने वाला खुरपा और घास लाने वाली जाली लेकर निकल पड़ी।


बुढ़िया ने जंगल में जाकर इत्मीनान की सांस ली। सोचने लगी भूख तो लगेगी लेकिन उस महीनिया से पीछा छूट जाएगा। जब तक वापस जाऊंगी किसी न किसी के घर वो रुक ही जाएगा। बुढ़िया ने घास छीलना शुरु किया और दोपहर तक इतना घास छील लिया कि उसकी जाली भर गई। बुढ़िया ने जाली उठाई और अपने घर की ओर चल पड़ी। घर पहुंचकर उसने देखा कि उसका दरवाजा खुला हुआ है। बुढ़िया के मन में थोड़ा खटका हुआ लेकिन जब घर के आँगन में  देखा और कोई दिखाई न दिया तो उसने चैन की सांस ली। 


बुढ़िया ने घास की जाली एक तरफ रख दी। वो थकी हुई थी। उसने पास में रखे जग से  थोड़ा सा पानी पिया।  बुढ़िया ने अपने आप से कहा कि पहले आराम करूँगी फिर खीर खाऊँगी और वहीं पास में पड़ी एक खाट पर पसर गई।  वो अपनी चतुराई पर बहुत खुश थी। पड़ोस की एक महिला ने  बाहर से  ही पूछा," आज सवेरे-सवेरे ही जंगल चली गई थीं क्या?"  बुढ़िया को लगा कि अपनी अक्ल का डंका बजाने का इससे बढ़िया मौक़ा न मिलेगा। ऐसा सोचकर बुढ़िया ने उस महिला से महीनिया के आने और उससे बचने की अपनी तरकीब के बारे में  कुछ यूं बताया,


" मैं बड़ी चतुर, बड़ी चालाक बड़ी कड़के की, लेके खुरपा-जाली निकल पड़ी तड़के की" 

ऐसा कहते ही बुढ़िया हँसने लगी। उसकी हँसी देखकर महिला के चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट आ गई।


तभी बुढ़िया के मकान के अंदर से एक आवाज आई, 


"मैं बड़ा चतुर, बड़ा चालाक, बड़ा कड़के का, गुड़ से निगल गया मैं खीर पड़ा तड़के का"


अपने घर के अंदर से आई महीनिया की आवाज सुनकर बुढ़िया जल्दी से पीछे मुड़ी और तेज-तेज कदमों से अपनी रसोई में  गई तो देखा कि महीनिया सारी खीर खा गया था। बुढ़िया सर पकड़कर वहीं बैठ गई।


                                            -वीरेंद्र सिंह